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90 दिन में फैसला सुनाना होगा! बॉम्बे हाईकोर्ट ने ITAT को लगाई कड़ी फटकार, देशभर की सभी बेंचों के लिए जारी किए सख्त निर्देश

सिर्फ सुनवाई नहीं, अब समय पर फैसला भी देना होगा! बॉम्बे हाईकोर्ट ने आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) को लंबित मामलों पर कड़ी फटकार लगाते हुए स्पष्ट कर दिया कि आदेश सुरक्षित रखने के बाद 90 दिनों के भीतर फैसला सुनाना अनिवार्य होगा। कोर्ट ने देरी को न्याय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल बताते हुए देशभर की सभी ITAT बेंचों के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

Sonali04 अग. 2026, 06:29 PM IST
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90 दिन में फैसला सुनाना होगा! बॉम्बे हाईकोर्ट ने ITAT को लगाई कड़ी फटकार, देशभर की सभी बेंचों के लिए जारी किए सख्त निर्देश


मुंबई: न्याय मिलने में अनावश्यक देरी पर सख्त टिप्पणी करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने आयकर अपीलीय अधिकरण (Income Tax Appellate Tribunal-ITAT) की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि यदि सुनवाई पूरी होने के बाद भी निर्णय महीनों तक लंबित रखा जाता है और मामला बिना फैसला सुनाए बार-बार दूसरी पीठ के समक्ष भेज दिया जाता है, तो इससे न्यायिक व्यवस्था पर आम नागरिक का भरोसा कमजोर होता है।

31 जुलाई 2026 को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रविंद्र व्ही. घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखाड की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए ITAT की सभी बेंचों को आयकर (अपीलीय अधिकरण) नियम, 1963 के नियम 34 का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सामान्य परिस्थितियों में सुनवाई पूरी होने के बाद जल्द से जल्द निर्णय सुनाया जाना चाहिए और किसी भी स्थिति में 90 दिनों की अधिकतम समय-सीमा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। 

मामला क्या है?

यह मामला मुंबई निवासी राजेश आर. हेमराजानी द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। उन्होंने हाईकोर्ट को बताया कि उनकी आयकर अपील पर तीन बार पूरी सुनवाई हो चुकी है, लेकिन अब तक अंतिम फैसला नहीं आया। इतना ही नहीं, दो अलग-अलग मौकों पर फैसला सुनाने की समय-सीमा समाप्त होने के बाद मामले को बिना निर्णय दिए "रिलीज" कर दिया गया, जिसके कारण उन्हें फिर से नई पीठ के सामने बहस करनी पड़ी।

याचिकाकर्ता का कहना था कि लगातार सुनवाई के बावजूद निर्णय न मिलने से उन्हें आर्थिक, मानसिक और कानूनी परेशानी का सामना करना पड़ा। 

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह स्थिति न्यायालय की "न्यायिक अंतरात्मा को झकझोरने वाली" है। अदालत ने कहा कि जब नियम 34 स्पष्ट रूप से 90 दिनों के भीतर फैसला सुनाने का निर्देश देता है, तब बिना निर्णय दिए मामलों को बार-बार रिलीज करना स्वीकार्य नहीं हो सकता।

अदालत ने टिप्पणी की कि एक मुकदमेबाज आखिर कितनी बार एक ही मामले में बहस करेगा और फैसले का इंतजार करेगा। न्यायालय ने इस पूरे घटनाक्रम को न्यायिक अनुशासन के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया।

तीन बार सुनवाई, फिर भी फैसला नहीं

हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार पहली बार न्यायिक सदस्य राहुल चौधरी और लेखा सदस्य विक्रम सिंह यादव की पीठ ने 1 जुलाई 2025 को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा, लेकिन 90 दिनों के भीतर निर्णय नहीं सुनाया।

इसके बाद पुनर्गठित पीठ, जिसमें न्यायिक सदस्य सी. वी. भडंग शामिल थे, ने 26 नवंबर 2025 को दोबारा सुनवाई पूरी की। यह पीठ भी निर्धारित समय-सीमा में फैसला नहीं दे सकी और 27 फरवरी 2026 को मामला रिलीज कर दिया।

इसके बाद मामला तीसरी बार न्यायिक सदस्य बीना पिल्लई और लेखा सदस्य अरुण खोपड़िया की पीठ के समक्ष सुना गया। इस पीठ ने 13 मई 2026 को फैसला सुरक्षित रखा और 90 दिनों की अवधि 13 अगस्त 2026 को पूरी होनी थी।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि हेमराजानी की अपील पर 13 अगस्त 2026 से पहले हर हाल में निर्णय सुनाया जाए। 

Rule 34 क्या कहता है?

आयकर (अपीलीय अधिकरण) नियम, 1963 के Rule 34(5) के अनुसार, सुनवाई पूरी होने के बाद सामान्यतः 60 दिनों के भीतर निर्णय सुनाया जाना चाहिए। यदि किसी असाधारण परिस्थिति में ऐसा संभव न हो, तब भी फैसला अधिकतम 90 दिनों के भीतर सुनाना अनिवार्य माना गया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह समय-सीमा केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि न्यायिक अनुशासन और समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण प्रावधान है। 

फैसले का व्यापक असर: केवल एक केस नहीं, पूरी ITAT व्यवस्था पर हाईकोर्ट की नजर

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह आदेश केवल राजेश आर. हेमराजानी के मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में ITAT की कार्यप्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। हाईकोर्ट ने साफ किया कि सुनवाई पूरी होने के बाद फैसलों को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना न केवल Rule 34 का उल्लंघन है, बल्कि समयबद्ध न्याय के सिद्धांत के भी विपरीत है।

अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई कि एक ही अपील तीन अलग-अलग पीठों के समक्ष पूरी तरह सुनी गई, लेकिन दो बार निर्धारित समय-सीमा के भीतर फैसला सुनाए बिना मामला रिलीज कर दिया गया। अदालत ने कहा कि ऐसी प्रक्रिया मुकदमेबाजों पर अनावश्यक आर्थिक, मानसिक और कानूनी बोझ डालती है तथा न्यायिक संस्थाओं में जनता का विश्वास कमजोर करती है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 60 दिनों के भीतर निर्णय की तारीख तय करना और किसी भी असाधारण स्थिति में 90 दिनों के भीतर फैसला सुनाना सभी ITAT बेंचों की जिम्मेदारी है। इस आदेश के जरिए अदालत ने न्यायिक जवाबदेही, पारदर्शिता और समयबद्ध न्याय को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का संदेश दिया। 

सभी ITAT बेंचों के लिए महत्वपूर्ण निर्देश

हाईकोर्ट ने केवल इस मामले तक सीमित न रहते हुए पूरे देश की ITAT बेंचों के लिए व्यापक निर्देश जारी किए।

अदालत ने कहा कि—

  • सुनवाई समाप्त होने के बाद 60 दिनों के भीतर निर्णय सुनाने की तारीख तय की जाए।

  • किसी असाधारण परिस्थिति में भी फैसला अधिकतम 90वें दिन तक सुनाया जाए।

  • बॉम्बे हाईकोर्ट के प्रोटोनोटरी एवं सीनियर मास्टर आदेश की प्रति देशभर की सभी ITAT बेंचों को भेजें ताकि सभी पीठें नियम 34 का समान रूप से पालन करें।

  • समय-सीमा का पालन न करना न्यायिक अनुशासन के विपरीत माना जाएगा। 

अदालत में किसने की पैरवी?

याचिकाकर्ता राजेश आर. हेमराजानी की ओर से अधिवक्ता ध्रुव जैनसेन संघवी, अनिरुद्ध श्रीनिवासन और प्रज्योत सावर्डेकर ने पक्ष रखा। वहीं आयकर विभाग की ओर से अधिवक्ता सुबीर कुमार और आशिता अग्रवाल ने पैरवी की। 

फैसले का महत्व

यह फैसला केवल एक आयकर विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायिक जवाबदेही, समयबद्ध न्याय और ट्रिब्यूनलों की कार्यप्रणाली से जुड़ा एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस आदेश के बाद ITAT में लंबित फैसलों पर तेजी आ सकती है, करदाताओं का न्याय व्यवस्था पर भरोसा मजबूत होगा और भविष्य में ट्रिब्यूनलों को निर्धारित समय-सीमा का पालन करने के लिए अधिक जवाबदेह होना पड़ेगा।