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Supreme Court Verdict: फरार आरोपी के खिलाफ पुराने गवाह की गवाही पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, हत्या की सजा रद्द

क्या किसी फरार आरोपी को केवल पुराने मुकदमे में दर्ज गवाह के बयान के आधार पर दोषी ठहराया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि ट्रायल कोर्ट ने Section 299 CrPC (अब Section 335 BNSS) के तहत आवश्यक आदेश पारित नहीं किया है, तो मृत गवाह की पुरानी गवाही बाद के मुकदमे में आरोपी के खिलाफ इस्तेमाल नहीं की जा सकती। इसी सिद्धांत के आधार पर अदालत ने 18 साल बाद गिरफ्तार हत्या के आरोपी की दोषसिद्धि रद्द कर उसे बरी कर दिया।

Sonali01 अग. 2026, 03:25 PM IST
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Supreme Court Verdict: फरार आरोपी के खिलाफ पुराने गवाह की गवाही पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, हत्या की सजा रद्द

नई दिल्ली।

आपराधिक मुकदमों में फरार आरोपियों के खिलाफ साक्ष्यों के उपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। 31 जुलाई 2026 को न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी आरोपी के फरार रहने के दौरान उसके सह-आरोपी के मुकदमे में किसी गवाह का बयान दर्ज किया गया हो, तो उस बयान का उपयोग बाद में गिरफ्तार हुए आरोपी के खिलाफ तभी किया जा सकता है, जब ट्रायल कोर्ट ने पहले ही धारा 299 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) अथवा नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 335 के तहत आवश्यक आदेश पारित किया हो।

मामला क्या था?

अभियोजन के अनुसार वर्ष 1999 में दो व्यक्तियों पर हत्या का आरोप लगाया गया था। आरोप था कि मुख्य आरोपी ने मृतक का गला दबाकर हत्या की, जबकि दूसरे आरोपी ने लोगों को धमकाकर हस्तक्षेप करने से रोका। घटना के बाद मुख्य आरोपी फरार हो गया, जबकि सह-आरोपी के खिलाफ मुकदमा चला और वह बरी हो गया।

करीब 18 वर्ष बाद, वर्ष 2017 में मुख्य आरोपी को गिरफ्तार किया गया। तब तक मामले का प्रमुख प्रत्यक्षदर्शी (PW-1) की मृत्यु हो चुकी थी। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट और बाद में हाईकोर्ट ने सह-आरोपी के मुकदमे में दर्ज उसी गवाह के पुराने बयान पर भरोसा करते हुए आरोपी को दोषी ठहरा दिया। इसके खिलाफ आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

पीठ ने कहा कि Section 299 CrPC एक अपवादात्मक प्रावधान है। इसका उपयोग तभी किया जा सकता है जब अदालत पहले यह संतुष्ट हो जाए कि—

  • आरोपी वास्तव में फरार है।

  • उसकी तत्काल गिरफ्तारी की कोई संभावना नहीं है।

इन दोनों तथ्यों पर न्यायालय द्वारा विधिवत आदेश पारित किए बिना, फरार आरोपी की अनुपस्थिति में दर्ज किसी गवाह की गवाही को बाद के मुकदमे में उसके खिलाफ साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।  न्यायालय ने कहा कि वर्ष 1999 में न तो कमिटल के समय और न ही ट्रायल शुरू होने पर Section 299 CrPC के तहत कोई आदेश पारित किया गया था। इसलिए मृत हो चुके प्रत्यक्षदर्शी का बयान बाद में आरोपी के खिलाफ उपयोग करने का कोई वैधानिक आधार नहीं था।

दोषसिद्धि रद्द, आरोपी बरी

जस्टिस के. विनोद चंद्रन द्वारा लिखे गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि Section 299 CrPC के तहत आवश्यक न्यायिक आदेश पारित ही नहीं हुआ था, इसलिए मृत गवाह PW-1 की गवाही पर आधारित दोषसिद्धि कानूनन टिक नहीं सकती। अदालत ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों को निरस्त करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। 

हालिया फैसले से अलग राय

दिलचस्प बात यह है कि कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य समन्वय पीठ ने State of West Bengal v. Kader Khan, 2026 LiveLaw (SC) 692 में अलग दृष्टिकोण अपनाया था। उस मामले में न्यायालय ने कहा था कि यदि यह रिकॉर्ड से स्पष्ट हो कि आरोपी फरार था और उसकी तत्काल गिरफ्तारी संभव नहीं थी, तो केवल औपचारिक आदेश के अभाव में मृत गवाह की गवाही को अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। उस फैसले में कहा गया था कि Section 299 CrPC में औपचारिक आदेश की अनिवार्यता का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। 

हालांकि, महेंद्र सिंह मामले में न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस प्रश्न पर अलग निष्कर्ष निकाला और कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा अधिकार क्षेत्र से जुड़े तथ्यों पर विधिवत आदेश आवश्यक है, तभी ऐसे साक्ष्य का उपयोग बाद की सुनवाई में किया जा सकता है। 

फैसले का कानूनी महत्व

यह निर्णय आपराधिक न्याय प्रणाली में निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के सिद्धांत को और मजबूत करता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि किसी फरार आरोपी के खिलाफ भी अभियोजन को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन करना होगा। केवल इसलिए कि आरोपी लंबे समय तक फरार रहा, अदालत प्रक्रिया संबंधी आवश्यकताओं की अनदेखी नहीं कर सकती।

केस विवरण

मामला: Mahendra Singh v. State of Chhattisgarh

पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन

निर्णय: 31 जुलाई 2026

साइटेशन: 2026  (SC) 747 

प्रमुख बिंदु

  • बिना Section 299 CrPC/Section 335 BNSS के आदेश के पहले ट्रायल की गवाही बाद में गिरफ्तार आरोपी के खिलाफ स्वीकार्य नहीं।

  • अदालत को पहले यह रिकॉर्ड करना होगा कि आरोपी फरार था और उसकी तत्काल गिरफ्तारी संभव नहीं थी।

  • 18 वर्ष बाद गिरफ्तार आरोपी की हत्या के मामले में दोषसिद्धि सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की।

  • हालिया Kader Khan फैसले में इसी मुद्दे पर अलग कानूनी दृष्टिकोण सामने आया था।