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FCRA Amendment 2026: क्या चर्च, एनजीओ और धार्मिक संस्थाओं पर बढ़ेगा सरकारी नियंत्रण?
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधन और 2026 के नए नियमों को लेकर देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। सरकार का कहना है कि बदलावों का उद्देश्य विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता, जवाबदेही और बेहतर निगरानी सुनिश्चित करना है, जबकि विपक्ष का आरोप है कि इससे केंद्र सरकार की शक्तियां बढ़ेंगी और कुछ धार्मिक व अल्पसंख्यक संस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं। संसद में विचाराधीन संशोधन विधेयक और लागू हो चुके नए नियमों के बीच यह मुद्दा अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है।

नई दिल्ली: विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी एफसीआरए (Foreign Contribution Regulation Act) में प्रस्तावित संशोधन एक बार फिर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। संसद में विचाराधीन एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 और 22 जून 2026 से लागू किए गए नए एफसीआरए नियमों को लेकर राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और विदेशी पर्यवेक्षकों के बीच अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
सरकार का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य विदेशी फंडिंग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावी बनाना है। दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि इससे केंद्र सरकार की शक्तियां बढ़ेंगी और धार्मिक एवं अल्पसंख्यक संस्थाओं पर अतिरिक्त नियंत्रण स्थापित हो सकता है। हाल ही में अमेरिका के कुछ सांसदों की टिप्पणियों के बाद यह मुद्दा भारत की सीमाओं से बाहर भी चर्चा का विषय बन गया है।
एफसीआरए क्या है और इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
एफसीआरए यानी विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम भारत में विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन को नियंत्रित करने वाला प्रमुख कानून है। इस कानून के तहत यह तय किया जाता है कि कौन-सी संस्था, ट्रस्ट, गैर-सरकारी संगठन (NGO), शैक्षणिक संस्थान, धार्मिक संगठन या व्यक्ति विदेश से आर्थिक सहायता प्राप्त कर सकता है और उस धन का उपयोग किन उद्देश्यों के लिए किया जाएगा। इस कानून का मूल उद्देश्य विदेशी धन के जरिए भारत की संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक संस्थाओं, चुनावी प्रक्रिया और सार्वजनिक व्यवस्था पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, यह सुनिश्चित करना है। एफसीआरए का संचालन केंद्रीय गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) करता है।
एफसीआरए का इतिहास
भारत में पहली बार एफसीआरए वर्ष 1976 में लागू किया गया था। इसके बाद बदलती परिस्थितियों और विदेशी फंडिंग के बढ़ते दायरे को देखते हुए 2010 में नया एफसीआरए कानून बनाया गया। इसके बाद 2016, 2018 और 2020 में कई महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। वर्ष 2026 में सरकार एक नया संशोधन विधेयक लेकर आई है, जबकि एफसीआरए नियम, 2026 पहले ही अधिसूचित होकर लागू किए जा चुके हैं।
वर्तमान में एफसीआरए के तहत क्या व्यवस्था है?
विदेशी फंड प्राप्त करने के लिए किसी भी संस्था को एफसीआरए पंजीकरण या पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होता है। विदेशी धन सबसे पहले भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की नई दिल्ली मुख्य शाखा में निर्धारित एफसीआरए खाते में जमा होता है। इसके बाद संस्था आवश्यकता के अनुसार अधिकृत खातों में राशि स्थानांतरित कर सकती है।
हर वर्ष संस्था को विदेशी दानदाताओं का विवरण, ऑडिट रिपोर्ट, परियोजना-वार खर्च और विदेशी धन के उपयोग का पूरा ब्यौरा गृह मंत्रालय को देना होता है। एफसीआरए पंजीकरण पांच वर्षों के लिए वैध रहता है, जिसके बाद उसका नवीनीकरण आवश्यक होता है।
इसके अलावा सांसद, विधायक, चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार, सरकारी कर्मचारी, न्यायाधीश और कुछ अन्य श्रेणियों के व्यक्तियों को विदेशी अंशदान स्वीकार करने की अनुमति नहीं होती।
2026 के संशोधन विधेयक में क्या-क्या प्रस्तावित है?
सरकार ने मार्च 2026 में संसद में एफसीआरए संशोधन विधेयक पेश किया। इसमें कई प्रशासनिक और कानूनी बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान विदेशी अंशदान से निर्मित संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ा है। यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण रद्द, समाप्त या स्वेच्छा से सरेंडर हो जाता है, तो ऐसी संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक नामित प्राधिकारी नियुक्त किया जाएगा। यदि संस्था बाद में दोबारा पंजीकरण प्राप्त कर लेती है तो उसकी संपत्ति उसे वापस सौंप दी जाएगी। यदि पंजीकरण बहाल नहीं होता, तभी निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बाद संपत्ति पर सरकार का नियंत्रण स्थापित हो सकेगा।
विधेयक में धार्मिक स्थलों की सुरक्षा को भी स्पष्ट किया गया है। सरकार का कहना है कि किसी भी चर्च, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या अन्य धार्मिक स्थल की धार्मिक पहचान और स्वरूप में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जा सकेगा। संस्थाओं को नामित प्राधिकारी के निर्णय के विरुद्ध पहले पुनर्विचार और उसके बाद जिला न्यायालय में अपील करने का अधिकार भी प्रस्तावित किया गया है।इसके अतिरिक्त समय पर नवीनीकरण न कराने पर एफसीआरए पंजीकरण स्वतः समाप्त माना जाएगा।
एक अन्य महत्वपूर्ण प्रस्ताव एफसीआरए उल्लंघन के मामलों में अधिकतम कारावास की अवधि पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करना है। सरकार का तर्क है कि इससे छोटी प्रक्रियागत त्रुटियों और गंभीर अपराधों के बीच संतुलन स्थापित होगा। जांच संबंधी प्रावधानों में यह भी प्रस्तावित है कि राज्य सरकारें या उनकी एजेंसियां एफसीआरए मामलों की जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति लेंगी।
2026 के नए नियमों में क्या लागू हो चुका है?
22 जून 2026 से लागू नए एफसीआरए नियमों के तहत अब किसी संस्था को यह स्पष्ट रूप से बताना होगा कि विदेशी अंशदान किस उद्देश्य के लिए लिया जाएगा और संस्था किन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में कार्य करेगी। पहले सामान्य श्रेणियों में पंजीकरण दिया जाता था, लेकिन अब गतिविधियों और भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर अधिक स्पष्ट अनुमति दी जाएगी। पहले से पंजीकृत संस्थाओं को भी निर्धारित समय सीमा के भीतर अपनी गतिविधियों और कार्यक्षेत्र की जानकारी अपडेट करनी होगी।
धार्मिक गतिविधियों के संबंध में भी पहली बार विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि विदेशी अंशदान किन धार्मिक गतिविधियों पर खर्च किया जा सकता है। नवीनीकरण के लिए यह शर्त भी लागू की गई है कि संस्था ने पिछले दो वर्षों में विदेशी अंशदान से कम से कम 10 लाख रुपये का वास्तविक उपयोग किया हो। सरकार का मानना है कि इससे केवल सक्रिय संस्थाएं ही पंजीकरण बनाए रख सकेंगी। रिपोर्टिंग व्यवस्था भी अधिक सख्त बनाई गई है। अब परियोजना-वार खर्च, अंतिम विदेशी दानदाता की पहचान, वेबसाइट, सोशल मीडिया खातों और गतिविधियों का विस्तृत विवरण देना अनिवार्य कर दिया गया है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
इस संशोधन पर विवाद तब और बढ़ गया जब अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया से रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने दावा किया कि प्रस्तावित संशोधन भारत सरकार को चर्च और धार्मिक संस्थाओं के मामलों में अधिक हस्तक्षेप का अधिकार दे सकते हैं। उन्होंने इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़ते हुए चिंता व्यक्त की। इसके बाद भारतीय राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। सीपीआई(एम) सांसद जॉन ब्रिटास ने अमेरिकी टिप्पणी को भारत का आंतरिक मामला बताते हुए उसका विरोध किया, लेकिन साथ ही एफसीआरए के कड़े प्रावधानों पर अपनी पार्टी की पुरानी आपत्तियां भी दोहराईं।
विपक्ष की आपत्तियां क्या हैं?
विपक्षी दलों का आरोप है कि यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त होता है तो विदेशी धन से बनी संपत्तियों पर सरकार का नियंत्रण स्थापित होने की आशंका बढ़ सकती है। उनका कहना है कि इससे चर्च, ईसाई शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, अनाथालयों और अन्य अल्पसंख्यक संस्थाओं पर प्रभाव पड़ सकता है।
कुछ विपक्षी नेताओं का यह भी कहना है कि मामूली प्रक्रियागत त्रुटियों के कारण संस्थाओं को गंभीर प्रशासनिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। हालांकि सरकार इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहती है कि संपत्ति केवल निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बाद ही प्रभावित होगी और धार्मिक स्वरूप पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।
सरकार का पक्ष क्या है?
गृह मंत्रालय का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन एफसीआरए के मूल ढांचे में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं करते। सरकार के अनुसार इनका उद्देश्य केवल प्रशासनिक कमियों को दूर करना, विदेशी फंडिंग की निगरानी मजबूत करना, निष्क्रिय संस्थाओं की पहचान करना और पारदर्शिता बढ़ाना है।
सरकार का यह भी कहना है कि एफसीआरए विदेशी सहायता पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून नहीं बल्कि उसे नियमित करने वाला कानून है। गृह मंत्रालय के अनुसार 2024-25 में लगभग 16,200 सक्रिय एफसीआरए-पंजीकृत संस्थाओं को करीब 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान प्राप्त हुआ, जो यह दर्शाता है कि वैध गतिविधियों के लिए विदेशी फंडिंग पर कोई रोक नहीं है।
एफसीआरए से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े
गृह मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024-25 में लगभग 16,200 सक्रिय एफसीआरए पंजीकृत संस्थाओं को करीब 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान प्राप्त हुआ। पिछले लगभग एक दशक में करीब 22,000 संस्थाओं के एफसीआरए पंजीकरण रद्द किए गए, जबकि लगभग 15,000 संस्थाओं के पंजीकरण नवीनीकरण न होने या अवधि समाप्त होने के कारण समाप्त हो गए। एफसीआरए के तहत प्राप्त विदेशी अंशदान का अधिकतम 20 प्रतिशत प्रशासनिक खर्च पर किया जा सकता है, जबकि कम से कम 80 प्रतिशत राशि घोषित परियोजनाओं और उद्देश्यों पर खर्च करना अनिवार्य है।
एफसीआरए क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत में हजारों गैर-सरकारी संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, बाल कल्याण, ग्रामीण विकास, पर्यावरण संरक्षण, आपदा राहत और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में विदेशी सहायता से काम करते हैं। इसलिए एफसीआरए केवल एक वित्तीय कानून नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, पारदर्शिता, सामाजिक विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बीच संतुलन बनाने वाला महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा है।
एक ओर यह सुनिश्चित करता है कि विदेशी धन का दुरुपयोग न हो, वहीं दूसरी ओर वैध सामाजिक और विकासात्मक गतिविधियों के लिए विदेशी सहायता का उपयोग भी जारी रह सके। इसी कारण एफसीआरए में होने वाला प्रत्येक संशोधन नागरिक समाज, गैर-सरकारी संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, नीति निर्माताओं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
क्या होंगे संभावित लाभ?
सरकार के अनुसार नए नियमों से विदेशी फंडिंग की निगरानी अधिक प्रभावी होगी, निष्क्रिय संस्थाओं की पहचान आसान होगी, परियोजना-आधारित जवाबदेही बढ़ेगी, अंतिम विदेशी दानदाता तक की जानकारी उपलब्ध रहेगी और धन के उपयोग में पारदर्शिता आएगी। इससे धन के दुरुपयोग, फर्जी संस्थाओं और संदिग्ध वित्तीय लेनदेन पर नियंत्रण मजबूत होने की उम्मीद है।
हालांकि आलोचकों का मानना है कि इन प्रावधानों के क्रियान्वयन के दौरान यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा कि वैध सामाजिक, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं के कामकाज पर अनावश्यक प्रशासनिक बोझ न पड़े तथा नियमों का उपयोग निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से किया जाए।
