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SBSTTA-28 में जैव विविधता संरक्षण पर वैश्विक मंथन, COP17 से पहले सहमति और चुनौतियों के बीच खत्म हुई नैरोबी बैठक

जैव विविधता संरक्षण से जुड़े वैज्ञानिक, तकनीकी और नीतिगत मुद्दों पर चर्चा करने वाली संयुक्त राष्ट्र समर्थित महत्वपूर्ण बैठक SBSTTA-28 (Subsidiary Body on Scientific, Technical and Technological Advice) का समापन केन्या की राजधानी नैरोबी में हुआ। बैठक में दुनिया भर के देशों ने जैव विविधता संकट से निपटने, वैज्ञानिक जानकारी को मजबूत करने और वैश्विक संरक्षण लक्ष्यों को लागू करने के तरीकों पर चर्चा की।

Anshuman Mishra02 अग. 2026, 09:01 PM IST
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SBSTTA-28 में जैव विविधता संरक्षण पर वैश्विक मंथन, COP17 से पहले सहमति और चुनौतियों के बीच खत्म हुई नैरोबी बैठक
हालांकि कई मुद्दों पर देशों के बीच सहमति बनी, लेकिन वित्तीय सहायता, आनुवंशिक संसाधनों से मिलने वाले लाभों के बंटवारे और कुछ तकनीकी विषयों पर मतभेद भी सामने आए।

यह बैठक आगामी CBD COP17 (Convention on Biological Diversity Conference of the Parties) की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। COP17 का आयोजन येरेवान, आर्मेनिया में होना प्रस्तावित है, जहां दुनिया के देश जैव विविधता संरक्षण से जुड़े बड़े फैसलों पर चर्चा करेंगे।

जैव विविधता संकट से निपटना बना मुख्य एजेंडा
SBSTTA-28 में दुनिया भर के वैज्ञानिकों, सरकारी प्रतिनिधियों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने तेजी से घटती जैव विविधता पर चिंता जताई। मानव गतिविधियों, जंगलों की कटाई, भूमि उपयोग में बदलाव, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी पर कई प्रजातियां विलुप्ति के खतरे का सामना कर रही हैं।

बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि जैव विविधता केवल वन्यजीव संरक्षण का विषय नहीं है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, जल संसाधन, कृषि और जलवायु स्थिरता से भी सीधे जुड़ा हुआ है। विशेषज्ञों ने कहा कि प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए केवल संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा और स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी है।

कुनमिंग-मॉन्ट्रियल फ्रेमवर्क के क्रियान्वयन पर चर्चा
बैठक का प्रमुख विषय कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क (KMGBF) रहा। यह वैश्विक ढांचा वर्ष 2022 में CBD COP15 में अपनाया गया था, जिसमें 2030 तक जैव विविधता संरक्षण के लिए कई लक्ष्य तय किए गए हैं।

इसके तहत दुनिया के देशों ने भूमि और समुद्री क्षेत्रों के संरक्षण को बढ़ाने, प्रदूषण कम करने, विलुप्तप्राय प्रजातियों की सुरक्षा करने और प्रकृति आधारित समाधानों को बढ़ावा देने जैसे लक्ष्य निर्धारित किए हैं। SBSTTA-28 में देशों ने इस बात पर चर्चा की कि इन लक्ष्यों की प्रगति को मापने के लिए वैज्ञानिक संकेतकों और निगरानी व्यवस्था को कैसे बेहतर बनाया जाए।

जैव विविधता निगरानी के लिए बेहतर डेटा की जरूरत
बैठक में वैज्ञानिक आंकड़ों की उपलब्धता और गुणवत्ता को लेकर भी चर्चा हुई। कई देशों ने कहा कि जैव विविधता की वास्तविक स्थिति जानने के लिए मजबूत डेटा प्रणाली जरूरी है।

विकासशील देशों ने विशेष रूप से यह मुद्दा उठाया कि उनके पास कई बार प्रजातियों की निगरानी, जैविक संसाधनों का अध्ययन और पर्यावरणीय बदलावों का आकलन करने के लिए पर्याप्त तकनीकी संसाधन नहीं होते।उन्होंने विकसित देशों से तकनीकी सहयोग, प्रशिक्षण और वैज्ञानिक क्षमता निर्माण में सहायता बढ़ाने की मांग की।

डिजिटल सीक्वेंस इंफॉर्मेशन पर देशों में मतभेद
SBSTTA-28 में डिजिटल सीक्वेंस इंफॉर्मेशन (DSI) एक प्रमुख विवादित मुद्दा रहा। DSI का संबंध जीवों के आनुवंशिक डेटा से है, जिसका उपयोग वैज्ञानिक अनुसंधान, दवा विकास, कृषि सुधार और जैव प्रौद्योगिकी में किया जाता है। कई विकासशील देशों का कहना है कि यदि उनके जैविक संसाधनों से प्राप्त आनुवंशिक जानकारी का व्यावसायिक उपयोग होता है, तो उससे मिलने वाले लाभों में उनका उचित हिस्सा होना चाहिए।

वहीं, कुछ देशों और वैज्ञानिक समुदाय ने चिंता जताई कि लाभ साझा करने की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचार बाधित न हों। इस मुद्दे पर अंतिम समाधान के लिए COP17 में आगे बातचीत जारी रहने की उम्मीद है।

वित्तीय संसाधनों पर फिर उठा सवाल
जैव विविधता संरक्षण के लिए वित्तीय संसाधनों की कमी एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई। विकासशील देशों ने कहा कि वैश्विक जैव विविधता लक्ष्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराना जरूरी है।

उन्होंने विकसित देशों से अधिक वित्तीय सहायता, तकनीकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण में सहयोग की मांग की। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि संरक्षण योजनाओं के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं होंगे, तो 2030 तक निर्धारित जैव विविधता लक्ष्यों को हासिल करना कठिन हो सकता है।

स्थानीय समुदायों और आदिवासी समूहों की भूमिका पर जोर
बैठक में स्थानीय समुदायों और आदिवासी समूहों के पारंपरिक ज्ञान की भूमिका पर भी चर्चा हुई। कई देशों ने माना कि सदियों से प्रकृति के साथ रहने वाले समुदाय जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि संरक्षण नीतियों में स्थानीय समुदायों के अधिकारों और अनुभवों को शामिल करना आवश्यक है, ताकि संरक्षण प्रयास अधिक प्रभावी और टिकाऊ बन सकें।

COP17 के लिए तैयार होगा वैज्ञानिक आधार
SBSTTA-28 के निष्कर्ष और वैज्ञानिक सलाह अब CBD COP17 में प्रस्तुत की जाएगी। COP17 में सदस्य देश जैव विविधता लक्ष्यों की प्रगति की समीक्षा करेंगे और आगे की रणनीति तय करेंगे।

COP17 में विशेष रूप से इन मुद्दों पर ध्यान रहने की संभावना है:
  • 2030 जैव विविधता लक्ष्यों की प्रगति
  • संरक्षण के लिए वित्तीय व्यवस्था
  • डिजिटल आनुवंशिक संसाधनों से लाभ साझा करना
  • वैज्ञानिक निगरानी प्रणाली को मजबूत करना
  • प्रकृति संरक्षण में वैश्विक सहयोग बढ़ाना
  • भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है जैव विविधता एजेंडा

भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां जैव विविधता की अत्यधिक विविधता पाई जाती है। पश्चिमी घाट, हिमालय, मैंग्रोव क्षेत्र और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र कई दुर्लभ प्रजातियों के घर हैं। भारत ने जैव विविधता संरक्षण के लिए राष्ट्रीय जैव विविधता कार्य योजना, संरक्षित क्षेत्रों के विस्तार और जैव संसाधनों के सतत उपयोग जैसी पहलों को आगे बढ़ाया है।

वैश्विक स्तर पर होने वाली SBSTTA और CBD बैठकों में भारत जैव संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग, विकासशील देशों के हितों और संरक्षण के लिए वित्तीय सहायता जैसे मुद्दों पर लगातार अपनी स्थिति रखता रहा है।

SBSTTA-28 ने जैव विविधता संरक्षण के लिए वैज्ञानिक आधार तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बैठक में देशों ने सहयोग की आवश्यकता को स्वीकार किया, लेकिन वित्त, तकनीकी संसाधन और लाभ साझा करने जैसे मुद्दों पर मतभेद अभी बने हुए हैं।

अब सभी की नजरें CBD COP17 पर हैं, जहां दुनिया के देश यह तय करेंगे कि जैव विविधता संकट से निपटने के लिए वैश्विक प्रयासों को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाए। आने वाले वर्षों में प्रकृति संरक्षण के लिए किए गए फैसले पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को प्रभावित करेंगे।