केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया कि वन संरक्षण और सतत वन प्रबंधन को मजबूत करने के लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाई जा रही है। संयुक्त वन प्रबंधन समितियों (JFMCs), इको-डेवलपमेंट समितियों (EDCs) और वन अधिकार अधिनियम, 2006 के माध्यम से ग्राम सभाओं को वन संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। सरकार Green India Mission, CAMPA, नगर वन योजना और MISHTI जैसी योजनाओं के जरिए वन एवं वृक्ष आच्छादन बढ़ाने और क्षतिग्रस्त जंगलों के पुनर्जीवन पर काम कर रही है। ISFR 2023 के अनुसार भारत का वन एवं वृक्ष आच्छादन बढ़कर 8.27 लाख वर्ग किलोमीटर यानी कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.17 प्रतिशत हो गया है। साथ ही वनाग्नि प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण और विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है।
देश में बढ़ते शहरीकरण, औद्योगीकरण, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता पर बढ़ते खतरे के बीच वन संरक्षण भारत की सबसे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय प्राथमिकताओं में शामिल है। केंद्र सरकार ने संसद में जानकारी दी है कि जंगलों के संरक्षण, वन क्षेत्र बढ़ाने और स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कई योजनाएं और संस्थागत व्यवस्थाएं लागू की जा रही हैं। सरकार का उद्देश्य केवल वन क्षेत्र बढ़ाना नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों को वन प्रबंधन का साझेदार बनाकर प्राकृतिक संसाधनों का सतत संरक्षण सुनिश्चित करना है।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार वनों पर निर्भर समुदायों को संयुक्त वन प्रबंधन समितियों (Joint Forest Management Committees - JFMCs) और संरक्षित क्षेत्रों के आसपास गठित इको-डेवलपमेंट समितियों (Eco-Development Committees - EDCs) के माध्यम से वन संरक्षण में सक्रिय रूप से शामिल किया जा रहा है। ये समितियां अवैध कटाई रोकने, वनाग्नि की रोकथाम, वृक्षारोपण, क्षतिग्रस्त जंगलों के पुनर्स्थापन और वन संसाधनों के सतत प्रबंधन जैसे कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
सरकार ने यह भी बताया कि अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के तहत पात्र वनवासी समुदायों को वन अधिकार प्रदान किए गए हैं। इस कानून के माध्यम से ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन संसाधनों की सुरक्षा, संरक्षण, पुनर्जीवन और टिकाऊ उपयोग का अधिकार दिया गया है। इससे स्थानीय समुदायों की जिम्मेदारी और भागीदारी दोनों मजबूत हुई हैं।
वन एवं वृक्ष आच्छादन बढ़ाने और क्षतिग्रस्त वन क्षेत्रों के पुनर्जीवन के लिए केंद्र सरकार राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (Green India Mission), प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (CAMPA), नगर वन योजना (Nagar Van Yojana) और तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव संरक्षण के लिए 'मिष्टी' (MISHTI) जैसी योजनाओं के तहत तकनीकी और वित्तीय सहायता उपलब्ध करा रही है। इन योजनाओं का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करना, हरित आवरण बढ़ाना और पारिस्थितिक संतुलन को मजबूत करना है।
वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए सरकार राष्ट्रीय वनाग्नि कार्ययोजना-2018 के तहत आधुनिक तकनीक, क्षमता निर्माण, समुदाय आधारित भागीदारी और बेहतर निगरानी प्रणाली पर जोर दे रही है। इसके साथ ही 'फॉरेस्ट फायर प्रिवेंशन एंड मैनेजमेंट' योजना के तहत राज्यों को वित्तीय सहायता भी दी जा रही है ताकि जंगलों को आग से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
सरकार ने स्पष्ट किया कि वन क्षेत्रों में खनन या अन्य विकास परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले उनके पर्यावरणीय और पारिस्थितिक प्रभावों का विस्तृत मूल्यांकन किया जाता है। प्रत्येक प्रस्ताव की अलग-अलग जांच की जाती है, जिसमें वन्यजीवों, प्राकृतिक आवासों और पर्यावरण पर संभावित प्रभावों का आकलन किया जाता है। साथ ही यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है कि वन भूमि का उपयोग न्यूनतम हो और जंगलों का अनावश्यक विखंडन न हो।
इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार देश का कुल वन एवं वृक्ष आच्छादन बढ़कर 8,27,356.95 वर्ग किलोमीटर हो गया है, जो भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17 प्रतिशत है। यह 2021 के आकलन की तुलना में 1,445.81 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्शाता है। देश में संरक्षित क्षेत्रों की संख्या बढ़कर 1,134 हो गई है। इसके अलावा 58 टाइगर रिजर्व, 33 हाथी रिजर्व, 32 टाइगर कॉरिडोर और 150 हाथी कॉरिडोर भी अधिसूचित किए जा चुके हैं, जो वन्यजीव संरक्षण और पारिस्थितिक संपर्क बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है। वन केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि जल स्रोतों की सुरक्षा, वर्षा चक्र, मिट्टी संरक्षण, कार्बन अवशोषण, वन्यजीवों के आवास और लाखों लोगों की आजीविका का आधार हैं। यदि जंगल सुरक्षित रहेंगे तो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने, प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम घटाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी मदद मिलेगी।
सरकार की इन पहलों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वन संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ेगी, अवैध कटाई और वनाग्नि पर बेहतर नियंत्रण संभव होगा, वन्यजीवों के आवास सुरक्षित रहेंगे, हरित आवरण और कार्बन अवशोषण बढ़ेगा तथा जलवायु परिवर्तन से निपटने की भारत की रणनीति को मजबूती मिलेगी। साथ ही पर्यावरण संरक्षण और विकास परियोजनाओं के बीच संतुलन बनाने में भी सहायता मिलेगी। लोकसभा में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने एक लिखित उत्तर में वन संरक्षण से संबंधित योजनाओं, सामुदायिक भागीदारी और सरकार द्वारा उठाए जा रहे प्रमुख कदमों की जानकारी दी।