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भोपाल गैस पीड़ित बस्तियों में दूषित पेयजल का दावा, जांच रिपोर्ट से बढ़ी स्वास्थ्य संबंधी चिंता l

भोपाल गैस त्रासदी के चार दशक बाद भी प्रभावित क्षेत्रों के लोगों की समस्याएं कम होती नजर नहीं आ रही हैं। गैस पीड़ित संगठनों ने दावा किया है कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के आसपास की कई बस्तियों में सप्लाई किया जा रहा पेयजल मल (फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया) से दूषित है, जिससे हजारों लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। संगठनों द्वारा जारी जांच रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई में 30 बस्तियों के 63 पानी के नमूनों की जांच कराई गई, जिनमें से 43 नमूने दूषित पाए गए। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि भोपाल नगर निगम द्वारा सीवेज और ड्रेनेज व्यवस्था में सुधार नहीं किए जाने के कारण स्थिति लगातार बिगड़ रही है। संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो भोपाल में भी इंदौर के भागीरथपुरा जैसी गंभीर जल संकट और स्वास्थ्य आपदा की स्थिति पैदा हो सकती है।

Kashish Rai01 अग. 2026, 09:25 PM IST
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भोपाल गैस पीड़ित बस्तियों में दूषित पेयजल का दावा, जांच रिपोर्ट से बढ़ी स्वास्थ्य संबंधी चिंता l

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में वर्ष 1984 की यूनियन कार्बाइड गैस त्रासदी के चार दशक बाद भी प्रभावित क्षेत्रों के लोगों की परेशानियां खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। अब गैस पीड़ितों के लिए काम करने वाले विभिन्न संगठनों ने एक नई जांच रिपोर्ट जारी करते हुए दावा किया है कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के आसपास स्थित कई बस्तियों में सप्लाई किया जा रहा पेयजल गंभीर रूप से दूषित है। उनका कहना है कि पानी में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए गए हैं, जो इस बात का संकेत हैं कि पानी मल से प्रदूषित हो चुका है और इसके सेवन से कई संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।


शुक्रवार को आयोजित एक संयुक्त प्रेस वार्ता में चार गैस पीड़ित संगठनों ने अपनी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की। संगठनों का आरोप है कि भोपाल नगर निगम की लापरवाही और सीवेज व्यवस्था की खराब स्थिति के कारण यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से सटे इलाकों में रहने वाले हजारों लोगों का स्वास्थ्य खतरे में पड़ गया है। उन्होंने कहा कि यदि जल्द सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो भोपाल में भी इंदौर के भागीरथपुरा जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है, जहां दूषित पानी के कारण बड़ी संख्या में लोग बीमार हुए थे। संगठनों के अनुसार, जुलाई महीने में 30 बस्तियों के 63 नलों से पानी के नमूने एकत्र कर उनकी प्रयोगशाला में जांच कराई गई। जांच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 43 नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए गए, जो पानी के मल से दूषित होने का संकेत हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, जांच में शामिल 30 में से 19 बस्तियों तक दूषित पानी पहुंच रहा है। इसके अलावा, अपर लेक (बड़ा तालाब) से आने वाले पानी के लगभग 90 प्रतिशत नमूने और कोलार डैम से सप्लाई होने वाले पानी के लगभग 25 प्रतिशत नमूने भी कथित रूप से दूषित पाए गए।


भोपाल गैस पीड़ित महिला पुरुष संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष नवाब खान ने कहा कि यह केवल पानी की गुणवत्ता का मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का गंभीर संकट है। उनका कहना है कि यदि लोगों को लगातार ऐसा पानी पीना पड़ा, तो जलजनित बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ सकता है। वहीं भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संघ की अध्यक्ष रशीदा बी ने आरोप लगाया कि प्रभावित बस्तियों में पिछले कुछ समय से दस्त, उल्टी, बुखार और टाइफाइड जैसे मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। उनके अनुसार कई परिवार एक साथ बीमार पड़ रहे हैं, जिससे स्थानीय स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दबाव बढ़ रहा है।


संगठनों ने याद दिलाया कि वर्ष 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड के जहरीले कचरे से भूजल प्रदूषण को देखते हुए प्रभावित क्षेत्रों में पाइपलाइन के माध्यम से स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। इसके बाद वर्ष 2018 में पाइपलाइन के पानी में मल-संदूषण की शिकायतों पर सर्वोच्च न्यायालय ने भोपाल नगर निगम को सीवेज लाइन और ड्रेनेज व्यवस्था विकसित करने का आदेश दिया था। उस समय नगर निगम ने तीन महीने के भीतर काम पूरा करने का आश्वासन दिया था, लेकिन संगठनों का आरोप है कि आठ वर्ष बाद भी इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई।


भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉर्मेशन एंड एक्शन की सदस्य रचना धींगरा ने कहा कि यदि वर्तमान स्थिति को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो भविष्य में बड़े पैमाने पर जलजनित बीमारियों का प्रकोप फैल सकता है। उन्होंने मांग की कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का तत्काल पालन कराया जाए, जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए, सीवेज और ड्रेनेज परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाए तथा प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता की स्वतंत्र और नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाए। फिलहाल, गैस पीड़ित संगठनों ने सरकार और नगर निगम से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। वहीं, इस संबंध में संबंधित सरकारी एजेंसियों की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है। यह मामला एक बार फिर दर्शाता है कि भोपाल गैस त्रासदी से प्रभावित लोगों के सामने आज भी स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं।