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दवा सुरक्षा में भारत की बड़ी उपलब्धि, WHO ने IPC को दी वैश्विक जिम्मेदारी
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दक्षिण-पूर्व एशिया नियामक नेटवर्क (SEARN) ने भारतीय फार्माकोपिया आयोग (IPC) को "रीजनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन फार्माकोविजिलेंस" और "टेक्निकल सेंटर इन क्वालिटी ऑफ मेडिसिन्स" के रूप में मान्यता दी है। यह घोषणा नेपाल के काठमांडू में आयोजित SEARN की 10वीं वर्षगांठ बैठक के दौरान हुई। इस उपलब्धि से भारत दक्षिण-पूर्व एशिया में दवा सुरक्षा, गुणवत्ता मानकों, नियामक क्षमता निर्माण और फार्माकोविजिलेंस प्रणाली को मजबूत करने में अग्रणी भूमिका निभाएगा। यह सम्मान वैश्विक स्तर पर भारतीय दवा नियामक प्रणाली पर बढ़ते विश्वास और सार्वजनिक स्वास्थ्य में भारत के बढ़ते योगदान का प्रतीक है।
Vindhya Dubey05 अग. 2026, 07:32 PM IST

नई दिल्ली/काठमांडू: भारत ने वैश्विक स्वास्थ्य और दवा नियमन (Drug Regulation) के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत भारतीय फार्माकोपिया आयोग (Indian Pharmacopoeia Commission - IPC) को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दक्षिण-पूर्व एशिया नियामक नेटवर्क (SEARN) द्वारा "रीजनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन फार्माकोविजिलेंस" तथा "टेक्निकल सेंटर इन क्वालिटी ऑफ मेडिसिन्स" के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। यह सम्मान नेपाल के काठमांडू में 4-5 अगस्त 2026 को आयोजित SEARN की 10वीं वर्षगांठ बैठक के दौरान दिया गया।
यह मान्यता केवल भारत की वैज्ञानिक क्षमता का प्रमाण नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि भारतीय दवा गुणवत्ता मानक, औषधि सुरक्षा प्रणाली और नियामक ढांचा अब दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों के लिए एक मॉडल बन चुके हैं।
बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व IPC के सचिव-सह-वैज्ञानिक निदेशक डॉ. वी. कलैसेलवन के नेतृत्व में किया गया। प्रतिनिधिमंडल ने भारतीय फार्माकोपिया, इंडियन फार्माकोपिया रेफरेंस सब्सटेंस (IPRS), इम्प्योरिटी रेफरेंस स्टैंडर्ड्स (IMPRS), फार्माकोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया (PvPI), मैटेरियोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया (MvPI), प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहयोगी पहलों की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की।
क्या है SEARN?
South-East Asia Regulatory Network (SEARN) की स्थापना वर्ष 2016 में WHO South-East Asia Regional Office (SEARO) ने की थी। इसका उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों की दवा नियामक संस्थाओं (National Regulatory Authorities) के बीच सहयोग बढ़ाना, दवा गुणवत्ता सुनिश्चित करना, नियामक प्रक्रियाओं का सामंजस्य स्थापित करना, क्षमता निर्माण करना और सुरक्षित व प्रभावी चिकित्सा उत्पादों तक लोगों की पहुंच बढ़ाना है। नेटवर्क गुणवत्ता नियंत्रण, फार्माकोविजिलेंस, क्लीनिकल ट्रायल, मेडिकल डिवाइस नियमन, डिजिटल रेगुलेशन और आपातकालीन नियामक तैयारियों जैसे क्षेत्रों में कार्य करता है।
फार्माकोविजिलेंस वह वैज्ञानिक प्रणाली है जिसके माध्यम से दवाओं के उपयोग के बाद होने वाले दुष्प्रभावों (Adverse Drug Reactions) की निगरानी की जाती है। यदि किसी दवा से असामान्य या गंभीर दुष्प्रभाव सामने आते हैं, तो उन्हें दर्ज किया जाता है, उनका विश्लेषण किया जाता है और आवश्यकता पड़ने पर दवा के उपयोग संबंधी चेतावनी, संशोधन या प्रतिबंध जैसी नियामक कार्रवाई की जाती है।
भारत में यह कार्य IPC के अंतर्गत संचालित Pharmacovigilance Programme of India (PvPI) के माध्यम से किया जाता है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य मरीजों की सुरक्षा बढ़ाना, दवाओं के लाभ-हानि का वैज्ञानिक मूल्यांकन करना और स्वास्थ्य प्रणाली को अधिक सुरक्षित बनाना है।
IPC को मिली नई जिम्मेदारी का क्या अर्थ है?
WHO द्वारा रीजनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का दर्जा मिलने के बाद IPC दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों को फार्माकोविजिलेंस प्रणाली विकसित करने, विशेषज्ञ प्रशिक्षण देने, तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने, दवा गुणवत्ता मानकों के निर्माण, सुरक्षा संकेतों (Safety Signals) के विश्लेषण तथा नियामक क्षमता निर्माण में नेतृत्व प्रदान करेगा। इससे क्षेत्रीय स्तर पर दवा सुरक्षा और गुणवत्ता को लेकर एक समान और मजबूत व्यवस्था विकसित होगी।
भारत के लिए यह उपलब्धि क्यों महत्वपूर्ण है?
यह उपलब्धि भारत की वैश्विक स्वास्थ्य कूटनीति को मजबूत करती है। भारत पहले से ही विश्व का प्रमुख दवा उत्पादक और जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। ऐसे में WHO द्वारा IPC को मिली यह मान्यता भारतीय दवा नियामक प्रणाली पर अंतरराष्ट्रीय विश्वास को और मजबूत करेगी। इससे भारतीय विशेषज्ञों की भूमिका वैश्विक स्वास्थ्य नीतियों में बढ़ेगी तथा भारत "फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड" के रूप में अपनी स्थिति को और सुदृढ़ करेगा।
मरीजों और स्वास्थ्य क्षेत्र को क्या लाभ होगा?
इस निर्णय से दवाओं के दुष्प्रभावों की पहचान अधिक तेजी से हो सकेगी, नकली और निम्न गुणवत्ता वाली दवाओं पर निगरानी मजबूत होगी, नई दवाओं की सुरक्षा का बेहतर मूल्यांकन संभव होगा, डॉक्टरों और अस्पतालों को वैज्ञानिक सुरक्षा जानकारी समय पर उपलब्ध होगी तथा पूरे क्षेत्र में मरीजों को अधिक सुरक्षित, प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराने में सहायता मिलेगी। साथ ही नियामक संस्थाओं के बीच सूचना साझा करने और संयुक्त कार्रवाई की क्षमता भी बढ़ेगी।
भारत की बढ़ती वैश्विक पहचान
हाल के वर्षों में भारतीय फार्माकोपिया को कई देशों द्वारा स्वीकार किया गया है और IPC लगातार नई दवा मानक पुस्तकों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा डिजिटल फार्माकोविजिलेंस प्रणालियों पर कार्य कर रहा है। भारत का फार्माकोविजिलेंस कार्यक्रम WHO के अंतरराष्ट्रीय दवा निगरानी कार्यक्रम का सक्रिय सदस्य है और दक्षिण-पूर्व एशिया में दवा सुरक्षा से जुड़े कई क्षेत्रीय प्रयासों का नेतृत्व भी करता रहा है। यही निरंतर योगदान अब WHO द्वारा इस नई मान्यता के रूप में सामने आया है।
इस उपलब्धि के साथ भारत केवल अपनी दवा गुणवत्ता प्रणाली को मजबूत नहीं कर रहा, बल्कि पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में सुरक्षित, प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करने में एक प्रमुख वैज्ञानिक और नियामक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभर रहा है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, मरीजों की सुरक्षा और वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग की दिशा में भारत के बढ़ते प्रभाव का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
