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जल संरक्षण में तकनीक का बड़ा इस्तेमाल, भूजल बचाने के लिए सरकार का डिजिटल मिशन तेज

देश में बढ़ते जल संकट और गिरते भूजल स्तर से निपटने के लिए केंद्र सरकार आधुनिक तकनीक आधारित जल प्रबंधन प्रणाली को तेजी से मजबूत कर रही है। राज्यसभा में जल शक्ति मंत्रालय ने बताया कि अटल भूजल योजना के तहत सात राज्यों की 8,203 ग्राम पंचायतों में समुदाय आधारित भूजल संरक्षण मॉडल लागू किया गया, जिसके अनुभव अब अन्य राज्यों में भी अपनाए जाएंगे। सरकार ने देशभर में 24.2 लाख से अधिक जल निकायों को जियो-टैग किया है और 1.55 करोड़ से अधिक जल संरक्षण एवं भूजल पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण कराया है। इसके अलावा रियल-टाइम भूजल मॉनिटरिंग, GIS मैपिंग, वेब आधारित प्लेटफॉर्म, फ्लड वॉच इंडिया ऐप, डिजिटल डैशबोर्ड और जल सूचना प्रबंधन प्रणाली जैसी तकनीकों के जरिए जल संसाधनों की निगरानी और वैज्ञानिक योजना को मजबूत किया जा रहा है। इन पहलों से जल संरक्षण, सिंचाई प्रबंधन, बाढ़ पूर्व चेतावनी, पारदर्शिता और दीर्घकालिक जल सुरक्षा को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

Anshuman Mishra03 अग. 2026, 06:53 PM IST
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जल संरक्षण में तकनीक का बड़ा इस्तेमाल, भूजल बचाने के लिए सरकार का डिजिटल मिशन तेज
भारत में जल संकट और भूजल के लगातार गिरते स्तर को देखते हुए केंद्र सरकार जल संरक्षण और जल प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीकों का व्यापक उपयोग कर रही है। संसद में जल शक्ति मंत्रालय ने जानकारी दी है कि देश में भूजल संरक्षण, जल निकायों की निगरानी, बाढ़ पूर्वानुमान, सिंचाई परियोजनाओं की मॉनिटरिंग और जल संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित विश्लेषण, जियो-टैगिंग, जीआईएस मैपिंग, रिमोट सेंसिंग और रियल-टाइम डेटा मॉनिटरिंग जैसी तकनीकों को तेजी से अपनाया गया है। इसका उद्देश्य जल संसाधनों का बेहतर उपयोग, भूजल संरक्षण और भविष्य में जल संकट को कम करना है।

सरकार ने बताया कि अटल भूजल योजना देश की पहली समुदाय आधारित सहभागी भूजल प्रबंधन योजना रही, जिसे 1 अप्रैल 2020 से 15 अक्टूबर 2025 तक गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के 80 जिलों के 229 ब्लॉकों की 8,203 ग्राम पंचायतों में पायलट परियोजना के रूप में लागू किया गया। इस योजना का मुख्य उद्देश्य जल की कमी वाले क्षेत्रों में स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाकर भूजल संरक्षण को मजबूत करना, जल उपयोग की दक्षता बढ़ाना और राज्यों में स्थायी भूजल प्रबंधन की व्यवस्था विकसित करना था। सरकार अब इस योजना से मिले अनुभवों को अन्य राज्यों में भी लागू करने की दिशा में काम कर रही है।

जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार देशभर में पहली बार 24.2 लाख से अधिक जल निकायों की पहचान कर उन्हें जियो-टैग किया गया है। इसके साथ ही 'जल संचय जन भागीदारी' अभियान के तहत 1.55 करोड़ से अधिक जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण कर उनका डिजिटल रिकॉर्ड भी तैयार किया गया है। इससे जल संसाधनों की वास्तविक स्थिति का वैज्ञानिक आकलन संभव हुआ है और भविष्य की योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा रहा है।

भूजल की निगरानी के लिए केंद्रीय भूजल बोर्ड राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना के अंतर्गत देशभर में 5,260 डिजिटल भूजल स्तर रिकॉर्डर के माध्यम से लगभग रियल-टाइम मॉनिटरिंग कर रहा है। इसके अलावा राज्यों और अटल भूजल योजना के तहत स्थापित हजारों अतिरिक्त मॉनिटरिंग स्टेशनों के आंकड़ों को भी एकीकृत किया गया है, जिससे भूजल स्तर में होने वाले बदलावों पर लगातार नजर रखी जा रही है। सरकार ने 'इंडिया ग्राउंडवाटर रिसोर्स एस्टिमेशन सिस्टम' (INGRES) जैसे वेब आधारित प्लेटफॉर्म भी विकसित किए हैं, जिनकी मदद से पूरे देश में भूजल संसाधनों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाता है। यही आंकड़े मनरेगा, अटल भूजल योजना, जल शक्ति अभियान और अन्य जल संरक्षण योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन का आधार बनते हैं।

जल संरक्षण अभियानों की निगरानी के लिए 'कैच द रेन' डैशबोर्ड और 'जल संचय जन भागीदारी' डैशबोर्ड तैयार किए गए हैं। इन प्लेटफॉर्मों के अनुसार जुलाई 2026 तक देश में 2 करोड़ से अधिक जल संरक्षण और कृत्रिम भूजल पुनर्भरण कार्य किए जा चुके हैं, जबकि 1.55 करोड़ से अधिक संरचनाओं का निर्माण पूरा हो चुका है। डिजिटल डैशबोर्ड के कारण योजनाओं की प्रगति की पारदर्शी निगरानी संभव हो रही है। बाढ़ प्रबंधन में भी तकनीक का उपयोग लगातार बढ़ाया गया है। 'फ्लड वॉच इंडिया' ऐप उपग्रह चित्रों, गणितीय मॉडलिंग और रियल-टाइम मॉनिटरिंग के आधार पर बाढ़ की सटीक जानकारी उपलब्ध कराता है। यह देश के 592 बाढ़ मॉनिटरिंग स्टेशनों और 150 प्रमुख जलाशयों की स्थिति पर निगरानी रखता है, जिससे प्रशासन को समय रहते राहत एवं बचाव कार्य शुरू करने में सहायता मिलती है।

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत सिंचाई परियोजनाओं की निगरानी के लिए जीआईएस आधारित एप्लिकेशन, जियो-टैगिंग और डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है। इसी प्रकार जल निकायों की मरम्मत और पुनर्जीवन परियोजनाओं में प्रत्येक जलाशय को एक विशिष्ट पहचान संख्या देकर उसकी प्रगति को डिजिटल रूप से ट्रैक किया जा रहा है। इससे पारदर्शिता बढ़ रही है और योजनाओं के मूल्यांकन में सटीकता आ रही है।

जल सूचना प्रबंधन प्रणाली (WIMS) और आधुनिक जल विज्ञान मॉनिटरिंग सिस्टम के माध्यम से नदियों, जलाशयों और वर्षा संबंधी आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जा रहा है। इन आंकड़ों का उपयोग जल उपलब्धता का आकलन, सिंचाई प्रबंधन, जलाशय संचालन और भविष्य की जल नीतियों के निर्माण में किया जा रहा है। साथ ही विभिन्न योजनाओं की निगरानी के लिए डिजिटल डैशबोर्ड, वेब पोर्टल और मोबाइल ऐप का व्यापक उपयोग किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत दुनिया के सबसे अधिक भूजल उपयोग करने वाले देशों में शामिल है। कृषि, पेयजल और उद्योगों की बढ़ती मांग के कारण कई राज्यों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। ऐसे में केवल नए जल स्रोत विकसित करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उपलब्ध जल का वैज्ञानिक प्रबंधन, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, डेटा आधारित नीति निर्माण और स्थानीय समुदाय की भागीदारी ही दीर्घकालिक समाधान साबित हो सकते हैं।

सरकार द्वारा अपनाई जा रही डिजिटल तकनीकों का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि जल संकट वाले क्षेत्रों की समय रहते पहचान हो सकेगी, योजनाओं में पारदर्शिता बढ़ेगी, भूजल का अनियंत्रित दोहन कम होगा, किसानों को बेहतर सिंचाई प्रबंधन मिलेगा, बाढ़ जैसी आपदाओं के दौरान पहले से चेतावनी मिल सकेगी और जल संरक्षण से जुड़े निवेश का प्रभाव अधिक स्पष्ट रूप से मापा जा सकेगा। इससे जल सुरक्षा मजबूत होगी और आने वाले वर्षों में जल संसाधनों के सतत उपयोग का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी।

यह जानकारी जल शक्ति राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर के माध्यम से दी।