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अब सिर्फ 'शक' के आधार पर बैंक खाता फ्रीज नहीं कर सकेगी ED! सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला
प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच शक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि केवल "शक" के आधार पर किसी नागरिक का बैंक खाता फ्रीज नहीं किया जा सकता। अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि PMLA के तहत ऐसी कार्रवाई से पहले ED के पास "Reason to Believe" यानी ठोस, कानूनी और रिकॉर्डेड आधार होना अनिवार्य है। यह फैसला जांच एजेंसियों की शक्तियों और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।

नई दिल्ली: प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच शक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि केवल "संदेह" (Suspicion) के आधार पर किसी व्यक्ति का बैंक खाता फ्रीज नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2000 की धारा 17(1A) के तहत बैंक खाता फ्रीज करने से पहले ED के पास "Reason to Believe" यानी ठोस और दर्ज कारण होना अनिवार्य है। केवल शक के आधार पर ऐसी कार्रवाई कानून सम्मत नहीं मानी जा सकती। 31 जुलाई 2026 को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने प्रवर्तन निदेशालय द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही हाईकोर्ट की व्याख्या को सर्वोच्च न्यायालय की मंजूरी मिल गई।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट?
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट की उस व्याख्या से सहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि भले ही PMLA की धारा 17(1A) में "Reason to Believe" शब्दों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन इस प्रावधान को धारा 17(1) से अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता। अदालत ने माना कि जब्ती (Seizure) और बैंक खाता फ्रीज (Freezing) दोनों एक ही प्रक्रिया के विकल्प हैं। यदि जब्ती के लिए "Reason to Believe" आवश्यक है, तो बैंक खाता फ्रीज करने के लिए भी वही कानूनी मानक लागू होगा। इसलिए केवल संदेह के आधार पर बैंक खाते को फ्रीज करना वैध नहीं माना जा सकता।
मामला क्या था?
यह मामला पूनम मलिक के दो बैंक खातों को फ्रीज किए जाने से जुड़ा था। पूनम मलिक, रंजीत मलिक की पत्नी हैं, जिनका नाम कथित रूप से 5,000 करोड़ रुपये के स्टर्लिंग बायोटेक बैंक धोखाधड़ी मामले के आरोपी गगन धवन से जोड़ा गया था। हालांकि, न तो पूनम मलिक और न ही उनके पति का नाम एफआईआर (FIR) या ईसीआईआर (ECIR) में आरोपी के रूप में दर्ज था। इसके बावजूद ED ने 5 सितंबर 2018 को उनके बैंक खाते फ्रीज करते हुए आदेश में लिखा था कि "संदेह है कि मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी राशि इन खातों में हो सकती है", इसलिए खातों से डेबिट लेन-देन पर रोक लगाई जाती है। बाद में ED की इस कार्रवाई को Adjudicating Authority ने सही ठहराया, लेकिन अपीलीय अधिकरण (Appellate Tribunal) ने फ्रीज आदेश रद्द कर दिया। इसके बाद ED दिल्ली हाईकोर्ट पहुंची, जहां उसकी अपील खारिज कर दी गई।
दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या कहा था?
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि ED ने बैंक खाते फ्रीज करते समय PMLA की अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया। अदालत ने कहा कि फ्रीजिंग ऑर्डर बिना किसी ठोस कारण और वैधानिक आवश्यकताओं का पालन किए जारी किया गया था, इसलिए यह कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता।
अनुच्छेद 300A का भी किया उल्लेख
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए किसी व्यक्ति का बैंक खाता फ्रीज करना संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत प्रदत्त संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से केवल कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है। यदि बैंक खाता बिना पर्याप्त कानूनी आधार के फ्रीज किया जाता है, तो यह संवैधानिक सुरक्षा के विपरीत होगा।
फैसले का क्या होगा असर?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला PMLA के तहत ED की जांच शक्तियों और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। अब ED को किसी भी बैंक खाते को फ्रीज करने से पहले रिकॉर्ड पर स्पष्ट और ठोस "Reason to Believe" दर्ज करना होगा। केवल संदेह या सामान्य आशंका के आधार पर बैंक खातों पर रोक लगाने की कार्रवाई न्यायिक जांच में टिक नहीं पाएगी।
मामले का विवरण
मामला: Directorate of Enforcement बनाम Poonam Malik
पीठ: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता एवं न्यायमूर्ति शील नागू
फैसला: 31 जुलाई 2026
कानून: Prevention of Money Laundering Act, 2000 (धारा 17 एवं 17(1A))
मुख्य मुद्दा: क्या केवल "Suspicion" के आधार पर ED बैंक खाता फ्रीज कर सकती है?
सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष: नहीं। बैंक खाता फ्रीज करने से पहले "Reason to Believe" होना और उसे रिकॉर्ड करना अनिवार्य है।
