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विश्व स्तनपान सप्ताह 2026: जीवन के पहले 1000 दिनों पर सरकार का विशेष फोकस

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय 1 से 7 अगस्त 2026 तक 'पोषण अभियान' के तहत पूरे देश में विश्व स्तनपान सप्ताह मना रहा है। इस वर्ष की थीम है "Breastfeeding for a Sustainable Start in Life: Strengthen What Works"। अभियान के तहत जन्म के पहले घंटे (गोल्डन ऑवर) में स्तनपान शुरू कराने, पहले छह महीने तक केवल मां का दूध पिलाने और दो वर्ष या उससे अधिक समय तक स्तनपान जारी रखने पर जोर दिया जा रहा है। सरकार का कहना है कि जीवन के पहले 1000 दिनों में सही पोषण बच्चे के मस्तिष्क विकास, रोग प्रतिरोधक क्षमता और स्वस्थ भविष्य की मजबूत नींव रखता है।

Vindhya Dubey05 अग. 2026, 08:06 PM IST
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विश्व स्तनपान सप्ताह 2026: जीवन के पहले 1000 दिनों पर सरकार का विशेष फोकस

नई दिल्ली: भारत सरकार का महिला एवं बाल विकास मंत्रालय 1 से 7 अगस्त 2026 तक पूरे देश में विश्व स्तनपान सप्ताह (World Breastfeeding Week 2026) मना रहा है। इस वर्ष की थीम है – "Breastfeeding for a Sustainable Start in Life: Strengthen What Works", अर्थात "जीवन की सतत और स्वस्थ शुरुआत के लिए स्तनपान: जो प्रभावी है, उसे और मजबूत बनाएं"।

यह अभियान पोषण अभियान (POSHAN Abhiyaan) के अंतर्गत चलाया जा रहा है। देशभर के आंगनवाड़ी केंद्र, स्वास्थ्य संस्थान, आशा कार्यकर्ता, सामुदायिक संगठन और डिजिटल माध्यमों से माताओं एवं परिवारों को स्तनपान के महत्व के प्रति जागरूक किया जा रहा है।

जीवन के पहले 1000 दिन क्यों हैं सबसे महत्वपूर्ण?
विशेषज्ञों के अनुसार गर्भावस्था की शुरुआत से लेकर बच्चे के दो वर्ष की आयु तक का समय, यानी जीवन के पहले 1000 दिन, बच्चे के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास की सबसे महत्वपूर्ण अवधि होती है। इसी दौरान मस्तिष्क का तेजी से विकास होता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बनती है और भविष्य के स्वास्थ्य की मजबूत नींव रखी जाती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनिसेफ (UNICEF) भी मानते हैं कि इस अवधि में सही पोषण मिलने से कुपोषण, संक्रमण और शिशु मृत्यु दर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

जन्म के पहले घंटे में स्तनपान क्यों जरूरी?
सरकार ने सभी परिवारों से अपील की है कि नवजात को जन्म के पहले एक घंटे के भीतर मां का दूध अवश्य पिलाया जाए। इसे 'गोल्डन ऑवर' कहा जाता है।

इस समय निकलने वाला पहला गाढ़ा पीला दूध, जिसे कोलोस्ट्रम (Colostrum) कहा जाता है, बच्चे का पहला प्राकृतिक टीका माना जाता है। इसमें एंटीबॉडी, प्रोटीन, विटामिन और रोग प्रतिरोधक तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो नवजात को संक्रमणों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कई जगहों पर आज भी गलत धारणाओं के कारण इस पहले दूध को फेंक दिया जाता है, जबकि यह बच्चे के लिए सबसे अधिक लाभकारी होता है।

पहले छह महीने केवल मां का दूध
विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सरकार की सिफारिश है कि जन्म के बाद पहले छह महीनों तक शिशु को केवल मां का दूध दिया जाए। इस दौरान बच्चे को पानी, शहद, घुट्टी, ग्लूकोज या फॉर्मूला दूध देने की आवश्यकता नहीं होती।

मां का दूध ही बच्चे की पोषण और पानी की सभी जरूरतें पूरी करता है तथा डायरिया, निमोनिया और अन्य गंभीर संक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करता है।
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छह महीने बाद क्या करें?
छह महीने की आयु पूरी होने के बाद बच्चे को उम्र के अनुसार पूरक आहार (Complementary Feeding) देना शुरू करना चाहिए, लेकिन इसके साथ स्तनपान दो वर्ष या उससे अधिक समय तक जारी रखने की सलाह दी जाती है। इससे बच्चे को संतुलित पोषण मिलता है और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहती है।

मां को भी होते हैं कई फायदे
स्तनपान केवल बच्चे के लिए ही नहीं बल्कि मां के स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार नियमित स्तनपान से प्रसव के बाद गर्भाशय जल्दी सामान्य स्थिति में लौटता है, अत्यधिक रक्तस्राव का खतरा कम होता है तथा स्तन और अंडाशय के कैंसर का जोखिम भी कम हो सकता है। इसके अलावा यह मां और बच्चे के बीच भावनात्मक संबंध को भी मजबूत बनाता है।

कामकाजी माताओं के लिए भी सलाह
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय कामकाजी महिलाओं को स्तनपान जारी रखने के लिए भी जागरूक कर रहा है। माताओं को सिखाया जा रहा है कि वे स्तन दूध को सुरक्षित तरीके से निकालकर (Express Breast Milk) स्वच्छ परिस्थितियों में संग्रहित कर सकती हैं, ताकि कार्यस्थल पर लौटने के बाद भी बच्चे को मां का दूध मिलता रहे।

इसके साथ ही सही तरीके से बच्चे को स्तनपान कराने की स्थिति (Positioning) और सही लगाव (Attachment) के बारे में भी जानकारी दी जा रही है।
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आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, आशा कार्यकर्ता और स्वास्थ्य केंद्र माताओं को स्तनपान संबंधी समस्याओं के समाधान, पोषण परामर्श और शिशु देखभाल के बारे में मार्गदर्शन दे रहे हैं। यदि किसी मां को स्तनपान कराने में कठिनाई होती है तो उन्हें तुरंत स्वास्थ्य विशेषज्ञों से सहायता लेने की सलाह दी जा रही है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह अभियान?
भारत में कुपोषण, कम वजन वाले बच्चों और शिशु मृत्यु दर जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए स्तनपान सबसे प्रभावी, सुरक्षित और कम लागत वाला उपाय माना जाता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के अनुसार देश में अभी भी सभी शिशुओं को जन्म के पहले घंटे में स्तनपान नहीं मिल पाता और छह महीने तक केवल मां का दूध पिलाने की दर को और बेहतर बनाने की आवश्यकता है। इसी कारण जागरूकता अभियान लगातार चलाए जा रहे हैं।

विश्व स्तनपान सप्ताह का उद्देश्य केवल माताओं को जागरूक करना नहीं, बल्कि परिवार, समाज, स्वास्थ्यकर्मियों और नियोक्ताओं को भी ऐसी परिस्थितियां बनाने के लिए प्रेरित करना है, जहां हर मां बिना किसी बाधा के अपने बच्चे को स्तनपान करा सके।

सरकार का मानना है कि यदि प्रत्येक नवजात को जन्म के पहले घंटे में स्तनपान मिले, पहले छह महीने तक केवल मां का दूध दिया जाए और दो वर्ष या उससे अधिक समय तक स्तनपान जारी रखा जाए, तो कुपोषण, संक्रमण और शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। यही कारण है कि विश्व स्तनपान सप्ताह 2026 के माध्यम से पूरे देश में स्वस्थ मातृत्व, स्वस्थ शिशु और स्वस्थ भारत का संदेश दिया जा रहा है।