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सेवा, संवाद और संवेदना से बदल रही बुजुर्गों की जिंदगी; जम्मू के अम्फल्ला वृद्धाश्रम की पहल बनी मिसाल

बढ़ती उम्र के साथ इंसान को सबसे अधिक जरूरत होती है अपनों के साथ, भावनात्मक सहारे और सम्मान की। लेकिन बदलती जीवनशैली, छोटे होते परिवार और सामाजिक परिस्थितियों के कारण कई बुजुर्ग जीवन के अंतिम पड़ाव में अकेलेपन और उपेक्षा का सामना करने को मजबूर हो जाते हैं। वृद्धाश्रम ऐसे लोगों को रहने, भोजन और चिकित्सा जैसी आवश्यक सुविधाएं तो उपलब्ध कराते हैं, लेकिन परिवार के प्यार और अपनेपन की कमी को पूरी तरह भर पाना आसान नहीं होता।

Vindhya Dubey07 अग. 2026, 05:23 PM IST
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सेवा, संवाद और संवेदना से बदल रही बुजुर्गों की जिंदगी; जम्मू के अम्फल्ला वृद्धाश्रम की पहल बनी मिसाल

कई बुजुर्गों के लिए सबसे बड़ी पीड़ा यह नहीं होती कि वे वृद्धाश्रम में रह रहे हैं, बल्कि यह होती है कि जिन बच्चों को उन्होंने जीवनभर संभाला, उन्हीं से दूरी का दर्द उन्हें सहना पड़ रहा है। ऐसे में समाज की छोटी-सी संवेदनशील पहल भी उनके जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है। इसी सोच के साथ जम्मू के अम्फल्ला स्थित वृद्धाश्रम में एक ऐसी पहल शुरू की गई है, जो बुजुर्गों को केवल सुविधाएं नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव और परिवार जैसा माहौल देने का प्रयास कर रही है।

'होम फॉर द एजेड एंड इनफर्म' में शुरू हुई सामाजिक इंटर्नशिप

जम्मू के अम्फल्ला स्थित 'होम फॉर द एजेड एंड इनफर्म' यानी वृद्ध और मानसिक एवं शारीरिक रूप से अशक्त लोगों के लिए बनाए गए इस आश्रय स्थल में सामाजिक इंटर्नशिप कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य वृद्धजनों के अकेलेपन को कम करना, उनके साथ सार्थक संवाद स्थापित करना और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है।

 कार्यक्रम के तहत विभिन्न सामाजिक संगठनों और शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े विद्यार्थी वृद्धाश्रम पहुंचते हैं और वहां रहने वाले बुजुर्गों के साथ समय बिताते हैं। यह केवल एक औपचारिक सामाजिक गतिविधि नहीं है, बल्कि युवाओं और बुजुर्गों के बीच भावनात्मक रिश्ता बनाने की कोशिश है।

'स्क्रीन टाइम-सेवा टाइम' का संदेश

आज की डिजिटल दुनिया में युवा बड़ी मात्रा में समय मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गतिविधियों में बिताते हैं। इसी आदत को सकारात्मक दिशा देने के उद्देश्य से इस पहल का संदेश रखा गया है—'स्क्रीन टाइम-सेवा टाइम'। इसका अर्थ है कि मोबाइल पर बिताए जाने वाले कुछ समय को समाज सेवा और मानवता की सेवा में बदला जाए। दस दिन की लघुकालिक इंटर्नशिप के दौरान विद्यार्थी वृद्धाश्रम में जाकर बुजुर्गों से बातचीत करते हैं, उनकी जरूरतों को समझते हैं और उनके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ने का प्रयास करते हैं।

बुजुर्गों के चेहरे पर लौट रही मुस्कान

वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्गों के लिए युवाओं की मौजूदगी किसी उपहार से कम नहीं होती। कई बुजुर्ग ऐसे होते हैं, जिनके परिवार दूर रहते हैं या जिनसे उनका संपर्क बहुत कम हो गया है। ऐसे में जब युवा उनके पास बैठते हैं, उनकी बातें सुनते हैं और उनके अनुभवों में रुचि दिखाते हैं तो उन्हें अपने परिवार जैसा एहसास होता है। बुजुर्ग अपने जीवन के अनुभव, संघर्ष और पुरानी यादें युवाओं के साथ साझा करते हैं। वहीं युवा भी उनसे जीवन के ऐसे सबक सीखते हैं, जो किसी किताब में नहीं मिल सकते। कई बार केवल कुछ घंटे बातचीत करना ही बुजुर्गों के लिए पूरे दिन की सबसे बड़ी खुशी बन जाता है।

समाचार, संस्कृति और मनोरंजन से जोड़ने का प्रयास

इस पहल के अंतर्गत विद्यार्थी बुजुर्गों को देश-दुनिया की घटनाओं से अवगत कराते हैं। उन्हें समाचारों की जानकारी दी जाती है और सामाजिक मुद्दों पर बातचीत की जाती है। इसके अलावा मनोरंजक गतिविधियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, गीत-संगीत और रचनात्मक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है। इन गतिविधियों का उद्देश्य बुजुर्गों को सक्रिय बनाए रखना और उनके जीवन में उत्साह एवं सकारात्मक ऊर्जा का संचार करना है।

स्वास्थ्य के लिए योग और ध्यान

बुजुर्गों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए योग और ध्यान जैसी गतिविधियां भी कराई जाती हैं। नियमित योग से जहां शरीर को सक्रिय रखने में मदद मिलती है, वहीं ध्यान मानसिक शांति और तनाव कम करने में सहायक होता है। इस तरह यह पहल बुजुर्गों की भावनात्मक जरूरतों के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव डाल रही है।

युवाओं को मिल रहा संस्कार और अनुभव का खजाना

यह कार्यक्रम केवल बुजुर्गों की मदद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि युवाओं के व्यक्तित्व निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बुजुर्गों के साथ समय बिताने से विद्यार्थियों में कई मानवीय गुण विकसित होते हैं। इनमें प्रमुख हैं-

  • करुणा और संवेदनशीलता
  • धैर्य और सहनशीलता
  • कृतज्ञता की भावना
  • बड़ों के प्रति सम्मान
  • सामाजिक जिम्मेदारी का भाव

युवाओं को यह समझने का अवसर मिलता है कि जीवन की वास्तविक सीख केवल पुस्तकों और कक्षाओं से नहीं, बल्कि लोगों के अनुभवों से भी मिलती है।

बुजुर्गों के अनुभव युवाओं के लिए मार्गदर्शन

हर बुजुर्ग अपने साथ जीवन का लंबा अनुभव लेकर चलता है। उनके संघर्ष, निर्णय, पारिवारिक जिम्मेदारियां और जीवन के उतार-चढ़ाव नई पीढ़ी के लिए सीख का माध्यम बन सकते हैं। जब युवा बुजुर्गों के साथ बैठते हैं तो दोनों पीढ़ियों के बीच संवाद का पुल तैयार होता है। यह रिश्ता केवल सेवा देने और सेवा लेने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक-दूसरे से सीखने और समझने का माध्यम बन जाता है।

बदलते सामाजिक ढांचे में ऐसी पहल की जरूरत

आज संयुक्त परिवारों की संख्या लगातार कम हो रही है। नौकरी, शिक्षा और बदलती जीवनशैली के कारण कई परिवारों में बुजुर्गों और युवाओं के बीच दूरी बढ़ रही है। ऐसे समय में वृद्धाश्रमों में युवाओं की भागीदारी समाज में संवेदनशीलता बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। बुजुर्गों को केवल आर्थिक सहायता या चिकित्सा सुविधा नहीं चाहिए, उन्हें सम्मान, बातचीत और अपनापन भी चाहिए।

शिक्षा का उद्देश्य संवेदनशील नागरिक बनाना

यह पहल इस बात को रेखांकित करती है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री और प्रमाण पत्र हासिल करना नहीं है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ऐसे नागरिक तैयार करना है, जो समाज की जरूरतों को समझें और दूसरों के प्रति जिम्मेदारी महसूस करें। कई संस्थाएं अब विद्यार्थियों को सामाजिक गतिविधियों से जोड़ रही हैं ताकि उनमें व्यवहारिक ज्ञान और मानवीय मूल्यों का विकास हो सके। आज के समय में ऐसे युवाओं की जरूरत है, जो केवल अपने करियर के बारे में नहीं सोचें, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के प्रति भी संवेदनशील रहें।

बुजुर्गों और युवाओं के बीच बन रहा भावनात्मक रिश्ता

अम्फल्ला वृद्धाश्रम की यह पहल एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि बुजुर्गों को केवल देखभाल की नहीं, बल्कि प्यार और सम्मान की जरूरत होती है। युवाओं की कुछ घंटों की मौजूदगी किसी बुजुर्ग के जीवन में उम्मीद, खुशी और आत्मविश्वास पैदा कर सकती है। जब युवा अपने समय का एक हिस्सा समाज सेवा में लगाते हैं, तो इससे न केवल बुजुर्गों के चेहरे पर मुस्कान लौटती है, बल्कि समाज भी अधिक संवेदनशील और मानवीय बनता है। यह पहल साबित करती है कि सेवा का सबसे बड़ा रूप किसी जरूरतमंद को यह एहसास कराना है कि वह अकेला नहीं है।