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एम्स की रिपोर्ट से आसाराम को बड़ा झटका! सुप्रीम कोर्ट से कहा- अस्पताल में भर्ती की जरूरत नहीं, 24 घंटे प्रशिक्षित देखभाल ही पर्याप्त
सुप्रीम कोर्ट में आसाराम की सजा निलंबित करने की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है। एम्स की स्वतंत्र मेडिकल रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि उनकी स्वास्थ्य स्थिति अस्पताल में भर्ती होने लायक नहीं है। रिपोर्ट सामने आने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट की नजर इस बात पर होगी कि क्या चिकित्सकीय आधार पर उम्रकैद की सजा में कोई राहत दी जा सकती है।

नई दिल्ली
2013 के दुष्कर्म मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को सुप्रीम कोर्ट में बड़ा झटका लगा है। मंगलवार (4 अगस्त 2026) को न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी. बी. वराले की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली द्वारा गठित स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट अदालत में दाखिल की। रिपोर्ट में कहा गया कि आसाराम की वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति ऐसी नहीं है कि उन्हें अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता हो। हालांकि उन्हें 24 घंटे प्रशिक्षित केयरगिवर (Trained Caregivers) की सहायता और नियमित चिकित्सकीय निगरानी की जरूरत है।
यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट के 27 मई 2026 के उस फैसले के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) से जुड़ा है, जिसमें आसाराम की आईपीसी के तहत दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने जून 2026 में इस अपील पर नोटिस जारी किया था, लेकिन सजा निलंबित करने पर तत्काल कोई राहत नहीं दी थी।
कोर्ट अपडेट: 4 अगस्त 2026 की सुनवाई में क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान एम्स की मेडिकल रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश की गई। रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि आसाराम को अस्पताल में भर्ती रखने की चिकित्सकीय आवश्यकता नहीं है। हालांकि उनकी गंभीर बीमारियों को देखते हुए 24 घंटे प्रशिक्षित देखभाल और नियमित मेडिकल मॉनिटरिंग जरूरी है।
एम्स की रिपोर्ट दाखिल होने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने सजा निलंबित करने पर कोई आदेश पारित नहीं किया। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की अनुपलब्धता के कारण पीठ ने मामले की अगली सुनवाई गुरुवार के लिए सूचीबद्ध कर दी।
21 जुलाई 2026 का सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण आदेश
इस मामले में 21 जुलाई 2026 की सुनवाई बेहद अहम रही थी। उस दिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि केवल बीमारी का दावा करने से किसी दोषी को सजा निलंबित नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा था कि यदि चिकित्सकीय आधार पर राहत मांगी जा रही है तो पहले स्वतंत्र विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड यह बताए कि वास्तव में अस्पताल में भर्ती होना आवश्यक है या नहीं।
इसी आदेश के तहत एम्स के निदेशक को एक स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड गठित करने और विस्तृत मेडिकल रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया था कि रिपोर्ट मिलने के बाद ही सजा निलंबन की मांग पर विचार किया जाएगा।
केंद्र सरकार का पक्ष
21 जुलाई की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आसाराम की चिकित्सकीय आधार पर सजा निलंबित करने की मांग का विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि कुछ महीने पहले आसाराम ने काशी विश्वनाथ और अयोध्या की यात्रा की थी तथा वहां पैदल भी चले थे। ऐसे में केवल स्वास्थ्य संबंधी दावों के आधार पर राहत देना उचित नहीं होगा।
तुषार मेहता ने अदालत से कहा कि यदि मेडिकल आधार पर राहत मांगी जा रही है तो पहले किसी स्वतंत्र सरकारी विशेषज्ञ संस्था से स्वास्थ्य की जांच कराई जानी चाहिए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने एम्स के निदेशक को स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड गठित कर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया, जिसके आधार पर आगे की सुनवाई तय की गई।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
21 जुलाई की सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट कहा था कि अदालत केवल बीमारी के दावे के आधार पर नियमित जमानत या सजा निलंबित नहीं करेगी। न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी. बी. वराले की पीठ ने कहा कि पहले स्वतंत्र मेडिकल रिपोर्ट आने दी जाए, उसके बाद ही इस पर विचार किया जाएगा। इसी टिप्पणी के बाद एम्स की स्वतंत्र मेडिकल जांच का आदेश दिया गया।
एम्स ने किन बीमारियों का किया उल्लेख?
एम्स की मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार आसाराम कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हैं। इनमें शामिल हैं—
कोरोनरी आर्टरी डिजीज
ऑस्टियोपोरोसिस
क्रॉनिक हाइपोनेट्रेमिया
थैलेसीमिया
बार-बार होने वाली गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ब्लीडिंग
उम्र संबंधी अन्य स्वास्थ्य जटिलताएं
मेडिकल बोर्ड की राय है कि इन बीमारियों के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होना आवश्यक नहीं है। नियमित दवाइयों, चिकित्सकीय निगरानी और प्रशिक्षित केयरगिवर की सहायता पर्याप्त होगी।
राजस्थान हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
27 मई 2026 को राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम की अपील पर फैसला सुनाते हुए पॉक्सो अधिनियम के तहत उनकी दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया था। हालांकि अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की प्रमुख धाराओं के तहत दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।
हाईकोर्ट ने गैंगरेप और आपराधिक साजिश के आरोपों में राहत देते हुए सह-आरोपी शरद और शिल्पी को बरी कर दिया था। इसके बाद आसाराम ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल कर दोषसिद्धि और सजा को चुनौती दी।
क्या है पूरा मामला?
वर्ष 2013 में जोधपुर स्थित आश्रम में एक नाबालिग छात्रा से दुष्कर्म के आरोप में दर्ज मामले में जोधपुर की विशेष पॉक्सो अदालत ने अप्रैल 2018 में आसाराम को दोषी ठहराते हुए शेष प्राकृतिक जीवन तक उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
उन पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत विश्वास की स्थिति का दुरुपयोग कर दुष्कर्म, अवैध बंधक बनाना, मानव तस्करी और आपराधिक धमकी जैसे गंभीर आरोप सिद्ध हुए थे। बाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने कुछ आरोपों में राहत दी, लेकिन आईपीसी के तहत दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।
अब आगे क्या होगा?
एम्स की रिपोर्ट दाखिल होने के बाद अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट इस रिपोर्ट पर आसाराम, केंद्र सरकार और राजस्थान सरकार की दलीलें सुनेगा। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि चिकित्सकीय आधार पर सजा निलंबित करने का कोई कानूनी आधार बनता है या नहीं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि एम्स की रिपोर्ट अपने आप में अंतिम फैसला नहीं है, बल्कि अदालत के समक्ष एक स्वतंत्र विशेषज्ञ चिकित्सा राय है। अंतिम निर्णय सभी पक्षों की दलीलें और रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों पर विचार करने के बाद ही लिया जाएगा।
अदालत में किसने की पैरवी?
आसाराम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डी. शेषाद्रि नायडू और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड निशांत बिश्नोई ने पक्ष रखा। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पैरवी की।
केस का विवरण
केस शीर्षक: ASHA RAM @ ASHUMAL v. State of Rajasthan
केस संख्या: SLP (Crl.) No. 11761/2026
