लॉ-एंड-आर्डर
22 साल जेल में काटने के बाद मिला इंसाफ! ट्रिपल मर्डर केस में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को किया बरी, कहा- कमजोर जांच और अविश्वसनीय गवाही ने छीन लिए जिंदगी के 22 साल
22 साल... करीब आठ हजार दिन... जिंदगी का सबसे कीमती वक्त सलाखों के पीछे बीत गया। आरोप था तीन महिलाओं की हत्या का, लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले की दोबारा पड़ताल की तो जांच में गंभीर खामियां, गवाहों के विरोधाभासी बयान और सबूतों की कमजोर कड़ी सामने आई। अदालत ने साफ कहा कि सिर्फ संदेह और अविश्वसनीय गवाही के आधार पर किसी की आजादी नहीं छीनी जा सकती। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को बरी करते हुए ऐसी टिप्पणी की, जिसने देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा के लगभग 22 वर्ष पुराने ट्रिपल मर्डर मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उम्रकैद की सजा काट रहे अर्जुन जानी उर्फ टुनटुन को बरी कर दिया। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 4 अगस्त 2026 को कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ अपराध संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। अदालत ने यह भी कहा कि कमजोर जांच, अविश्वसनीय गवाहों और न्यायिक चूक के कारण एक व्यक्ति के जीवन के 22 वर्ष व्यर्थ चले गए।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2004 का है। ओडिशा के तत्कालीन नबरंगपुर (अब नवरंगपुर) जिले में एक ही रात तीन महिलाओं—कमला, सोनबरी और रतनाई—की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। तीनों महिलाओं के सिर पर भारी पत्थर या ईंट जैसी वस्तु से वार किया गया था। घटना के बाद इलाके में सनसनी फैल गई और पुलिस ने अर्जुन जानी उर्फ टुनटुन को गिरफ्तार कर हत्या का आरोपी बनाया।
कैसे हुई जांच और ट्रायल?
पुलिस का पूरा मामला मुख्य रूप से एक प्रत्यक्षदर्शी महिला की गवाही पर आधारित था। उसका दावा था कि उसने रात करीब एक बजे अपने घर के दरवाजे की दरार से आरोपी को रतनाई पर पत्थर से हमला करते देखा। हालांकि उसने उसी रात बाकी दो हत्याओं का जिक्र नहीं किया। अगले दिन उसने तीनों हत्याओं की बात कही।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, नबरंगपुर की अदालत ने 25 अगस्त 2006 को अर्जुन जानी को रतनाई की हत्या का दोषी मानते हुए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई। हालांकि तीन महिलाओं की हत्या का मामला होने के बावजूद दोषसिद्धि केवल एक हत्या में हुई।
हाईकोर्ट ने बिना मेरिट सुने खारिज कर दी अपील
सजा के बाद अर्जुन जानी ने जेल से ओडिशा हाईकोर्ट में अपील दायर की। लेकिन अपील लगभग 3157 दिन यानी करीब नौ साल की देरी से दाखिल हुई थी। 11 जनवरी 2016 को हाईकोर्ट ने केवल देरी का हवाला देते हुए अपील को बिना मेरिट पर सुनवाई किए ही खारिज कर दिया। उस समय तक आरोपी लगभग 12 वर्ष जेल में बिता चुका था।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले दी जमानत
मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के रवैये को "बेहद चिंताजनक" बताया। अदालत ने कहा कि जेल से दायर अपीलों में अदालतों को व्यावहारिक और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। कोर्ट ने आरोपी को जमानत दी और मामले की दोबारा सुनवाई का फैसला किया।
सुप्रीम कोर्ट को जांच में क्या मिलीं खामियां?
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल रिकॉर्ड का विस्तृत परीक्षण किया और कई गंभीर कमियां पाईं।
अदालत ने कहा कि:
• एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी की गवाही कई जगह विरोधाभासी और अविश्वसनीय थी।
• तीनों महिलाओं की हत्या की कहानी और गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते थे।
• जांच अधिकारी ने घटनास्थल का समुचित नक्शा तक तैयार नहीं किया।
• जिन पत्थरों और ईंटों को हत्या का हथियार बताया गया, उन पर फॉरेंसिक जांच में खून के निशान नहीं मिले।
• आरोपी से पुलिस हिरासत में लिया गया कथित इकबालिया बयान कानूनन स्वीकार्य नहीं था।
• बरामदगी से जुड़े गवाहों और पुलिस के बयानों में भी गंभीर विरोधाभास थे।
• अभियोजन पक्ष ऐसा कोई ठोस वैज्ञानिक या स्वतंत्र साक्ष्य पेश नहीं कर पाया जिससे आरोपी का अपराध सिद्ध हो सके।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही के आधार पर दोषसिद्धि तभी संभव है जब वह पूरी तरह विश्वसनीय, सुसंगत और अन्य साक्ष्यों से पुष्ट हो। इस मामले में ऐसा नहीं था। अदालत ने कहा कि तीन लोगों की जान चली गई, लेकिन केवल संदेह के आधार पर एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया। पुलिस हिरासत में उससे कथित स्वीकारोक्ति कराई गई, ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और हाईकोर्ट ने तकनीकी आधार पर अपील खारिज कर दी। इन सभी कारणों से एक व्यक्ति के जीवन के 22 वर्ष बिना विश्वसनीय साक्ष्य के जेल में बीत गए।
पुनर्वास का भी आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को बरी करने के साथ ही कोरापुट जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) और जिला प्रशासन को निर्देश दिया कि उसकी समाज में पुनर्वापसी और पुनर्वास के लिए आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जाए।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह फैसला केवल एक आरोपी की रिहाई तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि जेल से दायर आपराधिक अपीलों को केवल तकनीकी देरी के आधार पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता दांव पर हो तो अदालतों का पहला दायित्व न्याय सुनिश्चित करना है, न कि केवल प्रक्रिया का पालन करना।
