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ऑटिज्म के इलाज में स्टेम सेल थेरेपी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, केंद्र से मांगी वैज्ञानिक रिपोर्ट; क्लीनिकल ट्रायल के बाहर इस्तेमाल पर रोक
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (Autism Spectrum Disorder - ASD) के उपचार में स्टेम सेल थेरेपी के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण रुख अपनाया है। अदालत ने केंद्र सरकार से इस उपचार पद्धति से जुड़े वैज्ञानिक प्रमाणों, नियामकीय स्थिति और मौजूदा शोध की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
Vindhya Dubey02 अग. 2026, 09:02 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर स्टेम सेल थेरेपी को ऑटिज्म का स्वीकृत या नियमित इलाज नहीं माना जा सकता और इसका उपयोग फिलहाल केवल अधिकृत क्लीनिकल ट्रायल तक ही सीमित रहना चाहिए।
अदालत ने सुनवाई के दौरान ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों और उनके परिवारों को ऐसे उपचारों से बचाने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिनके प्रभाव को लेकर पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। कोर्ट ने उपचार के नाम पर किए जा रहे भ्रामक प्रचार, अतिरंजित दावों और मरीजों के संभावित आर्थिक शोषण पर चिंता व्यक्त की।
स्टेम सेल थेरेपी को लेकर वैज्ञानिक प्रमाणों की कमी
स्टेम सेल थेरेपी चिकित्सा विज्ञान का एक उभरता हुआ क्षेत्र है, जिसमें शरीर की विशेष कोशिकाओं की मदद से क्षतिग्रस्त ऊतकों या अंगों की मरम्मत की संभावनाओं पर शोध किया जाता है। हालांकि, ऑटिज्म जैसे न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर में इसका उपयोग अभी प्रयोगात्मक स्तर पर ही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऑटिज्म मस्तिष्क के विकास और कार्यप्रणाली से जुड़ी एक जटिल स्थिति है, जिसके लक्षण व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग-अलग हो सकते हैं। वर्तमान समय में ऑटिज्म के प्रबंधन के लिए व्यवहारिक थेरेपी, स्पीच और लैंग्वेज थेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, सामाजिक कौशल प्रशिक्षण और विशेष शैक्षणिक सहायता जैसी वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित पद्धतियों का इस्तेमाल किया जाता है।
कई निजी केंद्रों द्वारा स्टेम सेल थेरेपी को ऑटिज्म के संभावित इलाज के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक बड़े स्तर पर किए गए नियंत्रित क्लीनिकल ट्रायल यह साबित नहीं कर पाए हैं कि यह उपचार ऑटिज्म के मुख्य लक्षणों को स्थायी रूप से सुधार सकता है।
केंद्र से मांगी गई रिपोर्ट में क्या होगा शामिल
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से स्टेम सेल थेरेपी की वैज्ञानिक स्थिति और नियामकीय पहलुओं पर जानकारी देने को कहा है। रिपोर्ट में मुख्य रूप से यह देखा जाएगा कि:
- ऑटिज्म के इलाज में स्टेम सेल थेरेपी को लेकर अब तक कितने वैज्ञानिक अध्ययन किए गए हैं।
- इन अध्ययनों में उपचार की प्रभावशीलता और सुरक्षा को लेकर क्या निष्कर्ष सामने आए हैं।
- भारत में किन संस्थानों या केंद्रों में स्टेम सेल आधारित उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है।
- क्या ऐसे उपचारों के लिए उचित अनुमति और नियामकीय निगरानी मौजूद है।
- मरीजों को गुमराह करने वाले दावों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
मरीजों के परिवारों के लिए चेतावनी
ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के माता-पिता अक्सर बेहतर उपचार की तलाश में रहते हैं। इसी का फायदा उठाकर कुछ संस्थान महंगे उपचार पैकेज और त्वरित सुधार के दावे करते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि परिवारों को किसी भी नई थेरेपी को अपनाने से पहले उसके वैज्ञानिक प्रमाण, डॉक्टर की सलाह और नियामकीय मंजूरी की जानकारी जरूर लेनी चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऑटिज्म का कोई एक ऐसा उपचार उपलब्ध नहीं है जो हर व्यक्ति पर समान प्रभाव डाले। शुरुआती पहचान और समय पर थेरेपी से बच्चों के संचार, सीखने और सामाजिक कौशल में सुधार लाया जा सकता है।
क्लीनिकल ट्रायल क्यों जरूरी हैं
चिकित्सा विज्ञान में किसी भी नई थेरेपी को सामान्य उपयोग में लाने से पहले कई चरणों के क्लीनिकल ट्रायल किए जाते हैं। इन परीक्षणों में यह देखा जाता है कि उपचार कितना प्रभावी है, इसके क्या दुष्प्रभाव हो सकते हैं और यह मरीजों के लिए कितना सुरक्षित है। स्टेम सेल थेरेपी के मामले में भी विशेषज्ञों का मानना है कि पर्याप्त संख्या में मरीजों पर लंबे समय तक किए गए अध्ययन जरूरी हैं, ताकि इसके वास्तविक लाभ और जोखिमों का मूल्यांकन किया जा सके।
ऑटिज्म उपचार में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर जोर
सुप्रीम कोर्ट का यह कदम ऑटिज्म उपचार के क्षेत्र में वैज्ञानिक प्रमाणों और मरीजों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि नई चिकित्सा तकनीकों को बढ़ावा देना जरूरी है, लेकिन उन्हें प्रमाण आधारित चिकित्सा मानकों के अनुरूप ही अपनाया जाना चाहिए। फिलहाल ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल थेरेपी को नियमित इलाज का विकल्प नहीं माना गया है। जब तक मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं होते, तब तक इसका इस्तेमाल केवल स्वीकृत शोध और क्लीनिकल ट्रायल के दायरे में ही किया जाना उचित होगा।
