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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 6 महीने की बच्ची को 83.38 लाख रुपये का मुआवजा, कहा- सिर्फ मेडिकल रिपोर्ट नहीं, पूरा भविष्य देखो
सिर्फ छह महीने की उम्र में एक सड़क हादसे ने मासूम बच्ची से उसका सामान्य बचपन, चलने-फिरने की क्षमता और भविष्य के अनगिनत सपने छीन लिए। अब 11 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि जब किसी दुर्घटना का असर पूरे जीवन पर पड़ता है, तो मुआवजा भी उसी के अनुरूप होना चाहिए। अदालत ने बच्ची का मुआवजा 45.40 लाख रुपये से बढ़ाकर 83.38 लाख रुपये कर दिया और स्पष्ट किया कि बच्चों के मामलों में केवल मेडिकल रिपोर्ट नहीं, बल्कि उनके पूरे भविष्य पर पड़े प्रभाव को ध्यान में रखकर "जस्ट कॉम्पेंसेशन" तय किया जाना चाहिए।

नई दिल्ली
मोटर दुर्घटनाओं में घायल बच्चों के लिए मुआवजा तय करने के तरीके को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि "जस्ट कॉम्पेंसेशन" (न्यायसंगत मुआवजा) का अर्थ केवल इलाज का खर्च या वर्तमान आर्थिक नुकसान नहीं है, बल्कि दुर्घटना के कारण पीड़ित बच्चे के पूरे जीवन, भविष्य, शिक्षा, रोजगार, आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक जीवन पर पड़े प्रभाव का समुचित मूल्यांकन भी है। इस फैसले को मोटर दुर्घटना मुआवजा कानून (Motor Vehicles Act) के तहत आने वाले मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने 3 अगस्त 2026 को सुनाए गए फैसले में ओडिशा की नाबालिग श्रीजिता पटनायक को दिया गया मुआवजा 45.40 लाख रुपये से बढ़ाकर 83.38 लाख रुपये कर दिया। अदालत ने बीमा कंपनी न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को दावा याचिका दाखिल होने की तारीख से भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ पूरी राशि छह सप्ताह के भीतर जमा कराने का निर्देश भी दिया।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला 16 जून 2015 का है। उस समय श्रीजिता पटनायक महज छह महीने की थीं। वह अपने माता-पिता के साथ कार से यात्रा कर रही थीं। इसी दौरान सामने से तेज रफ्तार और लापरवाही से आ रहे एक टैंकर ने उनकी कार को टक्कर मार दी।
हादसे में बच्ची और उसके पिता गंभीर रूप से घायल हो गए। बच्ची को पहले स्थानीय अस्पताल और बाद में कई बड़े अस्पतालों में इलाज के लिए भर्ती कराया गया। लंबे इलाज और पुनर्वास के बाद डॉक्टरों ने उसे पोस्ट-ट्रॉमैटिक मायलोपैथी विद पैराप्लेजिया से पीड़ित बताया तथा 90 प्रतिशत स्थायी लोकोमोटर दिव्यांगता प्रमाणित की।
MACT और हाईकोर्ट ने कितना मुआवजा दिया था?
मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT), कटक ने 16 अप्रैल 2022 को बच्ची को 30.12 लाख रुपये मुआवजा और 6 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश दिया था।
इसके बाद ओडिशा हाईकोर्ट ने 11 जनवरी 2023 को इस राशि को बढ़ाकर 45.40 लाख रुपये कर दिया। हालांकि बच्ची के परिजनों ने दलील दी कि यह राशि उसके आजीवन इलाज, देखभाल और भविष्य के नुकसान की तुलना में पर्याप्त नहीं है। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने दिए देशभर की अदालतों के लिए अहम दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम एक कल्याणकारी कानून (Welfare Legislation) है। इसलिए "जस्ट कॉम्पेंसेशन" तय करते समय अदालतों को केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि पीड़ित के पूरे जीवन पर पड़े प्रभाव को भी ध्यान में रखना होगा। अदालत ने कहा कि मुआवजा न तो केवल सांकेतिक होना चाहिए और न ही अनुचित रूप से अधिक। इसका उद्देश्य पीड़ित को वास्तविक, प्रभावी और न्यायपूर्ण राहत उपलब्ध कराना होना चाहिए।
बच्चों के मामलों में अपनाना होगा अलग दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्थायी दिव्यांगता झेलने वाले बच्चों के मामलों को सामान्य मोटर दुर्घटना मामलों की तरह नहीं देखा जा सकता।
पीठ ने कहा कि ऐसे बच्चों से केवल उनकी शारीरिक क्षमता ही नहीं छिनती, बल्कि उनका सामान्य बचपन, शिक्षा, सामाजिक जीवन, रोजगार की संभावनाएं, आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार भी प्रभावित होता है। इसलिए अदालतों को ऐसे मामलों में अधिक मानवीय और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
90% मेडिकल दिव्यांगता, लेकिन 100% कार्यात्मक दिव्यांगता
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल (Physical Disability) और फंक्शनल (Functional Disability) दिव्यांगता के बीच महत्वपूर्ण अंतर भी स्पष्ट किया।
अदालत ने कहा कि मेडिकल बोर्ड द्वारा प्रमाणित शारीरिक दिव्यांगता हमेशा वास्तविक जीवन में पड़ने वाले प्रभाव को नहीं दर्शाती। यदि कोई व्यक्ति रोजगार करने, सामान्य जीवन जीने और स्वयं की देखभाल करने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है, तो उसकी फंक्शनल दिव्यांगता 100 प्रतिशत मानी जा सकती है।
इसी सिद्धांत को लागू करते हुए अदालत ने श्रीजिता की 90 प्रतिशत मेडिकल दिव्यांगता को 100 प्रतिशत कार्यात्मक दिव्यांगता माना क्योंकि वह जीवनभर किसी भी प्रकार का रोजगार नहीं कर पाएगी और रोजमर्रा के कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भर रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने पुराने ऐतिहासिक फैसलों का भी दिया हवाला
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने Raj Kumar v. Ajay Kumar, R.D. Hattangadi, Kajal v. Jagdish Chand, Baby Sakshi Greola, Divya, Hansraj तथा Hitesh Nagjibhai Patel जैसे महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया।
अदालत ने कहा कि इन सभी निर्णयों का मूल सिद्धांत यही है कि गंभीर रूप से घायल या स्थायी रूप से दिव्यांग हुए बच्चों को केवल "नॉन-अर्निंग पर्सन" मानकर मामूली मुआवजा नहीं दिया जा सकता, क्योंकि दुर्घटना उनके पूरे भविष्य को प्रभावित करती है।
कोर्ट ने किन मदों में बढ़ाया मुआवजा?
सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मदों में मुआवजा बढ़ाते हुए कहा कि पीड़िता को आजीवन देखभाल, इलाज और सहायक कर्मचारियों की आवश्यकता रहेगी।
अदालत ने निम्न प्रकार से अंतिम मुआवजा निर्धारित किया—
• भविष्य की आय का नुकसान – 17,46,360 रुपये
• दो परिचारकों (Attendants) का आजीवन खर्च – 25,92,000 रुपये
• दर्द, पीड़ा, जीवन की सुविधाओं और विवाह की संभावनाओं के नुकसान के लिए – 25,00,000 रुपये
• चिकित्सा खर्च – 3,00,000 रुपये
• भविष्य के इलाज के लिए – 10,00,000 रुपये
• यात्रा एवं विशेष आहार – 2,00,000 रुपये
कुल मुआवजा 83,38,360 रुपये निर्धारित किया गया।
दूसरे कानूनी प्लेटफॉर्म्स ने क्यों बताया ऐतिहासिक फैसला?
कई कानूनी समाचार प्लेटफॉर्म्स ने इस फैसले को मोटर दुर्घटना मुआवजा कानून के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण निर्णय बताया है। रिपोर्टों में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इतने स्पष्ट शब्दों में दोहराया कि बाल पीड़ितों के मामलों में मुआवजा तय करते समय केवल मेडिकल दिव्यांगता प्रतिशत नहीं, बल्कि दुर्घटना का उनके पूरे भविष्य पर पड़ने वाला प्रभाव देखा जाना चाहिए।
कानूनी विश्लेषकों के अनुसार यह फैसला देशभर के मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) और हाईकोर्टों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगा। अब स्थायी रूप से दिव्यांग हुए बच्चों के मामलों में अदालतें भविष्य की आय, आजीवन देखभाल, पुनर्वास, सम्मानजनक जीवन और सामाजिक प्रभाव को अधिक महत्व दे सकती हैं।
9 प्रतिशत ब्याज और छह सप्ताह में भुगतान का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को निर्देश दिया कि वह छह सप्ताह के भीतर पूरी मुआवजा राशि तथा 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT), कटक में जमा करे। इसके बाद अधिकरण विधि के अनुसार राशि पीड़िता को उपलब्ध कराएगा।
फैसले का व्यापक महत्व
यह निर्णय केवल एक पीड़ित बच्ची तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर की मोटर दुर्घटना अदालतों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि बच्चों में स्थायी दिव्यांगता के मामलों में केवल मेडिकल प्रमाणपत्र के आधार पर मुआवजा तय नहीं किया जा सकता। अदालतों को पीड़ित के पूरे जीवन, भविष्य की आय, आजीवन चिकित्सा, परिचारक की आवश्यकता, सम्मानजनक जीवन, मानसिक पीड़ा और पुनर्वास की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए "जस्ट कॉम्पेंसेशन" सुनिश्चित करना होगा।
यह फैसला आने वाले समय में हजारों मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में अदालतों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में उद्धृत किया जा सकता है।
