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कोल्हापुर में लोमड़ी के काटने से किसान की दर्दनाक मौत, रेबीज का टीका लेने के बावजूद नहीं बची जान

महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में लोमड़ी के काटने से गंभीर रूप से पीड़ित 56 वर्षीय किसान दिलीप दशरथ यादव की शनिवार को छत्रपति प्रमिला राजे (सीपीआर) अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। अर्जुनवाडा गांव के रहने वाले दिलीप यादव ने 8 महीने पहले लोमड़ी के हमले के तुरंत बाद अस्पताल पहुंचकर रेबीज का टीका और इलाज लिया था, जिसके बावजूद उनकी जान जाने से स्वास्थ्य विभाग और टीकों की प्रभावकारिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

Kalpana Gautam02 अग. 2026, 10:06 PM IST
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कोल्हापुर में लोमड़ी के काटने से किसान की दर्दनाक मौत, रेबीज का टीका लेने के बावजूद नहीं बची जान
कोल्हापुर: महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में लोमड़ी के काटने से गंभीर रूप से पीड़ित 56 वर्षीय किसान दिलीप दशरथ यादव की शनिवार को छत्रपति प्रमिला राजे (सीपीआर) अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। अर्जुनवाडा गांव के रहने वाले दिलीप यादव ने 8 महीने पहले लोमड़ी के हमले के तुरंत बाद अस्पताल पहुंचकर रेबीज का टीका और इलाज लिया था, जिसके बावजूद उनकी जान जाने से स्वास्थ्य विभाग और टीकों की प्रभावकारिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।  

यह मामला ग्रामीण इलाकों में वन्यजीवों के हमले, रेबीज से बचाव के प्रोटोकॉल और सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध एंटी-रेबीज वैक्सीन की गुणवत्ता व समय पर डिलीवरी पर बहस छेड़ता है। जब किसी मरीज को समय पर टीका मिलने के बाद भी हाइड्रोफोबिया जैसे घातक लक्षण विकसित हो जाएं, तो यह स्वास्थ्य प्रणाली और स्थानीय प्रशासन दोनों के लिए एक बड़ी चेतावनी है।

प्राप्त विवरण के अनुसार, 12 नवंबर 2025 को दिलीप यादव अपने खेत में सूखे चारे का काम कर रहे थे। उसी दौरान पास के गन्ने के खेत से अचानक निकली लोमड़ी ने उन पर जानलेवा हमला कर दिया। इस झटपटाहट में लोमड़ी ने उनके हाथ का अंगूठा काटकर अलग कर दिया था।  घटना के तुरंत बाद परिजनों ने उन्हें सीपीआर अस्पताल पहुंचाया। अस्पताल में अंगूठा जोड़ने की सुविधा न होने के कारण वे निजी अस्पताल गए, जहां डॉक्टरों ने संक्रमण और गहरे घाव को देखते हुए अंगूठा जोड़ने से मना कर दिया और तुरंत सीपीआर अस्पताल जाकर एंटी-रेबीज का टीका लगवाने की सलाह दी। दिलीप यादव ने वापस सीपीआर अस्पताल में भर्ती होकर तीन दिनों तक इलाज कराया और बाजू में रेबीज का टीका भी लगवाया।  

इलाज के बाद वे सामान्य जीवन जी रहे थे, लेकिन घटना के 8 महीने बाद जुलाई 2026 के अंत में अचानक उन्हें पानी देखते ही शरीर में तेज कंपकंपी और घबराहट (हाइड्रोफोबिया) महसूस होने लगी। स्थानीय स्वास्थ्य कर्मियों की सलाह पर उन्हें गुरुवार को दोबारा सीपीआर अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया, जहां शनिवार को उन्होंने अंतिम सांस ली।

इस दुखद घटना पर परिजनों ने वन्यजीव विभाग और अस्पताल की कार्यप्रणाली पर दुख जताया है। मृतक के भतीजे सुनील यादव ने बताया कि उनके चाचा ने घटना के दिन ही अस्पताल पहुंचकर सभी आवश्यक टीके लगवाए थे। वहीं परिजनों द्वारा वन विभाग को सूचित करने पर कथित तौर पर यह जवाब मिला कि घटना के 6 महीने बाद तक ही विभाग की जिम्मेदारी होती है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए राजर्षि शाहू छत्रपति शासकीय मेडिकल कॉलेज एवं सीपीआर अस्पताल के अधिष्ठाता (डीन) डॉ. सदानंद भिसे ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि मरीज की मेडिकल फाइल का पूरी तरह अध्ययन करने और उपचार करने वाले डॉक्टरों से चर्चा करने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि मृत्यु का मुख्य कारण क्या था। फिलहाल मामले की आधिकारिक प्रविष्टि सीपीआर पुलिस चौकी में दर्ज कर ली गई है।