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श्रवण कुमार बने पोते, कांवड़ में बैठाकर दादी को करा रहे यात्रा l
सावन के पवित्र महीने में दिल्ली से एक बेहद भावुक और प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है, जिसने लोगों के दिलों को छू लिया है। पूर्वी दिल्ली के दो पोते अपनी 75 वर्षीय दादी को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से पैदल यात्रा करा रहे हैं। दादी की वर्षों पुरानी इच्छा को पूरा करने के लिए दोनों युवकों ने ‘श्रवण कुमार’ जैसी मिसाल पेश की है। इस अनोखी कांवड़ यात्रा में जहां एक तरफ गंगाजल रखा गया है, वहीं दूसरी तरफ दादी को आराम से बैठाने की व्यवस्था की गई है। रास्ते भर लोग इस दृश्य को देखकर भावुक हो रहे हैं और पोतों की सेवा भावना की जमकर सराहना कर रहे हैं। यह यात्रा न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि पारिवारिक संस्कार, सम्मान और समर्पण की भी एक मिसाल बन गई है।

राजधानी दिल्ली में सावन के महीने के दौरान एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने समाज में रिश्तों और संस्कारों की अहमियत को फिर से जीवंत कर दिया है। पूर्वी दिल्ली के रहने वाले दो युवकों ने अपनी 75 वर्षीय दादी की इच्छा को पूरा करने के लिए जो कदम उठाया, वह आज हर किसी के लिए प्रेरणा बन गया है। बताया जा रहा है कि दादी लंबे समय से हरिद्वार से कांवड़ यात्रा करने की इच्छा रखती थीं। लेकिन बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण उनके लिए यह संभव नहीं हो पा रहा था। ऐसे में परिवार ने उनकी इस भावना को समझा और उनके पोतों ने यह जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाने का निर्णय लिया।
दोनों पोतों ने एक विशेष कांवड़ तैयार की, जिसमें एक तरफ गंगाजल रखने की व्यवस्था की गई और दूसरी तरफ दादी के बैठने के लिए सुरक्षित और आरामदायक स्थान बनाया गया। इस कांवड़ को संतुलित रखने के लिए विशेष ध्यान दिया गया, ताकि यात्रा के दौरान किसी तरह की परेशानी न हो। इसके बाद दोनों युवक बारी-बारी से अपने कंधों पर कांवड़ उठाकर हरिद्वार से यात्रा कर रहे हैं। यह दृश्य लोगों को सीधे तौर पर पौराणिक कथा ‘श्रवण कुमार’ की याद दिलाता है, जिन्होंने अपने माता-पिता को कंधों पर बैठाकर तीर्थ यात्रा कराई थी।
यात्रा के दौरान जहां-जहां से ये गुजरते हैं, लोग रुककर इस दृश्य को देखते हैं और उनकी सेवा भावना को नमन करते हैं। कई स्थानों पर लोग उन्हें पानी, भोजन और अन्य आवश्यक सुविधाएं भी उपलब्ध करा रहे हैं। यह यात्रा धीरे-धीरे लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई है और सोशल मीडिया पर भी इसकी खूब सराहना हो रही है। दादी भी अपने पोतों के इस समर्पण से बेहद भावुक हैं। वह लगातार अपने पोतों को आशीर्वाद दे रही हैं और कहती हैं कि उनकी यह इच्छा पूरी होना उनके जीवन का सबसे बड़ा सुख है। परिवार के अन्य सदस्य भी इस यात्रा में सहयोग कर रहे हैं और इसे एक धार्मिक ही नहीं, बल्कि भावनात्मक यात्रा मान रहे हैं।
परिवार का कहना है कि आज के समय में जब लोग अपनी व्यस्त जिंदगी में बुजुर्गों के लिए समय नहीं निकाल पाते, ऐसे में यह कदम एक संदेश देता है कि माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा सबसे बड़ा धर्म है।
यह यात्रा पिछले कई दिनों से जारी है और अब यह न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक बन चुकी है, बल्कि समाज के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण भी बन गई है। यह घटना दिखाती है कि आधुनिक समय में भी पारिवारिक मूल्य, सम्मान और सेवा भावना जीवित है और लोगों के दिलों में गहराई से बसती है। कुल मिलाकर, यह कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक भावनात्मक कहानी है, जो हर किसी को अपने परिवार और रिश्तों के प्रति सोचने पर मजबूर कर देती है।
