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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ब्रिंदा करात की रिव्यू याचिका खारिज, अनुराग ठाकुर-प्रवेश वर्मा को राहत बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के कथित भड़काऊ भाषण मामले में बड़ा फैसला बरकरार रखते हुए सीपीआई(एम) नेता ब्रिंदा करात की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि 29 अप्रैल 2026 के अपने फैसले में ऐसी कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं है, जिसके आधार पर मामले पर दोबारा विचार किया जाए।

नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने सीपीआई(एम) नेता ब्रिंदा करात की उस पुनर्विचार (रिव्यू) याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा को कथित भड़काऊ भाषण मामले में दी गई राहत पर पुनर्विचार की मांग की थी। यह पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट के 29 अप्रैल 2026 के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें अदालत ने दोनों नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी थी। अब 3 अगस्त 2026 को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने रिव्यू पिटिशन (RP No. 416/2026) भी खारिज करते हुए कहा कि पूर्व निर्णय में ऐसी कोई स्पष्ट कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं है, जिसके आधार पर उस पर दोबारा विचार किया जाए।
पीठ ने अपने आदेश में कहा, "हमें चुनौती दिए गए आदेश में ऐसी कोई त्रुटि, विशेषकर स्पष्ट त्रुटि, नहीं मिली जो पुनर्विचार का आधार बन सके।" रिव्यू याचिका पर सुनवाई चैंबर में हुई, क्योंकि खुली अदालत में सुनवाई की मांग स्वीकार नहीं की गई।
क्या था पूरा मामला?
मामले की शुरुआत जनवरी 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए कथित विवादित भाषणों से हुई थी। 27 जनवरी 2020 को अनुराग ठाकुर ने एक चुनावी रैली में "देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को" का नारा लगाया था। वहीं, प्रवेश वर्मा ने शाहीन बाग आंदोलन के प्रदर्शनकारियों को "घुसपैठिया" बताते हुए दावा किया था कि वे "आपके घरों में घुसकर आपकी बहनों-बेटियों के साथ दुष्कर्म करेंगे और उन्हें मार देंगे।"
ब्रिंदा करात ने आरोप लगाया कि ये बयान भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 153A, 153B, 295A और 505 के तहत संज्ञेय अपराध बनाते हैं। उन्होंने पहले मजिस्ट्रेट अदालत में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज कराने की मांग की। मजिस्ट्रेट द्वारा आवेदन खारिज किए जाने के बाद उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन वहां भी राहत नहीं मिली। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
29 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
29 अप्रैल 2026 को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि धारा 156(3) CrPC के तहत एफआईआर दर्ज कराने के लिए मजिस्ट्रेट के आदेश से पहले धारा 196 CrPC के तहत पूर्व स्वीकृति आवश्यक नहीं है। इस कानूनी प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया।
हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के भाषणों से प्रथम दृष्टया कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि भाषणों में किसी विशेष धार्मिक समुदाय का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं था, इसलिए इन्हें घृणा भाषण (Hate Speech) से संबंधित धाराओं के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
इसके बाद ब्रिंदा करात ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष केवल धारा 196 CrPC से जुड़ा कानूनी प्रश्न विचाराधीन था, जबकि अदालत ने बिना विस्तृत सुनवाई के भाषणों के गुण-दोष पर भी फैसला दे दिया। उन्होंने दलील दी कि न तो ट्रायल कोर्ट और न ही दिल्ली हाईकोर्ट ने भाषणों के मेरिट पर कोई निर्णय दिया था।
रिव्यू याचिका में क्या कहा गया?
याचिका में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने "रिकॉर्ड पर स्पष्ट त्रुटि" (Error Apparent on the Face of Record) की है। करात का कहना था कि अदालत ने वीडियो रिकॉर्डिंग, पुलिस रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों पर विस्तृत सुनवाई किए बिना यह निष्कर्ष निकाल लिया कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट और अन्य सामग्री का स्वतंत्र मूल्यांकन नहीं किया गया। याचिका में अनुरोध किया गया था कि अदालत अपने 29 अप्रैल 2026 के फैसले के उन हिस्सों को वापस ले, जिनमें यह कहा गया था कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता, और मामले के गुण-दोष पर सभी पक्षों को सुनने के बाद नया निर्णय दिया जाए।
चुनाव आयोग का भी दिया गया हवाला
ब्रिंदा करात ने अपनी याचिका में जनवरी 2020 में चुनाव आयोग द्वारा पारित आदेशों का भी हवाला दिया। उन्होंने बताया कि चुनाव आयोग ने दोनों नेताओं के भाषणों को आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) का उल्लंघन माना था और कहा था कि इनसे विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच तनाव और वैमनस्य बढ़ सकता है। इसके बाद आयोग ने अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा को भाजपा के स्टार प्रचारकों की सूची से हटाते हुए उनके चुनाव प्रचार पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया था।
सुप्रीम कोर्ट ने रिव्यू क्यों खारिज की?
3 अगस्त 2026 को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने रिव्यू पिटिशन पर सुनवाई करते हुए कहा कि 29 अप्रैल 2026 के फैसले में ऐसी कोई स्पष्ट कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं है, जिसके आधार पर पुनर्विचार किया जाए। अदालत ने इस आधार पर पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी और अनुराग ठाकुर एवं प्रवेश वर्मा को मिली राहत बरकरार रखी।
मामले की जानकारी
मामला: Brinda Karat v. State of NCT of Delhi
रिव्यू पिटिशन संख्या: RP No. 416/2026
पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता
मुख्य फैसला: 29 अप्रैल 2026
रिव्यू याचिका खारिज: 3 अगस्त 2026
