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'राइट टू बी फॉरगॉटन' पर नया कानूनी संग्राम, Indian Kanoon पहुंचा दिल्ली हाईकोर्ट

क्या कोई व्यक्ति अपने पुराने कोर्ट केस को इंटरनेट पर हमेशा के लिए छिपा सकता है? या फिर अदालतों के फैसले हमेशा सार्वजनिक रिकॉर्ड बने रहने चाहिए? इन्हीं दो संवैधानिक सिद्धांतों—'निजता के अधिकार' और 'खुली न्याय व्यवस्था'—के बीच अब दिल्ली हाईकोर्ट में बड़ी कानूनी जंग छिड़ गई है। देश के सबसे बड़े लीगल डेटाबेस प्लेटफॉर्म Indian Kanoon ने 'राइट टू बी फॉरगॉटन' से जुड़े हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए दावा किया है कि इस आदेश के कारण उसे अब तक करीब 80 फैसलों को हटाना या नाम आधारित खोज से हटाना पड़ा है। अब 13 अगस्त को होने वाली सुनवाई पर पूरे कानूनी जगत की नजरें टिकी हैं।

Sonali06 अग. 2026, 03:02 PM IST
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'राइट टू बी फॉरगॉटन' पर नया कानूनी संग्राम, Indian Kanoon पहुंचा दिल्ली हाईकोर्ट

नई दिल्ली:

देश के सबसे बड़े ऑनलाइन लीगल डेटाबेस प्लेटफॉर्म 'इंडियन कानून' (Indian Kanoon) ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले को चुनौती दी है, जिसमें अदालत ने 'राइट टू बी फॉरगॉटन' (Right to be Forgotten) यानी 'भूले जाने के अधिकार' को निजता के मौलिक अधिकार का हिस्सा मानते हुए कुछ मामलों में नाम आधारित खोज (Name-Based Search) को बंद करने और रिकॉर्ड को डी-इंडेक्स (De-index) करने के निर्देश दिए थे। इंडियन कानून का कहना है कि इस आदेश के कारण उसे गंभीर व्यावहारिक और कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वेबसाइट के अनुसार अब तक करीब 80 न्यायिक फैसलों को हटाना या उनकी नाम आधारित खोज को निष्क्रिय करना पड़ा है। इस आदेश के खिलाफ दायर अपील पर दिल्ली हाईकोर्ट 13 अगस्त को सुनवाई करेगा।

क्या था दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला?

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने 29 मई 2026 को दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि 'राइट टू बी फॉरगॉटन' भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत मिलने वाले निजता के अधिकार (Right to Privacy) का अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने कहा कि जिन मामलों में व्यक्ति बरी हो चुका हो, डिस्चार्ज हो गया हो, एफआईआर रद्द हो चुकी हो, समझौता हो गया हो या मामला पूरी तरह निजी प्रकृति का हो, वहां संबंधित व्यक्ति अपने नाम को इंटरनेट सर्च से हटाने की मांग कर सकता है।

कोर्ट ने केवल इंडियन कानून ही नहीं बल्कि Google LLC, Google India और अन्य सर्च इंजन/इंटरमीडियरी को भी ऐसे मामलों में नाम आधारित खोज (Name-Based Search) से संबंधित रिकॉर्ड डी-इंडेक्स करने के निर्देश दिए थे। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया था कि फैसले हटाए नहीं जाएंगे। वे केस नंबर, सिटेशन, तारीख या अन्य कानूनी विवरण के आधार पर उपलब्ध रहेंगे, केवल व्यक्ति के नाम से सर्च करने पर दिखाई नहीं देंगे।

कोर्ट ने यह भी कहा था कि 'राइट टू बी फॉरगॉटन' हर मामले में स्वतः लागू नहीं होगा। प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर अदालत तय करेगी कि डी-इंडेक्सिंग उचित है या नहीं। इस दौरान अदालत को व्यक्ति के निजता के अधिकार और जनता के सूचना पाने के अधिकार के बीच संतुलन बनाना होगा।

इंडियन कानून की दलील क्या है?

इंडियन कानून ने अपनी अपील में कहा है कि एकल पीठ के आदेश से भारतीय न्याय व्यवस्था के मूल सिद्धांत 'ओपन जस्टिस' (Open Justice) पर असर पड़ रहा है। कंपनी का कहना है कि न्यायालयों के फैसले सार्वजनिक दस्तावेज होते हैं और नागरिकों, वकीलों, न्यायाधीशों, कानून के विद्यार्थियों, पत्रकारों तथा शोधकर्ताओं को उन तक आसान पहुंच मिलनी चाहिए। वेबसाइट का कहना है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने नाम से जुड़े फैसलों को हटाने या डी-इंडेक्स करने की मांग करेगा तो पूरा लीगल डेटाबेस प्रभावित हो जाएगा और कानूनी शोध (Legal Research) करना बेहद कठिन हो जाएगा।


वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने अदालत में कहा कि यह फैसला "गंभीर व्यावहारिक कठिनाइयां" पैदा कर रहा है। उन्होंने दलील दी कि वर्तमान में इसका सबसे अधिक असर केवल Indian Kanoon पर पड़ रहा है, जबकि अन्य कई लीगल वेबसाइट्स पर अभी भी नाम आधारित खोज की सुविधा उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि लगातार डी-इंडेक्सिंग के अनुरोध आने से वेबसाइट पर भारी प्रशासनिक बोझ बढ़ गया है। दातार ने अदालत से कहा कि यदि नाम आधारित खोज पूरी तरह समाप्त कर दी जाती है तो हजारों वकीलों, लॉ स्टूडेंट्स, शोधकर्ताओं और पत्रकारों के लिए न्यायिक फैसलों तक पहुंचना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि Indian Kanoon देश का सबसे बड़ा मुफ्त कानूनी डेटाबेस है, जिसका रोजाना बड़ी संख्या में लोग उपयोग करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला

अपील में इंडियन कानून ने कहा कि एकल पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक K.S. Puttaswamy बनाम Union of India फैसले की गलत व्याख्या की है। वेबसाइट का तर्क है कि उस फैसले में 'राइट टू बी फॉरगॉटन' पर की गई टिप्पणियां केवल Obiter Dicta (अनौपचारिक टिप्पणियां) हैं और वे स्वतः लागू होने वाला कानूनी अधिकार नहीं बनातीं।

कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट के K.S. Puttaswamy तथा Kaushal Kishor बनाम State of Uttar Pradesh मामलों का भी हवाला देते हुए कहा कि अभी तक भारत में 'राइट टू बी फॉरगॉटन' को लेकर कोई व्यापक वैधानिक कानून नहीं बनाया गया है।

80 फैसले हटाने पड़े

इंडियन कानून ने अदालत को बताया कि जून 2026 में आदेश आने के बाद अब तक करीब 80 न्यायिक फैसलों को वेबसाइट से हटाना पड़ा है या उनकी नाम आधारित खोज को निष्क्रिय करना पड़ा है। वेबसाइट का कहना है कि यह आदेश अब अन्य मामलों में भी मिसाल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है और लगातार ऐसे नए आवेदन आ रहे हैं।

कंपनी का कहना है कि यदि यही स्थिति जारी रही तो भविष्य में बड़ी संख्या में न्यायिक रिकॉर्ड आम लोगों और कानूनी समुदाय के लिए आसानी से खोज योग्य नहीं रहेंगे।

अन्य अपीलें भी लंबित

इंडियन कानून ने अदालत को बताया कि उसने इसी फैसले के खिलाफ कई अन्य अपीलें भी दाखिल की हैं। इन मामलों में अभी नोटिस जारी होना बाकी है और वे अक्टूबर में सूचीबद्ध हैं। फिलहाल मौजूदा अपील पर 13 अगस्त को सुनवाई होगी।

किस पीठ के सामने है मामला?

रिपोर्ट के अनुसार, इस अपील पर दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति सी. हरिशंकर और न्यायमूर्ति विनोद कुमार शामिल हैं, ने प्रारंभिक सुनवाई की और मामले को 13 अगस्त के लिए सूचीबद्ध किया है।

मामला क्यों है बेहद महत्वपूर्ण?

यह मामला केवल इंडियन कानून तक सीमित नहीं है। इसका असर भविष्य में Google, अन्य सर्च इंजन, SCC Online, Manupatra, डिजिटल लीगल डेटाबेस, ऑनलाइन न्यायिक अभिलेख (Digital Court Archives) और यहां तक कि अदालतों की आधिकारिक वेबसाइटों पर भी पड़ सकता है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भारत में "Digital Privacy बनाम Open Justice" की सबसे बड़ी कानूनी बहसों में से एक बन गया है। आने वाला फैसला यह तय कर सकता है कि किसी व्यक्ति के निजता और सम्मान के अधिकार तथा न्यायिक पारदर्शिता एवं जनता के सूचना पाने के अधिकार के बीच संतुलन किस प्रकार बनाया जाएगा।

यदि दिल्ली हाईकोर्ट इस मामले में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करता है, तो यह भविष्य में देशभर की अदालतों, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सर्च इंजन के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल साबित हो सकता है।