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13 साल बाद आसाराम को पहली नियमित पैरोल: राजस्थान हाईकोर्ट ने दी 20 दिन की राहत, कहा- 'सिर्फ आशंकाओं के आधार पर नहीं रोकी जा सकती पैरोल'

4 अगस्त 2026 के आदेश में राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे आसाराम को पहली बार 20 दिन की नियमित पैरोल मंजूर की। अदालत ने राज्य सरकार और पुलिस की आपत्तियों को निराधार बताते हुए कहा कि पैरोल का फैसला तथ्यों और कानून के आधार पर होगा, न कि कल्पनाओं के आधार पर।

Sonali05 अग. 2026, 04:48 PM IST
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13 साल बाद आसाराम को पहली नियमित पैरोल: राजस्थान हाईकोर्ट ने दी 20 दिन की राहत, कहा- 'सिर्फ आशंकाओं के आधार पर नहीं रोकी जा सकती पैरोल'

करीब 13 वर्षों से जेल में बंद स्वयंभू संत आसाराम को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। जोधपुर पीठ ने 4 अगस्त 2026 को पारित आदेश (जो 5 अगस्त को सार्वजनिक हुआ) में आसाराम को 20 दिन की पहली नियमित पैरोल देने का निर्देश दिया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने कहा कि आसाराम 13 वर्ष, 1 माह और 24 दिन जेल में बिता चुका है तथा पहले मिली अंतरिम जमानत का उसने कभी दुरुपयोग नहीं किया। ऐसे में केवल आशंकाओं के आधार पर पैरोल से इनकार करना कानून के अनुरूप नहीं है।

आसाराम को अगस्त 2013 में जोधपुर में एक नाबालिग छात्रा से दुष्कर्म के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। 25 अप्रैल 2018 को विशेष POCSO अदालत ने उसे दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके बाद 27 मई 2026 को राजस्थान हाईकोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। अब उसी सजा के दौरान उसे पहली नियमित पैरोल मिली है।


इससे पहले जिला कलेक्टर और जिला मजिस्ट्रेट ने आसाराम की 20 दिन की पैरोल याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि उसके फरार होने, शिकायतकर्ता के परिवार के लिए खतरा बनने और कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका है। राज्य सरकार ने यह भी दलील दी कि राजस्थान Prisoners Release on Parole Rules, 1958 के तहत वह पैरोल का पात्र नहीं है। हालांकि हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि राज्य सरकार अपनी आशंकाओं के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सकी। अदालत ने इन्हें "बिना किसी आधार की कल्पना" करार दिया।


कोर्ट ने अपने आदेश में जिला स्तरीय पैरोल समितियों की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि कई मामलों में समितियां वास्तविक तथ्यों के बजाय एक जैसी सामान्य आशंकाओं के आधार पर पैरोल आवेदन खारिज कर देती हैं। ऐसा दृष्टिकोण कानून की भावना के अनुरूप नहीं है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राजस्थान में दी गई सजा पर राजस्थान Prisoners Release on Parole Rules, 1958 लागू होंगे। यदि किसी अन्य राज्य में कोई अलग आपराधिक मामला लंबित है या सजा हुई है, तो उस पर संबंधित राज्य का कानून लागू होगा, लेकिन उसे राजस्थान में नियमित पैरोल रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

आसाराम की आयु, 13 वर्ष से अधिक की जेल अवधि और जेल में उसके संतोषजनक आचरण को देखते हुए हाईकोर्ट ने 20 दिन की पहली नियमित पैरोल मंजूर की। साथ ही पुलिस अधीक्षक को आवश्यक और उचित शर्तें तय करने का अधिकार दिया, ताकि पैरोल अवधि समाप्त होने पर उसकी समय पर जेल वापसी सुनिश्चित की जा सके।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

अदालत ने कहा कि किसी कैदी की पैरोल याचिका केवल अनुमान, आशंका या सामान्य पुलिस रिपोर्ट के आधार पर खारिज नहीं की जा सकती। यदि कैदी का आचरण अच्छा रहा है, पहले मिली राहत का उसने दुरुपयोग नहीं किया है और वह कानून में निर्धारित शर्तों को पूरा करता है, तो उसकी पैरोल याचिका पर निष्पक्ष और तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

पूरा घटनाक्रम

  • अगस्त 2013: जोधपुर में नाबालिग से दुष्कर्म के आरोप में आसाराम की गिरफ्तारी।

  • 25 अप्रैल 2018: विशेष POCSO अदालत ने दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।

  • समय-समय पर स्वास्थ्य आधार पर अंतरिम जमानत मिली, लेकिन किसी भी राहत का दुरुपयोग नहीं हुआ।

  • 27 मई 2026: राजस्थान हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।

  • 4 अगस्त 2026: राजस्थान हाईकोर्ट ने 20 दिन की पहली नियमित पैरोल मंजूर की।

  • 5 अगस्त 2026: कोर्ट का विस्तृत आदेश सार्वजनिक हुआ।

क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

यह फैसला केवल आसाराम के मामले तक सीमित नहीं है। राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नियमित पैरोल और जमानत (Bail) अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाएं हैं। पैरोल किसी दोषी की सजा समाप्त नहीं करती, बल्कि अच्छे आचरण, जेल में बिताए गए समय और कानून में निर्धारित पात्रता के आधार पर सीमित अवधि के लिए दी जाने वाली राहत है। अदालत की यह टिप्पणी भविष्य में पैरोल से जुड़े मामलों में भी महत्वपूर्ण मिसाल मानी जा सकती है, क्योंकि इससे यह सिद्धांत मजबूत होता है कि प्रशासनिक आशंकाओं के बजाय ठोस तथ्यों और कानून के आधार पर ही पैरोल का फैसला किया जाना चाहिए।

केस विवरण

कोर्ट का आदेश: 4 अगस्त 2026 (सार्वजनिक: 5 अगस्त 2026)

पीठ: कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा एवं न्यायमूर्ति संजीत पुरोहित

केस: Asha Ram v. State of Rajasthan & Others

साइटेशन: 2026  (Raj) 318