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आवारा पशुओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: 15 लाख मुआवजा, सरकारों को नीति बनाने के निर्देश, समाज के रवैये पर भी उठाए सवाल

31 जुलाई 2026 को सुनाए गए एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आवारा पशुओं की समस्या को केवल सड़क दुर्घटनाओं का मुद्दा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और सरकारी जवाबदेही से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न बताया। न्यायालय ने कहा कि जब पशुओं की आर्थिक उपयोगिता खत्म हो जाती है तो उन्हें सड़कों पर बेसहारा छोड़ दिया जाता है, लेकिन यदि वही पशु भोजन के रूप में इस्तेमाल हों तो समाज आहत हो जाता है। इसी के साथ अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को पशुओं की टैगिंग, आश्रय गृहों और मुआवजा व्यवस्था पर ठोस नीति बनाने के महत्वपूर्ण सुझाव दिए तथा पीड़ित परिवार को 15 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश भी दिया।

Sonali01 अग. 2026, 03:33 PM IST
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आवारा पशुओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: 15 लाख मुआवजा, सरकारों को नीति बनाने के निर्देश, समाज के रवैये पर भी उठाए सवाल

नई दिल्ली: 31 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने आवारा पशुओं से होने वाली सड़क दुर्घटनाओं और मानव जीवन के नुकसान से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए समाज के विरोधाभासी रवैये पर कड़ी टिप्पणी की। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि एक ओर लोग पशुओं की आर्थिक उपयोगिता समाप्त होने पर उन्हें सड़कों पर बेसहारा छोड़ देते हैं और उनकी सुरक्षा की कोई परवाह नहीं करते, वहीं दूसरी ओर यदि उन्हीं पशुओं का उपयोग भोजन के रूप में किया जाए तो गहरी आपत्ति जताते हैं। इसी फैसले में अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को आवारा पशुओं की समस्या के स्थायी समाधान, पशुओं की टैगिंग, आश्रय गृहों की व्यवस्था तथा पीड़ितों के लिए प्रभावी मुआवजा तंत्र विकसित करने पर विचार करने के महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। यह टिप्पणी पंजाब के संगरूर निवासी विजय कुमार की मृत्यु से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की गई। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक व्यक्ति के मुआवजे का मामला नहीं है, बल्कि पूरे देश में आवारा पशुओं के कारण होने वाली दुर्घटनाओं और मौतों का गंभीर सार्वजनिक मुद्दा है, जिस पर सभी सरकारों को गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।


क्या है पूरा मामला?

मामले के अनुसार 21 सितंबर 2007 को विजय कुमार सड़क पर पैदल जा रहे थे, तभी एक आवारा सांड ने उन पर हमला कर दिया। सिर में गंभीर चोट लगने के कारण वह बेहोश हो गए। घटना की पुलिस में रिपोर्ट दर्ज हुई, लेकिन प्रशासन से मुआवजे की मांग पर कोई राहत नहीं मिली। बाद में उनकी मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनकी पत्नी निशा ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर उचित मुआवजे की मांग की। सिंगल जज ने 27 मई 2019 को परिवार को 29.32 लाख रुपये का मुआवजा 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित देने का आदेश दिया था। हालांकि 12 नवंबर 2025 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने यह कहते हुए आदेश रद्द कर दिया कि मामले में विवादित तथ्य हैं और याचिका के बजाय दीवानी अदालत में जाना चाहिए। इसके खिलाफ निशा ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की।


सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा

31 जुलाई 2026 को सुनाए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घटना वर्ष 2007 की है और लगभग दो दशक बाद पीड़ित परिवार को दोबारा सिविल कोर्ट भेजना न्याय के हित में नहीं होगा। अदालत ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए पीड़ित परिवार को 15 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया, जिसे चार सप्ताह के भीतर अदा करने को कहा गया। साथ ही स्पष्ट किया कि यह आदेश इस मामले के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर है और इसे भविष्य के मामलों में नजीर नहीं माना जाएगा।


अदालत ने कहा- यह राष्ट्रीय स्तर की समस्या

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देशभर में आए दिन आवारा गायों और सांडों के कारण सड़क दुर्घटनाएं होती हैं। कई बार लोगों की जान चली जाती है, जबकि कई बार स्वयं पशु भी दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। अदालत ने कहा कि यह स्थिति मानव जीवन और पशु कल्याण दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। फैसले में वर्ष 2018 से 2020 के बीच पशुओं के कारण हुई मौतों के सरकारी आंकड़ों का भी उल्लेख किया गया।


समाज के विरोधाभासी रवैये पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

अदालत ने कहा कि वास्तविकता यह है कि जब पशु दूध देना या खेती में उपयोगी रहना बंद कर देते हैं तो उन्हें सड़कों पर छोड़ दिया जाता है। लेकिन यदि उन्हीं पशुओं का उपयोग भोजन के रूप में किया जाए तो समाज का एक वर्ग गहरी नाराजगी व्यक्त करता है। न्यायालय ने कहा कि सबसे पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ऐसे पशुओं को सुरक्षित आश्रय मिले और वे सड़कों पर न भटकें।


संविधान और पशु संरक्षण पर अदालत की टिप्पणी


फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 48 और अनुच्छेद 51(ए)(जी) का उल्लेख करते हुए कहा कि पशुओं की रक्षा केवल सरकार का ही नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक का भी संवैधानिक दायित्व है। अदालत ने कहा कि सभी जीवों के प्रति करुणा रखना भारतीय संविधान की मूल भावना का हिस्सा है और इसे व्यवहार में लागू किया जाना चाहिए।


केंद्र और राज्यों को दिए महत्वपूर्ण सुझाव 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सुझाव दिया कि सभी राज्यों में पशुओं की अनिवार्य टैगिंग की जाए, प्रत्येक नगर निकाय में नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए, पर्याप्त गौशालाएं एवं पशु आश्रय गृह स्थापित किए जाएं, आवारा पशुओं को छोड़ने वाले मालिकों की जवाबदेही तय की जाए तथा आवारा पशुओं से होने वाली दुर्घटनाओं में पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था बनाई जाए। अदालत ने इस फैसले की प्रति सभी राज्यों के मुख्य सचिवों, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों तथा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजने का निर्देश भी दिया।


कानूनी महत्व

यह फैसला केवल एक मुआवजा विवाद तक सीमित नहीं है। 31 जुलाई 2026 का यह निर्णय आवारा पशुओं के प्रबंधन, नागरिकों की सुरक्षा, पशु कल्याण, संवैधानिक दायित्वों और सरकारों की जिम्मेदारी पर सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में इस फैसले के आधार पर केंद्र और राज्य सरकारें आवारा पशुओं के नियंत्रण और पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए व्यापक नीति तैयार कर सकती हैं।