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भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन ने रचा इतिहास, 1200 KM चली और बचाया 3200 लीटर डीजल l

भारतीय रेलवे की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन ने शुरुआती सफर में ही बड़ी उपलब्धि हासिल की है। 17 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाई थी। जींद और सोनीपत के बीच चल रही ट्रेन ने 25 जुलाई तक 1200 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय की और इस दौरान 3200 लीटर से अधिक डीजल की बचत की। हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक से चलने वाली यह ट्रेन पारंपरिक डीजल इंजन की तरह धुआं नहीं छोड़ती, बल्कि इसके संचालन से मुख्य रूप से जलवाष्प निकलती है। रेलवे अब इसकी सफलता के बाद दिल्ली से जुड़े रूट पर भी ट्रायल की तैयारी कर रहा है।

Kashish Rai03 अग. 2026, 06:52 PM IST
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भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन ने रचा इतिहास, 1200 KM चली और बचाया 3200 लीटर डीजल l

देश में स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन को लेकर चर्चा तेज हो गई है। भारतीय रेलवे की पहली हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन ने अपने शुरुआती परिचालन में ही पर्यावरण संरक्षण और ईंधन बचत के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। 17 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। इसके बाद से ट्रेन जींद और सोनीपत के बीच लगातार संचालित हो रही है। रेलवे के मुताबिक, 25 जुलाई तक हाइड्रोजन ट्रेन 1200 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी सफलतापूर्वक तय कर चुकी थी। इस दौरान ट्रेन ने 3200 लीटर से अधिक डीजल की खपत को बचाया। इससे न सिर्फ रेलवे के ईंधन खर्च में कमी आई, बल्कि डीजल से होने वाले प्रदूषण को कम करने की दिशा में भी इसे अहम कदम माना जा रहा है।

हाइड्रोजन ट्रेन कैसे करती है काम?

हाइड्रोजन ट्रेन की सबसे खास बात इसकी तकनीक है। यह ट्रेन पारंपरिक डीजल इंजन की तरह ईंधन जलाकर नहीं चलती और न ही इसे चलाने के लिए बाहरी बिजली की ओवरहेड इलेक्ट्रिक लाइन की जरूरत होती है। ट्रेन के भीतर लगे फ्यूल सेल सिस्टम में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया कर बिजली पैदा की जाती है। यही बिजली ट्रेन के मोटर सिस्टम को ऊर्जा देती है। इस प्रक्रिया में डीजल इंजन की तरह धुआं नहीं निकलता। फ्यूल सेल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की प्रतिक्रिया के बाद मुख्य उप-उत्पाद के तौर पर पानी और जलवाष्प बनते हैं। यही वजह है कि हाइड्रोजन ट्रेन को पारंपरिक डीजल ट्रेनों की तुलना में पर्यावरण के लिहाज से ज्यादा स्वच्छ विकल्प माना जा रहा है।

1200 किमी के सफर में बचाया 3200 लीटर से ज्यादा डीजल

जींद-सोनीपत रूट पर शुरुआती परिचालन के दौरान ट्रेन ने 1200 किलोमीटर से ज्यादा का सफर पूरा किया। इस दौरान 3200 लीटर से अधिक डीजल की बचत हुई। रेलवे के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन आधारित ट्रेनों का इस्तेमाल बढ़ने पर भविष्य में डीजल पर निर्भरता कम की जा सकती है। हाइड्रोजन ट्रेन का इस्तेमाल बढ़ने से रेलवे के ईंधन खर्च के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन को कम करने में भी मदद मिल सकती है। यही कारण है कि भारतीय रेलवे इसे हरित परिवहन की दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी कदम के तौर पर देख रहा है।

10 कोच की है हाईटेक ट्रेन

जींद और सोनीपत के बीच चलने वाली हाइड्रोजन ट्रेन में कुल 10 कोच हैं। इसका डिजाइन आधुनिक और हाईटेक है तथा इसका लुक काफी हद तक मेट्रो ट्रेन के कोच जैसा दिखाई देता है। ट्रेन में यात्रियों की सुविधा के साथ-साथ हाइड्रोजन फ्यूल सेल सिस्टम की निगरानी और सुरक्षा के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। ट्रेन में दो हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कार लगाई गई हैं। दोनों मिलकर करीब 2,400 किलोवाट की कुल पावर जनरेट करती हैं। इस पावर सिस्टम को सपोर्ट देने के लिए लिथियम आयरन फॉस्फेट बैटरी और हाइड्रोजन सिलेंडरों का इस्तेमाल किया गया है।

सुरक्षा के लिए हाईटेक सिस्टम

हाइड्रोजन गैस के इस्तेमाल को देखते हुए ट्रेन में सुरक्षा व्यवस्था का भी विशेष ध्यान रखा गया है। ट्रेन में गैस लीक और आग जैसी स्थिति का पता लगाने के लिए ऑटोमैटिक सेंसर और सुरक्षा सिस्टम लगाए गए हैं। किसी तरह की गड़बड़ी का पता चलने पर हाइड्रोजन की सप्लाई को स्वचालित रूप से बंद करने की व्यवस्था की गई है। इस तरह ट्रेन में हाइड्रोजन के भंडारण और इस्तेमाल से जुड़े संभावित जोखिमों को नियंत्रित करने के लिए कई स्तरों पर सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं।

अब दिल्ली रूट पर होगा ट्रायल

जींद-सोनीपत रूट पर शुरुआती परिचालन से मिले सकारात्मक परिणामों के बाद अब हाइड्रोजन ट्रेन के विस्तार की तैयारी की जा रही है। रेलवे जल्द ही दिल्ली से जुड़े रूट पर भी इसका ट्रायल शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अगर आने वाले समय में हाइड्रोजन ट्रेन का परिचालन बड़े स्तर पर सफल रहता है, तो इससे भारतीय रेलवे के हरित परिवहन अभियान को मजबूती मिल सकती है। डीजल की खपत कम होने के साथ प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन घटाने में भी मदद मिलने की उम्मीद है। ऐसे में भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन को भविष्य की पर्यावरण-अनुकूल रेल व्यवस्था की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।