लॉ-एंड-आर्डर

"खबर दिखाइए, कोर्ट क्लिप मत चलाइए" — सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को लेकर साफ किए नियम

अदालत की चारदीवारी से निकली हर आवाज अब सीधे स्क्रीन तक नहीं पहुंचेगी! सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया रिपोर्टिंग को लेकर बड़ा संदेश देते हुए साफ कर दिया है कि न्यायालय की खबर दिखाइए, लेकिन कोर्ट की सुनवाई के वीडियो और ऑडियो क्लिप को वायरल करने से बचिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्यायिक प्रक्रिया की जानकारी जनता तक पहुंचना जरूरी है, मगर अधूरी क्लिप या कटे हुए वीडियो से गलत संदेश फैल सकता है।

Sonali05 अग. 2026, 04:49 PM IST
खबर शेयर करें:
"खबर दिखाइए, कोर्ट क्लिप मत चलाइए" — सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को लेकर साफ किए नियम

नई दिल्ली:

 सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों की कार्यवाही की रिपोर्टिंग को लेकर चल रहे भ्रम को खत्म करते हुए साफ कर दिया है कि न्यूज चैनल, अखबार और डिजिटल मीडिया संस्थान कोर्ट की सुनवाई की खबरें प्रकाशित कर सकते हैं। अदालत ने कहा कि उसके हालिया आदेश का उद्देश्य मीडिया की रिपोर्टिंग को रोकना नहीं, बल्कि कोर्ट की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के गलत इस्तेमाल को नियंत्रित करना है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मान्यता प्राप्त समाचार संस्थान कोर्ट की बहस, जजों की टिप्पणियों, फैसलों और कानूनी घटनाक्रमों की रिपोर्टिंग कर सकते हैं, लेकिन कोर्ट कार्यवाही के ऑडियो या वीडियो क्लिप को अपनी खबरों में इस्तेमाल नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्टीकरण 24 जुलाई 2026 के अंतरिम आदेश को लेकर पैदा हुई गलतफहमी के बाद आया है।


CJI सूर्यकांत की बेंच ने दूर किया मीडिया रिपोर्टिंग को लेकर भ्रम

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन शामिल हैं, ने इस मामले में स्पष्टीकरण जारी किया। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि 24 जुलाई के आदेश के एक हिस्से को लेकर भ्रम की स्थिति बन गई थी। कुछ लोगों को लगा कि सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया संस्थानों को कोर्ट की कार्यवाही रिपोर्ट करने से रोक दिया है। लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि ऐसा नहीं है। मान्यता प्राप्त न्यूज संस्थान पहले की तरह अदालत की सुनवाई और न्यायिक फैसलों की रिपोर्टिंग कर सकते हैं। हालांकि, रिपोर्ट में कोर्ट की लाइव स्ट्रीमिंग या रिकॉर्डिंग के ऑडियो-वीडियो क्लिप का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आदेश को मीडिया रिपोर्टिंग पर पूर्ण प्रतिबंध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।


24 जुलाई के सुप्रीम कोर्ट आदेश में क्या कहा गया था?

दरअसल, 24 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग और रिकॉर्डिंग से जुड़े मामले में अंतरिम आदेश जारी किया था।

इस आदेश में अदालत ने बिना अनुमति कोर्ट की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के इस्तेमाल पर रोक लगाई थी।

इसके तहत कोर्ट कार्यवाही की रिकॉर्डिंग को:

  • डाउनलोड करना

  • एडिट करना

  • सोशल मीडिया पर अपलोड करना

  • दोबारा शेयर करना

  • वायरल करना

  • कमर्शियल इस्तेमाल करना  

  • अनुमति के बिना प्रतिबंधित किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अदालत की रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल संबंधित कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता।


कोर्ट वीडियो क्लिप पर रोक लगाने की जरूरत क्यों पड़ी?

सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला इसलिए आया क्योंकि कई बार अदालत की सुनवाई के छोटे हिस्सों को काटकर सोशल मीडिया पर वायरल किया जा रहा था।

कई मामलों में जजों की टिप्पणियों या कोर्ट की बहस को पूरे संदर्भ से हटाकर पेश किया जाता है, जिससे गलत संदेश जा सकता है।

अदालत का मानना है कि इस तरह के चयनात्मक वीडियो प्रसारण से न्यायपालिका की गरिमा और लोगों के विश्वास पर असर पड़ सकता है।

इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट रिकॉर्डिंग के इस्तेमाल को नियंत्रित करने की जरूरत महसूस की।


पत्रकार हर्षिता ग्रोवर की याचिका पर हो रही सुनवाई

यह मामला पत्रकार हर्षिता ग्रोवर की ओर से दाखिल जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा है।

याचिका में अदालतों की लाइव स्ट्रीमिंग, वीडियो रिकॉर्डिंग और उनके डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट नियम बनाने की मांग की गई थी।

याचिका में कहा गया था कि कोर्ट कार्यवाही के वीडियो क्लिप को एडिट करके या संदर्भ से हटाकर प्रसारित करने से न्याय व्यवस्था की छवि प्रभावित हो सकती है।

मामले का नाम:

Harshita Grover v. Union of India and Others

W.P.(C) No. 751/2026


सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट और सोशल मीडिया कंपनियों से मांगा जवाब

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट को पक्षकार बनाया है। अदालत ने हाई कोर्ट से रिपोर्ट मांगी है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की मॉडल लाइव स्ट्रीमिंग गाइडलाइंस को किस तरह लागू किया है। साथ ही कोर्ट ने यह भी जानना चाहा है कि लगातार लाइव स्ट्रीमिंग से न्यायिक प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ा है।

इसके अलावा केंद्र सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी नोटिस जारी किया गया है।


RTI कार्यकर्ताओं को भी बनाया गया पक्षकार

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उन RTI कार्यकर्ताओं की हस्तक्षेप याचिका स्वीकार कर ली, जो कोर्ट कार्यवाही की क्लिप शेयर करने पर पूरी तरह रोक लगाने के पक्ष में नहीं हैं। उन्हें मामले में हस्तक्षेपकर्ता के रूप में कोर्ट की सहायता करने की अनुमति दी गई है। उनका कहना है कि अदालत की कार्यवाही में पारदर्शिता और जनता के जानने के अधिकार को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।


18 सितंबर को होगी अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर 2026 तय की है। इस दौरान केंद्र सरकार, सोशल मीडिया कंपनियां और हाई कोर्ट अपनी रिपोर्ट और जवाब दाखिल करेंगे। इसके बाद अदालत लाइव स्ट्रीमिंग और कोर्ट रिकॉर्डिंग के इस्तेमाल को लेकर आगे के दिशा-निर्देश तय कर सकती है।


सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सीधा मतलब

सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्टीकरण के बाद स्थिति पूरी तरह साफ हो गई है:

  • न्यूज चैनल और मीडिया संस्थान कोर्ट की खबरें दिखा सकते हैं।

  • अदालत की सुनवाई और फैसलों की रिपोर्टिंग की जा सकती है।

  • जनता को कानूनी घटनाक्रमों की जानकारी दी जा सकती है।

  • लेकिन कोर्ट की सुनवाई के ऑडियो-वीडियो क्लिप बिना अनुमति इस्तेमाल नहीं किए जा सकते।

यह आदेश मीडिया की स्वतंत्रता और न्यायपालिका की गरिमा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है।