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पुणे में आरोपी का जुलूस निकालने पर मानवाधिकार आयोग सख्त, मुख्य सचिव और पुलिस आयुक्त समेत 11 अधिकारियों को नोटिस
महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग ने पुणे में एक आरोपी का सार्वजनिक रूप से जुलूस निकालने, उसे अपमानित करने और उठक-बैठक करवाने के मामले में कड़ा संज्ञान लेते हुए राज्य के मुख्य सचिव और पुणे पुलिस आयुक्त अमितेश कुमार सहित 11 पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। आयोग के अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अनंत बदर ने सभी प्रतिवादियों को 9 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई में अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है।
Kalpana Gautam02 अग. 2026, 10:05 PM IST

महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग ने पुणे में एक आरोपी का सार्वजनिक रूप से जुलूस निकालने, उसे अपमानित करने और उठक-बैठक करवाने के मामले में कड़ा संज्ञान लेते हुए राज्य के मुख्य सचिव और पुणे पुलिस आयुक्त अमितेश कुमार सहित 11 पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। आयोग के अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अनंत बदर ने सभी प्रतिवादियों को 9 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई में अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है।
यह मामला पुलिस द्वारा अपनी शक्तियों के दुरुपयोग और हिरासत में लिए गए व्यक्ति के मौलिक मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन से जुड़ा है। कानून के अनुसार किसी भी आरोपी को अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने से पहले या हिरासत के दौरान पुलिस द्वारा इस तरह सार्वजनिक रूप से शारीरिक या मानसिक दंड देना गैरकानूनी है। यह कार्यवाही यह तय करने के लिए महत्वपूर्ण है कि पुलिस तंत्र कानून के दायरे में रहकर काम करे और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो।
घटना पुणे के लक्ष्मीनगर पुलिस स्टेशन सीमा के अंतर्गत हुई थी, जहां पुलिस ने एक आरोपी को हिरासत में लेने के बाद व्यस्त सड़क पर उसका जुलूस निकाला था। आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने आरोपी को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया, उसके खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया, सड़क पर उठक-बैठक करवाई और लोगों के सामने जबरन माफी मांगने पर मजबूर किया।
इस अमानवीय बर्ताव के खिलाफ स्वप्निल जाधव और तानाजी कारचे ने महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग में याचिका दाखिल की थी। आयोग ने प्राथमिक रिपोर्टों और साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद पाया कि सार्वजनिक स्थान पर आरोपी का शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न किया गया है। मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 18 के प्रावधानों के तहत आरोपी अधिकारी और कर्मचारी कार्रवाई के लिए जिम्मेदार ठहराए जा सकते हैं। आयोग ने माना कि मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य शासन का रुख जानना जरूरी है, इसलिए राज्य के मुख्य सचिव को भी इस मामले में प्रतिवादी बनाया गया है।
इस मामले में मुख्य सचिव और पुणे पुलिस आयुक्त अमितेश कुमार के अलावा पुलिस उपायुक्त चिलुमूला रजनीकांत, वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक रवींद्र कदम, शिवाजी विभुते, रविकांत नंदनवार, महेश नलावडे तथा पुलिस कर्मचारी अमोल गायकवाड़, अमोल वायाल, भीमराव कांबले, दत्तात्रय शिंदे, कादिर शेख और सूरज अबासे को प्रतिवादी बनाया गया है।
आयोग के रजिस्ट्रार न्यायमूर्ति विजय केदार ने मामले की जानकारी देते हुए कहा, "पीडित व्यक्ति के मानवाधिकारों की रक्षा करना और उनके हनन को रोकना संबंधित अधिकारियों की प्राथमिक जिम्मेदारी थी। हालांकि, उपलब्ध तस्वीरों और साक्ष्यों से यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि पुणे पुलिस ने पीड़ित को शारीरिक सजा दी, जो मानवाधिकारों के उल्लंघन में उनकी संलिप्तता और लापरवाही को दर्शाता है।"
आयोग के अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अनंत बदर ने अपने आदेश में कहा, "इस मामले के संभावित परिणामों और गंभीरता को ध्यान में रखते हुए मुख्य सचिव को शामिल करना आवश्यक था। राज्य सरकार 9 सितंबर को होने वाली सुनवाई में अपना लिखित स्पष्टीकरण दाखिल कर सकती है।"
