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15% ब्याज के आदेश की अनदेखी पर हाईकोर्ट सख्त, 12% पर रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करने को माना प्रथमदृष्टया अवमानना

उत्तर प्रदेश के लाखों गन्ना किसानों के बकाया भुगतान से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार और गन्ना विभाग के अधिकारियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने अपने स्पष्ट न्यायिक आदेश के बावजूद किसानों के बकाया भुगतान पर 15 प्रतिशत ब्याज के स्थान पर 12 प्रतिशत ब्याज की दर से रिकवरी सर्टिफिकेट जारी किए जाने को प्रथमदृष्टया न्यायालय की अवमानना माना है। न्यायालय ने संकेत दिए हैं कि यदि जांच में आदेशों की जानबूझकर अनदेखी सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई भी हो सकती है।

Vindhya Dubey06 अग. 2026, 06:37 PM IST
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15% ब्याज के आदेश की अनदेखी पर हाईकोर्ट सख्त, 12% पर रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करने को माना प्रथमदृष्टया अवमानना

न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने यह आदेश वर्ष 2006 से लंबित किसान नेता वी.एम. सिंह की याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया। यह मामला प्रदेश के गन्ना किसानों को चीनी मिलों से समय पर भुगतान न मिलने और विलंब होने पर ब्याज दिलाने से संबंधित है।

क्या है पूरा मामला?

उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों को अपनी फसल का भुगतान निर्धारित समय सीमा के भीतर किया जाना होता है। यदि चीनी मिलें समय पर भुगतान नहीं करती हैं, तो किसानों को देरी की अवधि के लिए ब्याज देने का भी प्रावधान है। इस मुद्दे को लेकर किसान नेता वी.एम. सिंह ने वर्ष 2006 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। लंबी सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 23 दिसंबर 2021 को अपने फैसले में स्पष्ट निर्देश दिया था कि किसानों के बकाया भुगतान पर 15 प्रतिशत ब्याज की दर से रिकवरी सुनिश्चित की जाए। लेकिन अदालत के सामने यह तथ्य आया कि विभाग ने इस आदेश का पूर्ण पालन नहीं किया और कई मामलों में केवल 12 प्रतिशत ब्याज के आधार पर रिकवरी सर्टिफिकेट जारी कर दिए।

अदालत ने जताई कड़ी नाराजगी

सुनवाई के दौरान जब यह तथ्य सामने आया कि न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बावजूद कम ब्याज दर पर रिकवरी सर्टिफिकेट जारी किए गए, तो खंडपीठ ने इसे अत्यंत गंभीर माना। अदालत ने कहा कि प्रथमदृष्टया यह न्यायालय के आदेश की अवमानना का मामला प्रतीत होता है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सरकारी अधिकारी अदालत के आदेशों का पालन नहीं करते हैं, तो इसे केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है।

सभी गन्ना आयुक्तों का रिकॉर्ड तलब

हाईकोर्ट ने 2 दिसंबर 2021 के बाद से अब तक पद पर रहे सभी गन्ना आयुक्तों के नाम, कार्यकाल और उनकी भूमिका का पूरा विवरण मांगा है। अदालत यह जानना चाहती है कि न्यायालय के आदेश के बाद भी 15 प्रतिशत के बजाय 12 प्रतिशत ब्याज लागू करने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया, इसके लिए किस अधिकारी ने अनुमति दी और इसकी जिम्मेदारी किसकी है।

किसानों को कितना नुकसान हुआ, होगी जांच

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में यह भी जांच की जाएगी कि कम ब्याज दर लागू करने से आखिर किसे लाभ हुआ। अदालत यह पता लगाएगी कि क्या इस फैसले से चीनी मिलों को अनुचित आर्थिक फायदा मिला और दूसरी ओर गन्ना किसानों को कितनी वित्तीय हानि उठानी पड़ी। यदि यह पाया जाता है कि किसानों को कम ब्याज देकर उनका वैधानिक अधिकार प्रभावित हुआ है, तो उसकी भरपाई सुनिश्चित करने के लिए भी आवश्यक निर्देश दिए जा सकते हैं।

गन्ना आयुक्त ने स्वीकार किया तथ्य

सुनवाई के दौरान गन्ना आयुक्त ने अदालत के समक्ष स्वीकार किया कि विभाग द्वारा 12 प्रतिशत ब्याज की दर से रिकवरी सर्टिफिकेट जारी किए गए थे। हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि 30 जुलाई 2026 को संशोधित आदेश जारी कर दिए गए हैं, जिनमें अदालत के निर्देशानुसार 15 प्रतिशत ब्याज लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। लेकिन अदालत ने इस स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना और कहा कि केवल आदेश जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। जब तक किसानों को वास्तविक रूप से 15 प्रतिशत ब्याज के साथ पूरा भुगतान नहीं मिल जाता, तब तक आदेश का अनुपालन अधूरा माना जाएगा।

अगली सुनवाई तक मांगी विस्तृत रिपोर्ट

खंडपीठ ने गन्ना विभाग को निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई से पहले विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट दाखिल की जाए। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया जाए कि—

  • कितने रिकवरी सर्टिफिकेट संशोधित किए गए।
  • कितने मामलों में 15 प्रतिशत ब्याज लागू किया गया।
  • किसानों को अतिरिक्त भुगतान की कुल राशि कितनी है।
  • कितनी वसूली चीनी मिलों से की जा चुकी है।
  • किन अधिकारियों की भूमिका की जांच की जा रही है।
  • आदेश के पूर्ण अनुपालन की वर्तमान स्थिति क्या है।

किसानों के अधिकारों से जुड़ा अहम फैसला

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल ब्याज की दर का विवाद नहीं है, बल्कि न्यायालय के आदेशों के पालन और किसानों के वैधानिक अधिकारों की रक्षा से जुड़ा हुआ है। गन्ना किसानों को समय पर भुगतान न मिलने से उनकी खेती, अगली फसल की तैयारी, बैंक ऋण चुकाने की क्षमता और पारिवारिक आर्थिक स्थिति पर सीधा असर पड़ता है। ऐसे में ब्याज का भुगतान केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि किसानों के आर्थिक नुकसान की आंशिक भरपाई का माध्यम भी है।

प्रशासनिक जवाबदेही का भी बड़ा संदेश

हाईकोर्ट की ताजा टिप्पणी को प्रशासनिक जवाबदेही के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि अदालत यह पाती है कि उसके आदेशों की जानबूझकर अनदेखी की गई, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही के साथ-साथ अन्य प्रशासनिक कार्रवाई का रास्ता भी खुल सकता है। यह फैसला भविष्य में सरकारी विभागों द्वारा न्यायालय के आदेशों के समयबद्ध और पूर्ण अनुपालन को लेकर भी एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है।