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15-16 साल सेवा, फिर भी नौकरी असुरक्षित! संविदा शिक्षकों पर हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार से मांगा जवाब
उत्तर प्रदेश में 15-16 वर्षों से कार्यरत संविदा शिक्षकों के नियमितीकरण का मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ पहुंच गया है। अदालत ने राज्य सरकार से पूछा है कि इतने लंबे समय तक सेवाएं लेने के बावजूद शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। कोर्ट ने शिक्षकों को "राष्ट्र निर्माता" बताते हुए सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। यह मामला प्रदेश के हजारों संविदा शिक्षकों की नौकरी, शिक्षा व्यवस्था और भविष्य की भर्ती नीति पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में वर्षों से संविदा पर कार्य कर रहे शिक्षकों के भविष्य को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने करीब 15 से 16 वर्षों से सेवा दे रहे संविदा शिक्षकों के नियमितीकरण के मामले में राज्य सरकार से जवाब तलब करते हुए पूछा है कि आखिर इतने लंबे समय तक सेवाएं लेने के बावजूद उनके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। अदालत ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (बेसिक शिक्षा) को निर्देश दिया है कि वह इस संबंध में विस्तृत जवाब दाखिल करें।
यह मामला केवल एक संविदा शिक्षिका का नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के हजारों ऐसे शिक्षकों की चिंता से जुड़ा है जो वर्षों से सरकारी विद्यालयों में पढ़ा रहे हैं, लेकिन आज भी उनकी नौकरी हर वर्ष अनुबंध नवीनीकरण पर निर्भर है। यही वजह है कि इस सुनवाई को प्रदेश की संविदा शिक्षक नीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मामला अमेठी जिले के कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय में वर्ष 2010 से कार्यरत एक संविदा शिक्षिका की याचिका से जुड़ा है। याचिका के अनुसार उन्होंने लगातार 16 वर्षों तक सेवाएं दीं, लेकिन विभाग ने उनके संविदा नवीनीकरण से इनकार कर दिया। शिक्षिका ने इसे अपने आजीविका के अधिकार, प्राकृतिक न्याय और समानता के सिद्धांतों के विपरीत बताते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। प्रारंभिक सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए सरकार से पूछा कि यदि किसी कर्मचारी से वर्षों तक लगातार सेवा ली जाती है तो उसके भविष्य को लेकर स्पष्ट नीति क्यों नहीं बनाई गई।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि,
"शिक्षक राष्ट्र निर्माता हैं। ऐसे कर्मचारियों के साथ राज्य का व्यवहार संवेदनशील और न्यायसंगत होना चाहिए।"
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि,
"यदि किसी शिक्षक से वर्षों तक लगातार सेवाएं ली जाती हैं तो राज्य को उसके भविष्य के संबंध में स्पष्ट नीति अपनानी चाहिए।"
हालांकि अदालत ने अभी नियमितीकरण का कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है, लेकिन सरकार से विस्तृत जवाब मांगते हुए संकेत दिया है कि इतने लंबे समय तक कार्यरत कर्मचारियों के मामले को केवल संविदा समाप्त कर देने तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब उत्तर प्रदेश में सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी, संविदा नियुक्तियों और नियमित भर्ती को लेकर लगातार बहस चल रही है। राज्य सरकार वर्षों से कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों, विशेष परियोजनाओं और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में संविदा व्यवस्था के माध्यम से शिक्षकों की नियुक्ति करती रही है। दूसरी ओर, हजारों शिक्षक लंबे समय से स्थायी सेवा की मांग कर रहे हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला केवल नियमितीकरण का नहीं बल्कि सरकार की रोजगार नीति की पारदर्शिता का भी है।
"लंबे समय तक किसी कर्मचारी से सेवा लेने के बाद राज्य की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह पारदर्शी और निष्पक्ष नीति अपनाए। हालांकि नियमितीकरण का अधिकार स्वतः नहीं बनता, लेकिन नीति स्पष्ट होनी चाहिए।"
पूर्व के अनेक न्यायिक निर्णयों में भी यह सिद्धांत सामने आया है कि सरकारी सेवाओं में नियमित नियुक्तियां संविधान और निर्धारित भर्ती प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए, लेकिन वर्षों तक सेवा देने वाले कर्मचारियों के साथ मनमाना व्यवहार भी न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध 'उमा देवी बनाम कर्नाटक राज्य' फैसले में भी नियमितीकरण के लिए वैधानिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक बताया गया था, वहीं सरकारों को दीर्घकालीन संविदा व्यवस्था पर भी संतुलित नीति बनाने की आवश्यकता बताई गई थी।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शिक्षकों का भविष्य लगातार असुरक्षित रहेगा तो इसका सीधा असर विद्यालयों में पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ेगा। एक शिक्षा विशेषज्ञ के अनुसार, "शिक्षक केवल कर्मचारी नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं। यदि उनका भविष्य असुरक्षित रहेगा तो इसका असर सीधे विद्यार्थियों की शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ेगा।"
शिक्षक संगठनों का भी लंबे समय से कहना रहा है कि जो शिक्षक एक दशक से अधिक समय से विद्यालयों में सेवाएं दे रहे हैं, उनके भविष्य को अनिश्चित छोड़ना शिक्षा व्यवस्था के हित में नहीं है। उनका तर्क है कि वर्षों से एक ही विद्यालय में कार्यरत शिक्षक स्थानीय समुदाय, विद्यार्थियों और विद्यालय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।
इस पूरे मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह केवल एक शिक्षिका के अनुबंध का विवाद नहीं है। यदि हाईकोर्ट भविष्य में सरकार से संतोषजनक जवाब नहीं पाता या कोई व्यापक निर्देश जारी करता है तो इसका प्रभाव प्रदेश के हजारों संविदा शिक्षक, गेस्ट टीचर, अनुदेशक और अन्य अनुबंध आधारित कर्मचारियों पर भी पड़ सकता है। सरकार को संविदा कर्मचारियों के लिए अधिक स्पष्ट और दीर्घकालिक नीति बनाने पर विचार करना पड़ सकता है। यदि भविष्य में नियमितीकरण या सेवा सुरक्षा को लेकर कोई नीति बनती है तो इससे शिक्षकों को नौकरी की स्थिरता मिलेगी, विद्यालयों में शिक्षकों का बार-बार बदलाव कम होगा, छात्रों की पढ़ाई में निरंतरता आएगी और सरकारी शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही भी बढ़ सकती है। हालांकि इसके साथ सरकार पर वेतन, सेवा लाभ और वित्तीय दायित्व का अतिरिक्त बोझ भी बढ़ेगा, इसलिए किसी भी निर्णय में संवैधानिक प्रावधानों, भर्ती नियमों और प्रशासनिक संतुलन को ध्यान में रखना होगा।
फिलहाल हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है। अब सभी की नजर अगली सुनवाई पर है, क्योंकि यह मामला केवल एक शिक्षिका के रोजगार का नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की संविदा शिक्षक नीति, सरकारी रोजगार व्यवस्था और हजारों शिक्षकों के भविष्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कानूनी परीक्षण बन चुका है।
