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RTI बनाम NSE: सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, हाईकोर्ट के फैसले पर रोक; 19 साल पुराने CIC आदेश के अमल पर भी स्टे
क्या देश का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज भी सूचना के अधिकार (RTI) कानून के तहत आम नागरिकों को जवाब देने के लिए बाध्य होगा? इस अहम कानूनी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी दखल देते हुए नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) को अंतरिम राहत दी है। शीर्ष अदालत ने फिलहाल दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले और केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के 2007 के आदेश के प्रभाव पर रोक लगा दी है। अब इस बहुचर्चित मामले पर अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट करेगा।

नई दिल्ली। देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) को सूचना का अधिकार (RTI) कानून के दायरे में लाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित किया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने NSE की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के 7 जून 2007 के आदेश के प्रभाव और संचालन पर फिलहाल रोक लगा दी। साथ ही अदालत ने मामले में सभी पक्षों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा।
मामला क्या है?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब एक आरटीआई आवेदक ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज से सूचना मांगी। इस पर 7 जून 2007 को केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने आदेश दिया कि NSE, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2(h) के तहत "पब्लिक अथॉरिटी" है और उस पर RTI कानून लागू होगा। NSE ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसका तर्क था कि वह कंपनी अधिनियम के तहत गठित एक निजी कंपनी है, जिसे न तो संविधान, न संसद या राज्य विधानमंडल के कानून और न ही किसी सरकारी अधिसूचना के जरिए स्थापित किया गया है। इसलिए उसे RTI कानून के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं माना जा सकता।
दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया?
दिल्ली हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने अप्रैल 2010 में NSE की याचिका खारिज कर दी थी और कहा था कि RTI कानून का उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। बाद में NSE ने इस फैसले के खिलाफ डिवीजन बेंच में अपील की।
1 जुलाई 2026 को न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की डिवीजन बेंच ने NSE की अपील खारिज करते हुए एकल न्यायाधीश के फैसले को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने कहा कि NSE, RTI अधिनियम की धारा 2(h) के तहत "पब्लिक अथॉरिटी" की श्रेणी में आता है क्योंकि उसका संचालन सरकारी मान्यता और व्यापक नियामकीय नियंत्रण के तहत होता है।
सुप्रीम कोर्ट में NSE की दलील
सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने NSE की ओर से कहा कि एक्सचेंज RTI अधिनियम की धारा 2(h) में दी गई "पब्लिक अथॉरिटी" की परिभाषा पर खरा नहीं उतरता।
उन्होंने अदालत को बताया कि—
NSE में केंद्र सरकार की कोई हिस्सेदारी नहीं है।
लगभग 40 प्रतिशत निवेशक घरेलू और 27-30 प्रतिशत विदेशी निवेशक हैं।
NSE की स्थापना न संविधान के तहत हुई, न संसद या राज्य विधानमंडल के कानून से और न ही किसी सरकारी अधिसूचना से।
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम राहत लगभग 19 वर्षों तक प्रभावी रही थी।
सुनवाई के दौरान जब न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने पारदर्शिता के महत्व का उल्लेख किया तो सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि NSE पहले से ही अपनी वेबसाइट पर पर्याप्त जानकारी सार्वजनिक करता है, लेकिन RTI कानून के तहत उसे सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है। अदालत ने केवल यह निर्देश दिया कि—
सभी पक्षों को नोटिस जारी किया जाए।
चार सप्ताह में जवाब दाखिल किया जाए।
तब तक CIC के 7 जून 2007 के आदेश के प्रभाव और संचालन पर रोक रहेगी।
अब इस मामले में विस्तृत सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि क्या NSE वास्तव में RTI अधिनियम के तहत "पब्लिक अथॉरिटी" माना जा सकता है या नहीं।
यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह मामला केवल NSE तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय भविष्य में उन निजी संस्थाओं की कानूनी स्थिति भी स्पष्ट कर सकता है, जो सार्वजनिक कार्यों, सरकारी मान्यता या व्यापक नियामकीय नियंत्रण के तहत काम करती हैं। इससे RTI कानून की धारा 2(h) की व्याख्या और पारदर्शिता के दायरे पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।
केस विवरण
मामला: National Stock Exchange of India Ltd. v. Central Information Commission & Others
केस संख्या: Special Leave Petition (Civil) No. 25056/2026
पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता
