culture

गणेशोत्सव 2026: शाडू मिट्टी की प्रतिमाओं की बढ़ी मांग, महंगाई से बढ़ीं मूर्तिकारों की मुश्किलें

गणेशोत्सव में अब कुछ ही दिन शेष हैं और उल्हासनगर समेत आसपास के क्षेत्रों में मूर्तिकारों की कार्यशालाओं में गणेश प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम तेज़ी से चल रहा है। लेकिन इस वर्ष शाडू मिट्टी की बढ़ी हुई कीमतों ने मूर्तिकारों की चिंता बढ़ा दी है। पर्यावरण-अनुकूल शाडू मिट्टी की प्रतिमाओं की मांग बढ़ रही है, वहीं प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से बनी प्रतिमाओं की मांग भी बनी हुई है। ऐसे में बढ़ती लागत और बाजार की प्रतिस्पर्धा, दोनों ही मूर्तिकारों के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं।

Priyanka Gaikwad03 अग. 2026, 05:37 PM IST
खबर शेयर करें:
गणेशोत्सव 2026: शाडू मिट्टी की प्रतिमाओं की बढ़ी मांग, महंगाई से बढ़ीं मूर्तिकारों की मुश्किलें
गणेशोत्सव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा है, वैसे-वैसे उल्हासनगर, कल्याण, अंबरनाथ, बदलापुर, भिवंडी और आसपास के इलाकों में स्थित मूर्तिकारों की कार्यशालाओं में दिन-रात काम जारी है। कलाकार गणेश प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने, रंगाई, सजावट और पैकिंग के कार्य में जुटे हुए हैं। इस वर्ष भी छोटे घरेलू गणपति से लेकर बड़े सार्वजनिक मंडलों के लिए आकर्षक प्रतिमाओं की तैयारियां ज़ोरों पर हैं। हाल के वर्षों में पर्यावरण संरक्षण को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ी है। इसके चलते शाडू मिट्टी से बनी पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमाओं की मांग में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है। कई परिवार और सार्वजनिक मंडल अब ऐसी प्रतिमाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं, जो विसर्जन के बाद जल स्रोतों को प्रदूषित न करें। इसके बावजूद बाजार में पीओपी से बनी प्रतिमाओं की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कम कीमत, हल्के वजन और आकर्षक डिजाइनों के कारण आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पीओपी की प्रतिमाएं खरीद रहे हैं।

उल्हासनगर मूर्तिकार संघ के अध्यक्ष पंकज तातवडेकर के अनुसार, इस वर्ष स्थानीय कार्यशालाओं में शाडू मिट्टी की प्रतिमाओं की मांग काफी अधिक है। कई कार्यशालाओं में करीब 1,500 से अधिक प्रतिमाएं तैयार की जा रही हैं। उल्हासनगर के अलावा कल्याण, अंबरनाथ, बदलापुर, भिवंडी, मुंबई और ठाणे क्षेत्र से भी बड़ी संख्या में ऑर्डर प्राप्त हुए हैं। इससे स्थानीय मूर्तिकारों को अच्छा काम तो मिला है, लेकिन बढ़ती लागत ने उनकी चिंता भी बढ़ा दी है। मूर्तिकारों का कहना है कि इस वर्ष शाडू मिट्टी की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है। पिछले वर्ष 25 किलो शाडू मिट्टी की एक बोरी लगभग 220 रुपये में उपलब्ध थी, जबकि इस वर्ष वही बोरी करीब 380 रुपये तक पहुंच गई है। यानी कच्चे माल की कीमत में लगभग 70 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके अलावा रंग, ब्रश, सजावटी सामग्री, वार्निश, पैकिंग सामग्री, लकड़ी, परिवहन और मजदूरी की लागत भी पहले की तुलना में काफी बढ़ गई है। इसका सीधा असर प्रतिमा निर्माण की कुल लागत पर पड़ रहा है।

मूर्तिकारों का कहना है कि बढ़ी हुई लागत के बावजूद वे प्रतिमाओं की कीमतों में बहुत अधिक बढ़ोतरी नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि बाजार में प्रतिस्पर्धा काफी अधिक है। यदि कीमतें ज्यादा बढ़ाई जाएं तो ग्राहक दूसरे विक्रेताओं या बाहरी शहरों से आने वाली प्रतिमाओं की ओर रुख कर सकते हैं। ऐसे में कई स्थानीय मूर्तिकार कम मुनाफे पर काम करने को मजबूर हैं। दूसरी ओर, पर्यावरण-अनुकूल गणेशोत्सव को बढ़ावा देने के लिए सरकार और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। इसके बावजूद बाहरी शहरों से बड़ी संख्या में पीओपी की प्रतिमाएं बाजार में पहुंच रही हैं, जिससे स्थानीय शाडू प्रतिमा निर्माताओं को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। कई ग्राहक कम कीमत और आकर्षक डिजाइनों के कारण आज भी पीओपी प्रतिमाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। उल्हासनगर मूर्तिकार संघ के पूर्व अध्यक्ष सचिन कदम ने बताया कि पिछले वर्ष नगर निगम की ओर से मूर्तिकारों को सीमित मात्रा में शाडू मिट्टी उपलब्ध कराई गई थी, जिससे उन्हें कुछ राहत मिली थी। हालांकि इस वर्ष ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई है। इसके कारण सभी मूर्तिकारों को खुले बाजार से अधिक कीमत पर शाडू मिट्टी खरीदनी पड़ रही है, जिससे उत्पादन लागत और बढ़ गई है।

मूर्तिकारों का मानना है कि यदि प्रशासन पर्यावरण-अनुकूल गणेशोत्सव को वास्तव में बढ़ावा देना चाहता है, तो केवल जागरूकता अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा। शाडू मिट्टी उचित दरों पर उपलब्ध कराना, स्थानीय मूर्तिकारों को आर्थिक सहायता देना, प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना और पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमाओं की बिक्री को प्रोत्साहित करना भी आवश्यक है। इससे एक ओर स्थानीय कारीगरों की आजीविका सुरक्षित होगी, वहीं दूसरी ओर जल प्रदूषण कम करने और पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य को भी मजबूती मिलेगी। गणेशोत्सव को लेकर बाजार में उत्साह अपने चरम पर है और श्रद्धालु अपनी पसंद की प्रतिमाओं की बुकिंग कर रहे हैं। ऐसे में इस वर्ष महंगाई, पर्यावरण संरक्षण और बाजार की प्रतिस्पर्धा—ये तीनों मुद्दे गणेश प्रतिमा उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। मूर्तिकारों को उम्मीद है कि प्रशासन और समाज का सहयोग मिलने पर पर्यावरण-अनुकूल शाडू प्रतिमाओं का उपयोग और अधिक बढ़ेगा तथा स्थानीय कलाकारों को भी उनके हुनर का उचित सम्मान और आर्थिक लाभ मिलेगा।