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अनुच्छेद 21 का हवाला देकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- धार्मिक आयोजनों में हर जान की सुरक्षा सुनिश्चित करे सरकार

मथुरा-वृंदावन में धार्मिक आयोजनों के दौरान बार-बार होने वाली भगदड़ की घटनाओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि लोगों की जान बचाना केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत राज्य का अनिवार्य दायित्व है। इसके लिए सरकार को वैज्ञानिक भीड़ प्रबंधन (Crowd Behaviour Science) को शिक्षा, प्रशासन और नीति-निर्माण का स्थायी हिस्सा बनाना होगा।

Sonali03 अग. 2026, 06:51 PM IST
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अनुच्छेद 21 का हवाला देकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- धार्मिक आयोजनों में हर जान की सुरक्षा सुनिश्चित करे सरकार

मथुरा-वृंदावन में धार्मिक आयोजनों के दौरान होने वाली भगदड़ की घटनाओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक नागरिक के जीवन की रक्षा करना राज्य का सकारात्मक दायित्व है। यदि ऐसी आपदाएं वैज्ञानिक योजना और बेहतर प्रबंधन से रोकी जा सकती हैं, तो उन्हें रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था करना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है।

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने कहा कि "क्राउड बिहेवियर साइंस" (भीड़ के व्यवहार का विज्ञान) को केवल सैद्धांतिक विषय नहीं माना जा सकता। इसे विश्वविद्यालयों, प्रशासनिक प्रशिक्षण, नीति-निर्माण और आपदा प्रबंधन का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए ताकि भविष्य में धार्मिक आयोजनों के दौरान होने वाली भगदड़ जैसी घटनाओं को रोका जा सके।


याचिका कैसे पहुंची अदालत?

यह टिप्पणी स्वामी शिव स्वरूपानंद जी महाराज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 3 अन्य (2026 LiveLaw (AB) 514) मामले की सुनवाई के दौरान की गई। मूल याचिका मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) द्वारा कथित अवैध निर्माणों के खिलाफ चयनात्मक (Pick and Choose) कार्रवाई को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी। हालांकि सुनवाई के दौरान अदालत ने इस मामले का दायरा बढ़ाते हुए मथुरा-वृंदावन में भीड़ प्रबंधन, अवैध निर्माण और सार्वजनिक सुरक्षा जैसे व्यापक मुद्दों पर भी विचार किया।


अदालत ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि धार्मिक पर्वों और त्योहारों के दौरान लाखों श्रद्धालु मथुरा-वृंदावन पहुंचते हैं। ऐसे में यदि वैज्ञानिक भीड़ प्रबंधन, आपातकालीन निकासी योजना और प्रशिक्षित प्रशासनिक व्यवस्था नहीं होगी तो जान-माल का नुकसान होना तय है। अदालत ने कहा कि रोकी जा सकने वाली आपदाओं में लोगों की मौत होना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।


विशेषज्ञ संस्था और वैज्ञानिक अध्ययन की जानकारी मांगी

अदालत ने जिला प्रशासन से पूछा कि क्या जिले में भीड़ के व्यवहार का अध्ययन करने वाली कोई विशेषज्ञ संस्था या तंत्र मौजूद है। साथ ही यह भी पूछा कि हाल की भगदड़ जैसी घटनाओं के बाद कोई वैज्ञानिक अध्ययन, शोध या संस्थागत विश्लेषण कराया गया या नहीं, यदि कराया गया तो उसकी सिफारिशों पर क्या कार्रवाई हुई।


अवैध निर्माण भी बड़ी वजह

हाईकोर्ट ने कहा कि अवैध निर्माण केवल शहरी नियोजन का उल्लंघन नहीं हैं, बल्कि आपातकालीन स्थिति में राहत और बचाव कार्यों में भी बाधा बनते हैं। संकरी गलियां और अनियोजित निर्माण भगदड़ के दौरान लोगों की जान के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं। इसलिए प्रशासन को अवैध निर्माणों पर प्रभावी नियंत्रण के साथ-साथ दीर्घकालिक नीति भी तैयार करनी होगी।


प्रशासन से विस्तृत हलफनामा तलब

अदालत ने मथुरा के जिलाधिकारी, नगर आयुक्त, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक तथा एमवीडीए से विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। इसमें भीड़ एवं संकट प्रबंधन की नीति, मानक संचालन प्रक्रिया (SOP), अधिकारियों के प्रशिक्षण, विभिन्न विभागों के समन्वय, अवैध निर्माणों पर कार्रवाई तथा भविष्य की कार्ययोजना का पूरा विवरण देने को कहा गया है।


क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल मथुरा-वृंदावन तक सीमित नहीं है। देशभर में कुंभ, मंदिरों, धार्मिक मेलों और अन्य बड़े आयोजनों में करोड़ों लोगों की भीड़ उमड़ती है। ऐसे में हाईकोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में भीड़ प्रबंधन की नीतियों, प्रशासनिक प्रशिक्षण और आपदा प्रबंधन व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक दिशा-निर्देश साबित हो सकती है।