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आरबीआई का बड़ा बैंकिंग सुधार: अब बैंक और एनबीएफसी नहीं तय कर पाएंगे मनमाने ब्याज, सभी के लिए बनेगा एक समान नियम
RBI सभी बैंकों, NBFC और अन्य वित्तीय संस्थानों के लिए ब्याज दर निर्धारण का एक समान ढांचा लाने की तैयारी कर रहा है। इससे ऋण की वास्तविक लागत स्पष्ट होगी, ग्राहकों को विभिन्न संस्थानों की तुलना करने में आसानी होगी और बैंकिंग क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ेगी। साथ ही RBI ने 22 साल बाद नए शहरी सहकारी बैंकों को लाइसेंस देने का रास्ता भी खोला है।

नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) देश के बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में एक बड़ा सुधार लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। केंद्रीय बैंक ऐसा नया नियामकीय ढांचा तैयार कर रहा है, जिसके तहत बैंक, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (NBFC), सहकारी बैंक और अन्य विनियमित वित्तीय संस्थान ऋण पर ब्याज दर तय करने के लिए अलग-अलग नियमों का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे। इसका उद्देश्य पूरे बैंकिंग सिस्टम में पारदर्शिता बढ़ाना, ग्राहकों के लिए ऋण की वास्तविक लागत को समझना आसान बनाना और विभिन्न संस्थानों के बीच निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना है।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के बाद कहा कि मौजूदा व्यवस्था में अलग-अलग संस्थान अलग-अलग मानकों पर ब्याज दरें तय करते हैं। इससे ग्राहकों के लिए यह समझना कठिन हो जाता है कि किस बैंक या वित्तीय संस्था से लिया गया ऋण वास्तव में सस्ता है। इसी समस्या को दूर करने के लिए आरबीआई ब्याज दर निर्धारण से जुड़े नियमों का मानकीकरण (Harmonisation) करने की तैयारी कर रहा है।
वर्तमान में अनुसूचित बैंक मुख्य रूप से एमसीएलआर (Marginal Cost of Funds Based Lending Rate) और एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR) जैसे मॉडल अपनाते हैं, जबकि एनबीएफसी और अन्य वित्तीय संस्थानों की अपनी अलग आंतरिक प्रणालियां होती हैं। इसके कारण समान प्रकार के ऋण पर अलग-अलग ब्याज दरें, रीसेट अवधि और गणना पद्धति देखने को मिलती है। आरबीआई अब इन प्रक्रियाओं को अधिक एकरूप और पारदर्शी बनाना चाहता है। प्रस्तावित ढांचे में ब्याज दर की गणना, फ्लोटिंग रेट लोन की रीसेट अवधि, डे-काउंट कन्वेंशन (Day Count Convention) और ग्राहकों को ब्याज दर की जानकारी देने के तरीके को समान बनाया जा सकता है। इससे ऋण लेने वाले व्यक्ति किसी भी बैंक या एनबीएफसी की शर्तों की आसानी से तुलना कर सकेंगे और बेहतर विकल्प चुन पाएंगे।
इस कदम का सबसे बड़ा लाभ करोड़ों खुदरा ग्राहकों, गृह ऋण, वाहन ऋण, शिक्षा ऋण और एमएसएमई क्षेत्र के उधारकर्ताओं को मिलने की संभावना है। अभी तक कई ग्राहक केवल घोषित ब्याज दर देखकर ऋण लेते हैं, लेकिन बाद में रीसेट अवधि, अतिरिक्त शुल्क या अलग गणना पद्धति के कारण उनकी वास्तविक लागत बढ़ जाती है। नई व्यवस्था लागू होने पर ऐसी अस्पष्टता काफी हद तक समाप्त हो सकती है। आरबीआई ने यह भी स्पष्ट किया है कि फिलहाल यूपीआई लेनदेन पर ग्राहकों से कोई अतिरिक्त शुल्क वसूलने का प्रस्ताव नहीं है। हालांकि डिजिटल भुगतान प्रणाली के संचालन और उसकी लागत को लेकर सरकार तथा संबंधित पक्षों के बीच चर्चा जारी है। केंद्रीय बैंक ने संकेत दिया है कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए भविष्य में अलग नीति बनाई जा सकती है, लेकिन आम उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालने का कोई तत्काल निर्णय नहीं लिया गया है।
मौद्रिक नीति के दौरान आरबीआई ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर भी सकारात्मक संकेत दिए। केंद्रीय बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर का अनुमान 6.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया है। वहीं खुदरा महंगाई (CPI Inflation) के अनुमान को पहले के मुकाबले घटाया गया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि आर्थिक वृद्धि और महंगाई के बीच संतुलन बनाने की दिशा में सुधार हो रहा है।
इसी बैठक में आरबीआई ने लगभग 22 वर्षों बाद नए शहरी सहकारी बैंकों (Urban Cooperative Banks) को लाइसेंस देने की प्रक्रिया फिर शुरू करने की घोषणा भी की। अब 'ऑन-टैप लाइसेंसिंग' व्यवस्था लागू होगी, जिसके तहत पात्र संस्थाएं वर्ष के किसी भी समय आवेदन कर सकेंगी। लाइसेंस प्राप्त करने के लिए न्यूनतम 300 करोड़ रुपये की पूंजी सहित कई नियामकीय मानदंड पूरे करने होंगे। इससे छोटे शहरों और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं का विस्तार होने की उम्मीद है।
यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि भारत में बैंक ऋण लेने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। एक समान ब्याज निर्धारण प्रणाली लागू होने से ग्राहकों को ऋण की वास्तविक लागत समझने में आसानी होगी, बैंकिंग क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ेगी, छिपे हुए शुल्क और जटिल शर्तों पर नियंत्रण लगेगा तथा विभिन्न वित्तीय संस्थानों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही उपभोक्ता अधिकार भी पहले की तुलना में अधिक मजबूत होंगे। यदि आरबीआई का यह मसौदा अंतिम रूप लेकर लागू होता है, तो यह भारतीय बैंकिंग प्रणाली में उपभोक्ता हितों को मजबूत करने वाले सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में शामिल होगा। इससे न केवल ऋण प्रक्रिया अधिक सरल और पारदर्शी बनेगी, बल्कि देश के वित्तीय तंत्र में लोगों का भरोसा भी और अधिक मजबूत होगा।
