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निर्माण और विध्वंस कचरे का संकट: भारत को प्रभावी रीसाइक्लिंग व्यवस्था की जरूरत

भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, शहरीकरण और रियल एस्टेट क्षेत्र की तेज रफ्तार ने देश की अर्थव्यवस्था को नई गति दी है। नए एक्सप्रेसवे, मेट्रो नेटवर्क, आवासीय परियोजनाएं, औद्योगिक कॉरिडोर और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं के विस्तार के साथ निर्माण गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। लेकिन इस विकास के साथ एक बड़ी चुनौती भी सामने आई है—निर्माण एवं विध्वंस कचरा यानी Construction and Demolition (C&D) Waste।

Anshuman Mishra02 अग. 2026, 09:01 PM IST
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निर्माण और विध्वंस कचरे का संकट: भारत को प्रभावी रीसाइक्लिंग व्यवस्था की जरूरत
पुराने भवनों को तोड़ने, नई इमारतों के निर्माण और सड़कों व अन्य बुनियादी ढांचे के विकास से निकलने वाला मलबा अब देश के शहरों के लिए गंभीर पर्यावरणीय और प्रबंधन चुनौती बन चुका है। यदि इस कचरे को वैज्ञानिक तरीके से एकत्रित, अलग और पुनर्चक्रित नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह शहरी प्रदूषण और संसाधनों की कमी को और बढ़ा सकता है।

हर साल उत्पन्न हो रहा है भारी मात्रा में निर्माण मलबा
भारत में हर साल बड़ी मात्रा में निर्माण एवं विध्वंस कचरा उत्पन्न होता है। इसमें मुख्य रूप से कंक्रीट, ईंट, सीमेंट, रेत, पत्थर, धातु, लकड़ी, कांच, प्लास्टर और अन्य निर्माण सामग्री शामिल होती है। बढ़ती आबादी और शहरों के विस्तार के कारण आने वाले वर्षों में C&D वेस्ट की मात्रा और बढ़ने की संभावना है। खासतौर पर महानगरों में पुराने भवनों के पुनर्विकास, फ्लाईओवर, मेट्रो परियोजनाओं और बड़े आवासीय प्रोजेक्ट्स के कारण निर्माण मलबे की समस्या तेजी से बढ़ रही है।

दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, पुणे, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहरों में निर्माण गतिविधियों के कारण बड़ी मात्रा में मलबा निकलता है। कई बार यह मलबा खाली जमीनों, नदियों के किनारे या सड़कों के आसपास अवैध रूप से डाल दिया जाता है।

निर्माण कचरे का गलत तरीके से निपटान कई तरह की समस्याएं पैदा करता है।
  • सबसे पहले, खुले में पड़े मलबे से धूल और सूक्ष्म कण (PM10 और PM2.5) बढ़ते हैं, जिससे वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है। निर्माण स्थलों के आसपास रहने वाले लोगों और श्रमिकों में सांस संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
  • दूसरी ओर, भारी मात्रा में मलबा जमीन पर जमा होने से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। बारिश के दौरान यह कचरा जल निकासी व्यवस्था को बाधित कर सकता है, जिससे शहरी इलाकों में जलभराव की समस्या बढ़ सकती है। इसके अलावा, जब उपयोगी निर्माण सामग्री को बिना रीसाइक्लिंग के फेंक दिया जाता है, तो प्राकृतिक संसाधनों जैसे रेत, बजरी और पत्थर की मांग बढ़ती है। इससे खनन गतिविधियों पर दबाव बढ़ता है और पर्यावरणीय नुकसान होता है।

C&D वेस्ट में छिपा है दोबारा इस्तेमाल का बड़ा अवसर
विशेषज्ञों के अनुसार निर्माण एवं विध्वंस कचरा वास्तव में कचरा नहीं बल्कि एक उपयोगी संसाधन है। सही तकनीक के माध्यम से इसके बड़े हिस्से को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है।

कंक्रीट और ईंटों को क्रश करके पुनर्नवीनीकृत एग्रीगेट (Recycled Aggregate) बनाया जा सकता है। इसका इस्तेमाल सड़क निर्माण, पेवर ब्लॉक, फुटपाथ, फिलिंग मटेरियल और कुछ निर्माण कार्यों में किया जा सकता है। इसी तरह धातु, लकड़ी और कांच को अलग करके दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है। इससे निर्माण उद्योग की प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता कम होगी और कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आएगी।

भारत में नियम मौजूद, लेकिन जमीनी स्तर पर चुनौतियां
भारत सरकार ने C&D Waste Management Rules, 2016 के माध्यम से निर्माण कचरे के प्रबंधन के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन नियमों के तहत निर्माण एजेंसियों और स्थानीय निकायों को कचरे के संग्रह, परिवहन, प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण की व्यवस्था सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है।

कई बड़े शहरों में C&D वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट भी स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों पर मलबे को छांटकर उपयोगी सामग्री में बदला जाता है।

हालांकि, देशभर में अभी भी कई चुनौतियां मौजूद हैं:
  • निर्माण स्थलों पर कचरे का सही तरीके से पृथक्करण नहीं होना
  • अवैध रूप से मलबा फेंकने की समस्या
  • रीसाइक्लिंग प्लांट की सीमित संख्या
  • पुनर्चक्रित सामग्री के उपयोग को लेकर जागरूकता की कमी
  • स्थानीय निकायों की निगरानी व्यवस्था कमजोर होना
  • नगर निकायों और निर्माण कंपनियों की जिम्मेदारी

C&D वेस्ट प्रबंधन को सफल बनाने के लिए नगर निकायों, निर्माण कंपनियों और आम नागरिकों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।

नगर निगमों को अलग C&D वेस्ट कलेक्शन सिस्टम विकसित करना होगा। निर्माण कंपनियों को निर्माण स्थल पर ही कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटना चाहिए ताकि उसका बेहतर पुनर्चक्रण हो सके। इसके अलावा सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकारी निर्माण परियोजनाओं में पुनर्चक्रित निर्माण सामग्री के इस्तेमाल को बढ़ावा मिले।

सर्कुलर इकोनॉमी से मिल सकता है समाधान
भारत यदि निर्माण क्षेत्र में सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल अपनाता है, तो C&D वेस्ट को बड़ी समस्या के बजाय आर्थिक अवसर में बदला जा सकता है।

इस मॉडल में पुराने संसाधनों को फेंकने के बजाय उन्हें दोबारा उपयोग में लाया जाता है। इससे:
  • प्राकृतिक संसाधनों की बचत होगी
  • निर्माण लागत कम हो सकती है
  • लैंडफिल पर दबाव घटेगा
  • रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे
  • पर्यावरणीय नुकसान कम होगा
  • तकनीक और नवाचार की जरूरत

आधुनिक तकनीकों जैसे मोबाइल क्रशिंग यूनिट, स्वचालित छंटाई प्रणाली और डिजिटल ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से C&D वेस्ट प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। कई देशों में निर्माण मलबे के 80-90 प्रतिशत तक हिस्से को रीसाइकिल किया जाता है। भारत में भी ऐसी तकनीकों और बेहतर नीतियों को अपनाकर रीसाइक्लिंग दर को बढ़ाया जा सकता है।

भारत में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने के लिए निर्माण एवं विध्वंस कचरे का प्रभावी प्रबंधन बेहद जरूरी है। तेजी से बढ़ते शहरों में केवल नए निर्माण करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पुराने संसाधनों का जिम्मेदार उपयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बेहतर नियमों के पालन, आधुनिक रीसाइक्लिंग सुविधाओं, सरकारी समर्थन और उद्योग की जिम्मेदारी से भारत C&D वेस्ट को प्रदूषण के स्रोत से बदलकर एक मूल्यवान संसाधन में बदल सकता है।