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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पत्नी के विवाहेतर संबंध के प्रथम दृष्टया सबूत हों तो नहीं मिलेगा अंतरिम भरण-पोषण
भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टता देते हुए कहा है कि यदि पति पहली नजर (Prima Facie) में पत्नी के विवाहेतर संबंध के पर्याप्त साक्ष्य अदालत के सामने रख देता है, तो उसे अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में निचली अदालतें केवल अंतिम सुनवाई का इंतजार कर आवेदन खारिज नहीं कर सकतीं, बल्कि उपलब्ध प्रथम दृष्टया साक्ष्यों के आधार पर कानून के अनुसार निर्णय लेना होगा।

भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि पति प्रथम दृष्टया (Prima Facie) यह साबित कर देता है कि पत्नी विवाहेतर संबंध (Adulterous Relationship) में रह रही है, तो उसे अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) देने से इनकार किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में अदालत केवल अंतिम सुनवाई तक इंतजार नहीं कर सकती, बल्कि उपलब्ध प्रथम दृष्टया साक्ष्यों के आधार पर अंतरिम चरण में भी निर्णय लिया जा सकता है। 31 जुलाई 2026 को न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए राजस्थान हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यदि पति धारा 125(4) CrPC के तहत ऐसा आवेदन देता है और प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत कर देता है, तो अंतरिम भरण-पोषण पर रोक लगाने पर विचार किया जा सकता है।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि पति धारा 125(4) CrPC के तहत पत्नी के विवाहेतर संबंधों का आरोप लगाते हुए ऐसा प्रथम दृष्टया साक्ष्य पेश करता है जिससे आरोप पहली नजर में स्थापित होता हो, तो यह अंतरिम भरण-पोषण देने में कानूनी बाधा बन सकता है। अदालत ने कहा कि निचली अदालतों का यह कहना कि इस मुद्दे पर फैसला केवल अंतिम सुनवाई के समय ही होगा, कानून के उद्देश्य को निष्प्रभावी (Otiose) बना देता है।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता पति और पत्नी का विवाह वर्ष 2014 में हुआ था। वर्ष 2020 में दोनों के संबंध खराब होने के बाद पत्नी अपने बच्चे और कुछ सामान के साथ वैवाहिक घर छोड़कर चली गई। इसके बाद पत्नी ने धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण की मांग करते हुए आवेदन दायर किया। पति ने धारा 125(4) CrPC के तहत आवेदन दाखिल कर दावा किया कि पत्नी विवाहेतर संबंध में है, इसलिए उसे भरण-पोषण का अधिकार नहीं है। पति ने अपने दावे के समर्थन में कुछ तस्वीरें और अन्य दस्तावेज अदालत के समक्ष पेश किए। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए पति का आवेदन खारिज कर दिया कि इन दस्तावेजों की सत्यता और प्रामाणिकता का परीक्षण मुख्य मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही किया जाएगा। राजस्थान हाईकोर्ट ने भी इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने कानून की गलत व्याख्या की। यदि पति द्वारा पेश किए गए साक्ष्य पहली नजर में विवाहेतर संबंधों की ओर संकेत करते हैं, तो अदालत को धारा 125(4) CrPC के आवेदन पर प्रारंभिक स्तर पर ही विचार करना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने मामला दोबारा ट्रायल कोर्ट को भेजते हुए निर्देश दिया कि वह पति के आवेदन पर गुण-दोष (Merits) के आधार पर नया निर्णय ले।
क्या कहती है धारा 125(4) CrPC?
धारा 125(4) CrPC के अनुसार यदि पत्नी व्यभिचार (Living in Adultery) में रह रही हो, या बिना उचित कारण पति के साथ रहने से इनकार करती हो, अथवा दोनों आपसी सहमति से अलग रह रहे हों, तो ऐसी स्थिति में वह भरण-पोषण की हकदार नहीं होती।
यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय अंतरिम भरण-पोषण के मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पति प्रथम दृष्टया मजबूत साक्ष्य प्रस्तुत करता है, तो अदालत केवल यह कहकर आवेदन खारिज नहीं कर सकती कि इस मुद्दे का फैसला अंतिम सुनवाई में होगा। इससे भविष्य में पारिवारिक न्यायालयों और निचली अदालतों को धारा 125(4) CrPC के मामलों में स्पष्ट मार्गदर्शन मिलेगा।
मामले का विवरण
मामला: Himanshu Chordia बनाम State of Rajasthan एवं अन्य
पीठ: न्यायमूर्ति संजय करोल एवं न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली
फैसला: 31 जुलाई 2026
उद्धरण: 2026 (SC) 748
मुख्य मुद्दा:
क्या प्रथम दृष्टया विवाहेतर संबंध के साक्ष्य होने पर पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण से वंचित किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष: हां, यदि पति धारा 125(4) CrPC के तहत प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत कर देता है, तो अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार किया जा सकता है। अंतिम निर्णय मामले के तथ्यों और साक्ष्यों के मूल्यांकन पर निर्भर करेगा।
