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2050 तक भारत में 34.7 करोड़ होंगे बुजुर्ग, एकल परिवारों के बढ़ते चलन से देखभाल बनी बड़ी चुनौती: नीति आयोग
भारत तेजी से वृद्ध होती आबादी वाले देशों की श्रेणी में शामिल होता जा रहा है। आने वाले वर्षों में देश की सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य व्यवस्था पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए नीति आयोग ने बुधवार को "विकसित भारत @2047 में देखभाल करने वालों को सशक्त बनाने की रणनीतियां" शीर्षक से एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2050 तक भारत में बुजुर्गों की संख्या बढ़कर लगभग 34.7 करोड़ हो जाएगी। इतनी बड़ी आबादी की देखभाल के लिए मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी, इसलिए देश में देखभाल प्रणाली को पूरी तरह नए सिरे से विकसित करने की आवश्यकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लंबे समय से बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और दिव्यांगों की देखभाल मुख्य रूप से परिवार के सदस्य ही करते रहे हैं। संयुक्त परिवारों की परंपरा के कारण घर में ही बुजुर्गों की सेवा-सुश्रुषा की व्यवस्था उपलब्ध रहती थी। लेकिन बदलती सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों ने इस व्यवस्था को प्रभावित किया है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, रोजगार के लिए युवाओं का दूसरे शहरों या विदेशों में पलायन, महिलाओं की बढ़ती कार्यबल भागीदारी और संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों का बढ़ता चलन पारिवारिक देखभालकर्ताओं की संख्या लगातार कम कर रहा है।
नीति आयोग का कहना है कि यदि समय रहते इस चुनौती का समाधान नहीं किया गया तो आने वाले दशकों में लाखों बुजुर्गों को आवश्यक देखभाल और सहायता उपलब्ध कराना कठिन हो जाएगा। इसलिए देखभाल को केवल पारिवारिक जिम्मेदारी मानने के बजाय इसे सार्वजनिक नीति और सामाजिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
देखभाल को मिले पेशे की पहचान
रिपोर्ट में "परिचर्या पर राष्ट्रीय नीति" लागू करने की सिफारिश की गई है। आयोग का मानना है कि केयरगिविंग यानी देखभाल को एक मान्यता प्राप्त, कौशल-आधारित और सम्मानजनक पेशे का दर्जा दिया जाना चाहिए। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षण, प्रमाणन, कौशल विकास और रोजगार की स्पष्ट व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि प्रशिक्षित केयरगिवर्स तैयार किए जाएं, जिन्हें बुजुर्गों, गंभीर मरीजों और दिव्यांग व्यक्तियों की देखभाल का वैज्ञानिक प्रशिक्षण मिले। इससे न केवल सेवा की गुणवत्ता बेहतर होगी बल्कि लाखों युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
हर 10 में से एक भारतीय निभा रहा देखभालकर्ता की भूमिका
इंटरनेशनल अलायंस ऑफ कैरर ऑर्गेनाइजेशन्स के आंकड़ों के अनुसार भारत की लगभग 10 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में पारिवारिक देखभालकर्ता की भूमिका निभाती है। इनमें अधिकांश लोग बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के अपने माता-पिता, दादा-दादी, बीमार परिजनों या दिव्यांग सदस्यों की देखभाल करते हैं। ऐसे देखभालकर्ताओं को अक्सर शारीरिक, मानसिक और आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ता है। कई लोगों को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है या कार्य के घंटे कम करने पड़ते हैं, जिससे उनकी आय भी प्रभावित होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन देखभालकर्ताओं को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और मानसिक स्वास्थ्य सहयोग उपलब्ध कराया जाए तो उनकी भूमिका अधिक प्रभावी हो सकती है।
बदलती पारिवारिक संरचना बनी चुनौती
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की पारिवारिक संरचना तेजी से बदल रही है। पहले जहां संयुक्त परिवारों में बुजुर्गों की देखभाल कई सदस्य मिलकर करते थे, वहीं अब अधिकांश परिवार छोटे होते जा रहे हैं। कामकाजी दंपति, महानगरों में नौकरी, अलग-अलग शहरों में रहने वाले बच्चे और सीमित पारिवारिक सहयोग के कारण बुजुर्गों की नियमित देखभाल मुश्किल होती जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों की संख्या भी बढ़ेगी। इससे स्वास्थ्य सेवाओं, घरेलू सहायता, सामुदायिक देखभाल केंद्रों और प्रशिक्षित केयरगिवर्स की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
महिलाओं पर सबसे अधिक जिम्मेदारी
रिपोर्ट यह भी बताती है कि पारिवारिक देखभाल की जिम्मेदारी आज भी मुख्य रूप से महिलाओं पर ही रहती है। हालांकि शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के कारण उनके लिए परिवार और करियर के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। ऐसे में देखभाल सेवाओं का संस्थागत और पेशेवर विस्तार महिलाओं पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ को भी कम कर सकता है।
रोजगार और अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा लाभ
नीति आयोग का मानना है कि यदि देखभाल क्षेत्र को औपचारिक रूप दिया जाता है तो यह केवल सामाजिक आवश्यकता पूरी नहीं करेगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगा। प्रशिक्षित केयरगिवर्स, होम हेल्थकेयर सेवाएं, डे-केयर सेंटर, जेरियाट्रिक केयर, पुनर्वास सेवाएं और सहायक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार से लाखों नए रोजगार सृजित हो सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत को अभी से केयर इकोनॉमी को विकसित करने पर निवेश करना होगा ताकि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य के अनुरूप बुजुर्गों, दिव्यांगों और जरूरतमंद लोगों को सम्मानजनक, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण देखभाल उपलब्ध कराई जा सके।
भविष्य की तैयारी पर जोर
नीति आयोग ने केंद्र और राज्य सरकारों, निजी क्षेत्र, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों से मिलकर एक समग्र देखभाल तंत्र विकसित करने का आह्वान किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की वृद्ध होती आबादी को देखते हुए स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा, बीमा, कौशल विकास और सामुदायिक सहयोग को एकीकृत करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि अभी से प्रशिक्षित मानव संसाधन, मजबूत नीतियां और आधुनिक देखभाल सेवाएं विकसित नहीं की गईं, तो आने वाले वर्षों में बढ़ती बुजुर्ग आबादी देश की स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा प्रणाली पर भारी दबाव डाल सकती है।
