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विदेशी चंदे पर सरकार की सख्ती, आज लोकसभा में आ सकता है FCRA Amendment Bill 2026
केंद्र सरकार संसद के मानसून सत्र में एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 पेश कर सकती है। प्रस्तावित कानून विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले एनजीओ, ट्रस्ट और धार्मिक संस्थाओं के लिए अधिक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था लागू करने पर केंद्रित है। संभावना है कि इस पर लोकसभा में होने वाली चर्चा का जवाब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह स्वयं देंगे। यह विधेयक विदेशी फंडिंग के नियमन और नागरिक समाज की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण बहस का केंद्र बन सकता है।

नई दिल्ली: केंद्र सरकार विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act-FCRA) में व्यापक संशोधन करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। सरकार आज संसद में विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Amendment Bill 2026) पेश कर सकती है। संसदीय सूत्रों के अनुसार इस विधेयक पर लोकसभा में चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह स्वयं सरकार का पक्ष रख सकते हैं। इसे सरकार की उन प्रमुख विधायी पहलों में शामिल माना जा रहा है, जिनका उद्देश्य विदेशी चंदा प्राप्त करने वाली संस्थाओं की कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावी बनाना है।
यह विधेयक पहली बार बजट सत्र के दौरान पेश किया गया था, लेकिन संसद में लगातार जारी गतिरोध के कारण इस पर चर्चा नहीं हो सकी। अब मानसून सत्र में सरकार इसे प्राथमिकता के आधार पर पारित कराने की कोशिश कर रही है। संसदीय कार्य मंत्रालय और सरकार के वरिष्ठ नेताओं द्वारा विपक्ष के साथ संवाद के बाद इस विधेयक पर चर्चा की संभावना बढ़ गई है।
क्या हैं प्रस्तावित संशोधन?
प्रस्तावित संशोधन के तहत सरकार विदेशी फंडिंग से जुड़े नियमों को अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित बनाना चाहती है। सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव एक "डिज़िग्नेटेड अथॉरिटी" (नामित प्राधिकरण) के गठन का है। यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण रद्द, निलंबित या समाप्त हो जाता है, तो यही प्राधिकरण उस संस्था की विदेशी निधि और उससे निर्मित परिसंपत्तियों का प्रबंधन करेगा।
वर्तमान कानून में ऐसी स्थिति में परिसंपत्तियों और विदेशी फंड के प्रबंधन को लेकर स्पष्ट व्यवस्था नहीं है, जिसके कारण कई मामलों में कानूनी और प्रशासनिक विवाद सामने आते रहे हैं। सरकार का दावा है कि नया संशोधन इस कमी को दूर करेगा और पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाएगा। इसके अलावा विधेयक में विदेशी अंशदान प्राप्त करने की पूर्व अनुमति (Prior Permission), पंजीकरण के नवीनीकरण, निलंबन, रद्दीकरण, रिकॉर्ड रखने की प्रक्रिया और अनुपालन (Compliance) से जुड़े कई प्रावधानों को भी स्पष्ट करने का प्रस्ताव है।
सरकार का पक्ष
गृह मंत्रालय का कहना है कि एफसीआरए कानून का उद्देश्य विदेशी सहायता प्राप्त करने वाली संस्थाओं के कामकाज को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विदेश से मिलने वाले धन का उपयोग उसी उद्देश्य के लिए किया जाए, जिसके लिए अनुमति दी गई है।
सरकार का तर्क है कि संशोधन लागू होने के बाद फर्जी संस्थाओं के माध्यम से विदेशी धन के दुरुपयोग, मनी लॉन्ड्रिंग, अवैध वित्तीय गतिविधियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संभावित खतरों पर अधिक प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा। इसके साथ ही निगरानी प्रणाली अधिक डिजिटल और जवाबदेह बनाई जाएगी।
क्यों हो रहा है विरोध?
प्रस्तावित संशोधन को लेकर कई गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी दलों ने चिंता भी जताई है। उनका कहना है कि यदि कानून में अत्यधिक नियंत्रणकारी प्रावधान शामिल किए गए तो इससे सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक और विकास क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं के स्वतंत्र कार्य पर असर पड़ सकता है।
कुछ संगठनों का तर्क है कि पारदर्शिता आवश्यक है, लेकिन उसके नाम पर नागरिक समाज की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता प्रभावित नहीं होनी चाहिए। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि यह कानून किसी संस्था को निशाना बनाने के लिए नहीं बल्कि सभी संस्थाओं के लिए समान और पारदर्शी व्यवस्था लागू करने के उद्देश्य से लाया जा रहा है।
अमित शाह कर सकते हैं जवाब
संसदीय सूत्रों के अनुसार यदि विधेयक आज लोकसभा में चर्चा के लिए आता है तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह स्वयं सदन में सरकार का पक्ष रख सकते हैं। माना जा रहा है कि विपक्ष द्वारा उठाए जाने वाले सवालों का विस्तृत जवाब भी गृह मंत्री देंगे।
हाल के दिनों में अमित शाह ने विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर उनकी चिंताओं को भी सुना था। सरकार का कहना है कि सभी सुझावों पर विचार किया गया है और कानून का उद्देश्य केवल पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है।
क्या है एफसीआरए?
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) भारत में विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन और सहायता को नियंत्रित करने वाला प्रमुख कानून है। इसके तहत कोई भी गैर-सरकारी संगठन, ट्रस्ट, धार्मिक संस्था, शैक्षणिक संगठन या अन्य पात्र संस्था विदेश से आर्थिक सहायता प्राप्त करने के लिए गृह मंत्रालय से पंजीकरण या पूर्व अनुमति प्राप्त करती है। यह कानून सुनिश्चित करता है कि विदेशी धन का उपयोग राष्ट्रीय हित और स्वीकृत उद्देश्यों के अनुरूप ही किया जाए।
क्यों महत्वपूर्ण है यह विधेयक?
देश में हजारों गैर-सरकारी संगठन और सामाजिक संस्थाएं विदेशी अनुदान के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, बाल कल्याण, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में कार्य करती हैं। ऐसे में एफसीआरए कानून में कोई भी संशोधन सीधे तौर पर इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली को प्रभावित करेगा। यदि यह विधेयक पारित होता है तो विदेशी फंडिंग से जुड़े अनुपालन नियम अधिक सख्त और स्पष्ट होंगे। इससे वित्तीय पारदर्शिता और निगरानी मजबूत होने की संभावना है, लेकिन साथ ही नागरिक समाज और सरकार के बीच विदेशी फंडिंग को लेकर बहस भी तेज हो सकती है। इसलिए इस विधेयक पर संसद में होने वाली चर्चा को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रमुख पक्ष
गृह मंत्रालय का रुख:
सरकार का कहना है कि संशोधन का उद्देश्य विदेशी चंदे की निगरानी मजबूत करना, पारदर्शिता बढ़ाना और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है।
विपक्ष और नागरिक संगठनों का रुख:
विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि कानून में पारदर्शिता के साथ-साथ वैध सामाजिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और कार्य करने के अधिकार का भी पूरा संरक्षण होना चाहिए।
