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असम समेत 33 राज्यों को मिला जैव विविधता संरक्षण के लिए फंड, उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा लाभार्थी

भारत के जैविक संसाधनों के संरक्षण और उनके व्यावसायिक उपयोग से होने वाले लाभों को समान रूप से साझा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने चावल अनुसंधान संस्थानों और चावल उत्पादक राज्यों के बीच 8.22 करोड़ रुपये का वितरण किया है।

Anshuman Mishra02 अग. 2026, 09:01 PM IST
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असम समेत 33 राज्यों को मिला जैव विविधता संरक्षण के लिए फंड, उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा लाभार्थी

 यह राशि देश में चावल के लिए अब तक के सबसे बड़े एकल पहुंच एवं लाभ-साझाकरण (Access and Benefit Sharing-ABS) वितरणों में से एक मानी जा रही है।

यह भुगतान अंतरराष्ट्रीय बीज कंपनी मेसर्स पायनियर ओवरसीज कॉर्पोरेशन द्वारा भारतीय चावल (ओराइज़ा सैटिवा) की किस्मों का उपयोग कर विकसित और व्यावसायिक रूप से बेचे गए संकर बीजों के बदले किया गया है। यह पहल इस बात का उदाहरण है कि भारत अपनी जैविक संपदा और पारंपरिक कृषि ज्ञान के उपयोग से होने वाले आर्थिक लाभों को संबंधित संस्थानों और राज्यों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है।

अनुसंधान संस्थानों को मिला 2.47 करोड़ रुपये

कुल 8.22 करोड़ रुपये में से 2.47 करोड़ रुपये उन अनुसंधान संस्थानों को दिए गए हैं जिन्होंने चावल की विभिन्न किस्मों का संरक्षण किया और उन्हें अनुसंधान एवं विकास के लिए उपलब्ध कराया।

सबसे बड़ा हिस्सा हैदराबाद स्थित आईसीएआर-भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान को मिला, जिसे लगभग 2.43 करोड़ रुपये प्रदान किए गए। वहीं उत्तराखंड के गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय को उसकी विशेष चावल किस्म के योगदान के लिए 3.26 लाख रुपये दिए गए।

इन संस्थानों द्वारा प्राप्त धनराशि का उपयोग जर्मप्लाज्म संरक्षण, बीज संग्रहों के रखरखाव, अनुसंधान गतिविधियों और वैज्ञानिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को मजबूत करने में किया जाएगा।

33 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को मिला 5.75 करोड़ रुपये

एनबीए ने कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के एकीकृत कृषि सांख्यिकी पोर्टल में दर्ज धान उत्पादन क्षेत्र के आधार पर 33 राज्य जैव विविधता बोर्डों और केंद्रशासित प्रदेश जैव विविधता परिषदों के बीच 5.75 करोड़ रुपये का वितरण किया।

उत्तर प्रदेश को सबसे अधिक 73.26 लाख रुपये मिले, जबकि पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, ओडिशा और छत्तीसगढ़ भी शीर्ष लाभार्थी राज्यों में शामिल रहे।

शीर्ष 10 राज्यों को मिला आवंटन
| राज्य.            | राशि (रुपये) |
| ------------ | -----------: |
| उत्तर प्रदेश     | 73,26,225 |
| पश्चिम बंगाल | 64,94,795 |
| तेलंगाना.       | 50,59,674 |
| ओडिशा         | 48,09,040 |
| छत्तीसगढ़      | 45,90,940 |
| पंजाब           | 37,14,926 |
| बिहार            | 36,93,237 |
| मध्य प्रदेश      | 36,16,118 |
| असम             | 27,78,664 |
| आंध्र प्रदेश.     | 25,88,278 |

असम के लिए क्यों है यह महत्वपूर्ण?
असम को इस वितरण के तहत 27.78 लाख रुपये प्राप्त हुए हैं। राज्य की समृद्ध धान जैव विविधता, पारंपरिक धान किस्मों और किसानों की स्थानीय कृषि विरासत को देखते हुए यह राशि संरक्षण कार्यों को नई गति दे सकती है।

राज्य जैव विविधता बोर्ड इस धन का उपयोग देशी धान किस्मों के संरक्षण, पारंपरिक कृषि ज्ञान के दस्तावेजीकरण, स्थानीय किसानों को सहयोग देने तथा जैव विविधता संरक्षण परियोजनाओं में करेगा। असम में सुगंधित और पारंपरिक धान की अनेक दुर्लभ किस्में पाई जाती हैं, जिनका संरक्षण भविष्य की खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल कृषि के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

किसानों और जैव विविधता संरक्षण को मिलेगा लाभ
राज्य जैव विविधता बोर्डों को प्राप्त राशि का उपयोग देशी फसलों की विविधता को बचाने, पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन, पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण तथा स्थानीय समुदायों और किसानों को प्रोत्साहन देने के लिए किया जाएगा। इससे कृषि जैव विविधता को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।

83 करोड़ रुपये से अधिक का एबीएस भुगतान
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के अनुसार कृषि और बीज क्षेत्र से अब तक लगभग 83 करोड़ रुपये का एबीएस भुगतान प्राप्त हो चुका है। वहीं सभी क्षेत्रों को मिलाकर अब तक 162 करोड़ रुपये से अधिक का लाभ-साझाकरण वितरण किया जा चुका है।

यह पहल संयुक्त राष्ट्र के कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचे के लक्ष्य-13 के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य आनुवंशिक संसाधनों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान के उपयोग से प्राप्त लाभों का निष्पक्ष और समान वितरण सुनिश्चित करना है। साथ ही यह सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी-2, एसडीजी-12, एसडीजी-15 और एसडीजी-17) की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है।

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण क्या है?
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत स्थापित एक वैधानिक संस्था है। इसका मुख्य कार्य भारत के जैविक संसाधनों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान तक पहुंच को विनियमित करना तथा नागोया प्रोटोकॉल के तहत निष्पक्ष एवं समान लाभ-साझाकरण व्यवस्था को लागू करना है।