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आरक्षण पर भागवत के बयान का स्वागत, सपा पर बरसे निर्मल l

लखनऊ। डॉ. आंबेडकर महासभा ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं विधान परिषद सदस्य डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण संबंधी बयान का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि जब तक समाज में सामाजिक भेदभाव और असमानता बनी हुई है, तब तक आरक्षण की व्यवस्था जारी रहनी चाहिए। मोहन भागवत ने भी हाल में कहा था कि आरक्षण सामाजिक भेदभाव दूर करने के उद्देश्य से लागू किया गया था और जब तक भेदभाव मौजूद रहेगा, तब तक इसकी आवश्यकता बनी रहेगी। डॉ. निर्मल ने आरक्षण के राजनीतिकरण के लिए समाजवादी पार्टी और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा ने समय-समय पर आरक्षण के मुद्दे का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया और अनुसूचित जाति समाज के हितों की अनदेखी की।

Kashish Rai08 अग. 2026, 02:05 PM IST
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आरक्षण पर भागवत के बयान का स्वागत, सपा पर बरसे निर्मल l

लखनऊ। डॉ. आंबेडकर महासभा ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं विधान परिषद सदस्य डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने आरक्षण को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के बयान का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि आरक्षण किसी वर्ग को स्थायी रूप से लाभ पहुंचाने की व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक भेदभाव और असमानता को दूर करने का संवैधानिक माध्यम है। जब तक समाज में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य वंचित वर्गों के साथ भेदभाव समाप्त नहीं हो जाता, तब तक आरक्षण की व्यवस्था जारी रहनी चाहिए।


संघ प्रमुख मोहन भागवत ने युवाओं के साथ संवाद के दौरान आरक्षण के उद्देश्य और उसकी जरूरत पर विचार व्यक्त करते हुए कहा था कि यह व्यवस्था सामाजिक भेदभाव के कारण शुरू की गई थी। उन्होंने कहा कि जब तक समाज में असमानता और भेदभाव मौजूद है, तब तक आरक्षण की आवश्यकता बनी रहेगी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि आरक्षण को राजनीतिक मुद्दा बनाने के बजाय सामाजिक एकता और समानता के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।




डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने कहा कि आरक्षण को लेकर संघ प्रमुख का बयान सामाजिक न्याय के पक्ष में महत्वपूर्ण संदेश है। उन्होंने कहा कि संविधान निर्माताओं ने वंचित और शोषित वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की थी। इसका उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को शिक्षा, रोजगार और प्रशासन में समान अवसर उपलब्ध कराना था।


उन्होंने आरक्षण के राजनीतिकरण को लेकर समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला। डॉ. निर्मल ने कहा कि आरक्षण के मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने और इसके संबंध में समाज में भ्रम की स्थिति पैदा करने के लिए समाजवादी पार्टी और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव जिम्मेदार हैं। उनका आरोप है कि सपा ने अलग-अलग समय पर आरक्षण के सवाल को अपने राजनीतिक हितों के अनुसार उठाया, जबकि अनुसूचित जाति समाज के वास्तविक हितों की अनदेखी की।


डॉ. निर्मल ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16(4)(ए) में अनुसूचित जातियों को पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान किया गया है। इसके बावजूद समाजवादी पार्टी ने संसद में पदोन्नति में आरक्षण से जुड़े संशोधन विधेयक का विरोध किया। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी की ओर से प्रदेशभर में पदोन्नति में आरक्षण के विरोध में सभाएं और आंदोलन भी आयोजित किए गए, जिससे अनुसूचित जाति के कर्मचारियों और अधिकारियों के हित प्रभावित हुए।


उन्होंने कहा कि पदोन्नति में आरक्षण का उद्देश्य सरकारी सेवाओं में वंचित वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करना है। सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को केवल नियुक्ति के स्तर पर अवसर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें सेवा में आगे बढ़ने और निर्णय लेने वाली जिम्मेदारियों तक पहुंचने का भी समान अवसर मिलना चाहिए। डॉ. निर्मल के अनुसार, पदोन्नति में आरक्षण समाप्त या कमजोर किए जाने से अनुसूचित जाति समाज के प्रतिनिधित्व पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।


डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार ने दलितों के लिए ठेकेदारी में आरक्षण की व्यवस्था समाप्त कर दी थी। उन्होंने कहा कि ठेकेदारी में आरक्षण से अनुसूचित जाति के लोगों को आर्थिक रूप से आगे बढ़ने और सरकारी निर्माण व विकास कार्यों में भागीदारी का अवसर मिलता था। इस व्यवस्था को समाप्त किए जाने से दलित समाज के आर्थिक सशक्तीकरण की प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा और उसके आर्थिक अवसर सीमित हुए।


उन्होंने कहा कि सरकारी नौकरियों और पदोन्नति के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी भी सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि वंचित वर्गों को रोजगार, शिक्षा और कारोबार में पर्याप्त अवसर नहीं मिलेंगे, तो सामाजिक समानता का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। डॉ. निर्मल ने कहा कि आरक्षण को लेकर किसी भी प्रकार की बहस संविधान और सामाजिक न्याय की भावना के अनुरूप होनी चाहिए। डॉ. निर्मल ने दोहराया कि आरक्षण को समाप्त करने या इसकी समीक्षा की मांग करने से पहले समाज में मौजूद भेदभाव, असमानता और अवसरों की विषमता को समाप्त करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब तक अनुसूचित जाति और अन्य वंचित वर्गों को शिक्षा, रोजगार, प्रशासन और आर्थिक क्षेत्र में बराबरी का अवसर नहीं मिल जाता, तब तक आरक्षण की व्यवस्था को जारी रखना आवश्यक है।


उन्होंने कहा कि आरक्षण समाज को बांटने का नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को बराबरी के स्तर पर लाने का माध्यम है। सामाजिक समानता और न्याय की स्थापना के लिए राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर जिम्मेदार और संवेदनशील रुख अपनाना चाहिए। डॉ. निर्मल ने कहा कि आरक्षण का राजनीतिक इस्तेमाल करने के बजाय इसके संवैधानिक उद्देश्य को समझना और लागू करना आवश्यक है।