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CBI ट्रैप केस में पूर्व रेलवे इंजीनियर दोषी, अदालत ने सुनाई 4 साल की सजा
सीबीआई की विशेष अदालत, लखनऊ ने उत्तर मध्य रेलवे के पूर्व सहायक मंडल सिग्नल एवं दूरसंचार अभियंता गिरिजेश कुमार गौर को रिश्वतखोरी के मामले में चार वर्ष के कठोर कारावास और 20,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है। आरोपी को वर्ष 2016 में सीबीआई ने ट्रैप कार्रवाई के दौरान रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया था।

लखनऊ: केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत, लखनऊ ने उत्तर मध्य रेलवे (एनसीआर) के बांदा मंडल में तैनात तत्कालीन सहायक मंडल सिग्नल एवं दूरसंचार अभियंता (एडीएसटीई) गिरिजेश कुमार गौर को रिश्वतखोरी के मामले में दोषी ठहराते हुए चार वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने आरोपी पर 20,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है। यह फैसला 4 अगस्त 2026 को सुनाया गया।
यह मामला वर्ष 2016 में सामने आया था, जब एक ठेकेदार ने सीबीआई से शिकायत की थी कि रेलवे में उसके वाहन अनुबंध से संबंधित लंबित बिलों को पास करने के बदले रिश्वत की मांग की जा रही है। करीब दस वर्ष तक चली जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत ने आरोपी को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई।
क्या था पूरा मामला?
सीबीआई के अनुसार 27 मई 2016 को दर्ज शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उत्तर मध्य रेलवे, बांदा में तैनात तत्कालीन एडीएसटीई गिरिजेश कुमार गौर ने शिकायतकर्ता के लगभग 80,000 रुपये के बिलों को स्वीकृत और पारित करने के बदले 20,000 रुपये रिश्वत की मांग की थी। शिकायत के मुताबिक 10,000 रुपये बिल स्वीकृत होने से पहले और शेष 10,000 रुपये बिल पारित होने के बाद देने के लिए कहा गया था।
शिकायतकर्ता रेलवे कार्यालय के साथ अनुबंध के तहत वाहन उपलब्ध कराता था और उसी अनुबंध से जुड़े भुगतान को मंजूरी देने के लिए कथित तौर पर अवैध धन की मांग की गई थी।
सीबीआई ने ऐसे किया ट्रैप
शिकायत मिलने के बाद सीबीआई ने मामले का सत्यापन किया और उसी दिन ट्रैप ऑपरेशन की योजना बनाई। जांच एजेंसी की टीम ने शिकायतकर्ता के सहयोग से जाल बिछाया। कार्रवाई के दौरान आरोपी गिरिजेश कुमार गौर को उसके आवास पर 10,000 रुपये की कथित मांग के विरुद्ध 9,700 रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया गया। सीबीआई ने मौके से रिश्वत की राशि बरामद की और आवश्यक दस्तावेजी एवं वैज्ञानिक साक्ष्य भी एकत्र किए। इसके बाद आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार से संबंधित प्रावधानों के तहत मामला दर्ज कर विस्तृत जांच शुरू की गई।
जांच के बाद दाखिल हुआ आरोपपत्र
सीबीआई ने जांच पूरी करने के बाद 24 जून 2016 को विशेष अदालत में आरोपी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने रिश्वत मांगने और रिश्वत स्वीकार करने से संबंधित दस्तावेजी साक्ष्य, गवाहों के बयान और ट्रैप कार्रवाई से जुड़े प्रमाण अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए। सभी साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद सीबीआई की विशेष अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराया और उसे चार वर्ष के कठोर कारावास तथा 20,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई।
भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त संदेश
यह फैसला सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार के खिलाफ न्यायपालिका की सख्त सोच को दर्शाता है। सार्वजनिक पद पर बैठे अधिकारियों द्वारा सरकारी कार्यों के बदले रिश्वत मांगना भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत गंभीर अपराध माना जाता है। ऐसे मामलों में दोषसिद्धि न केवल सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करती है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि भ्रष्टाचार के मामलों में जांच एजेंसियां और अदालतें कठोर कार्रवाई करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के फैसले सरकारी सेवाओं में ईमानदारी को बढ़ावा देने, ठेकेदारों और आम नागरिकों का विश्वास मजबूत करने तथा सार्वजनिक संस्थानों में भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
