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2050 तक भारत में बढ़ेगी बुजुर्गों की संख्या; कम होते कामकाजी हाथों पर बढ़ेगा जिम्मेदारियों का बोझ
भारत की आबादी तेजी से बुजुर्ग हो रही है। अनुमान है कि 2050 तक देश के हर पांच नागरिकों में से एक की उम्र 60 वर्ष से अधिक होगी। उस समय भारत में बुजुर्गों की संख्या करीब 34.7 करोड़ तक पहुंच सकती है। खास बात यह है कि इनमें लगभग 70 प्रतिशत बुजुर्ग ग्रामीण क्षेत्रों में रहने की संभावना है। ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं, देखभाल और सामाजिक सुरक्षा की मजबूत व्यवस्था तैयार करना भारत के सामने बड़ी चुनौती होगी।
Priyanka Gaikwad08 अग. 2026, 04:02 PM IST

भारत की जनसंख्या का स्वरूप आने वाले कुछ दशकों में बड़े स्तर पर बदलने वाला है। देश में आर्थिक विकास की प्रक्रिया जारी रहने के साथ-साथ बुजुर्ग आबादी भी तेजी से बढ़ रही है। ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया के अध्ययन के अनुसार, 2050 तक भारत में 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की संख्या करीब 34.7 करोड़ हो सकती है। यानी उस समय देश के हर पांच नागरिकों में से एक नागरिक बुजुर्ग होगा। अनुमान के मुताबिक, इनमें लगभग 70 प्रतिशत बुजुर्ग ग्रामीण क्षेत्रों में रहेंगे। ऐसे में भारत में बढ़ती उम्रदराज आबादी का सबसे बड़ा असर ग्रामीण इलाकों की स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवस्था पर पड़ सकता है।
परिवार व्यवस्था में बदलाव से बढ़ेगा दबाव
पहले संयुक्त परिवार व्यवस्था में बुजुर्गों की देखभाल परिवार के कई सदस्य मिलकर करते थे। लेकिन अब परिवार छोटे हो रहे हैं। रोजगार की तलाश में युवा बड़ी संख्या में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। दूसरी ओर, जीवन प्रत्याशा बढ़ने के कारण बुजुर्गों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। फिलहाल देश में करीब 94 प्रतिशत बुजुर्गों की देखभाल परिवार के सदस्य ही करते हैं। लेकिन आने वाले समय में परिवार में कमाने वाले सदस्यों की संख्या घटने पर बुजुर्गों की देखभाल का बोझ परिवारों पर और बढ़ सकता है।
कम होते कामकाजी हाथ, बढ़ेगी जिम्मेदारी
बुजुर्गों की संख्या बढ़ने के साथ ही कामकाजी उम्र की आबादी का अनुपात भी कम होने का अनुमान है। 2001 में एक बुजुर्ग नागरिक के मुकाबले कामकाजी उम्र के 8.4 लोग थे। यह अनुपात 2026 तक घटकर 5.2 होने का अनुमान है। इसका सीधा मतलब है कि भविष्य में अपेक्षाकृत कम कमाने वाले लोगों पर अधिक बुजुर्गों की आर्थिक और सामाजिक जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी आ सकती है।
गांवों में ही तैयार करनी होगी सेवा व्यवस्था
बढ़ती बुजुर्ग आबादी के लिए हर जगह नई और बड़ी बुनियादी सुविधाएं खड़ी करने के बजाय मौजूदा व्यवस्थाओं का बेहतर इस्तेमाल करने की जरूरत बताई गई है। ग्राम पंचायत, आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी, स्वयं सहायता समूह और आयुष्मान आरोग्य मंदिर जैसी व्यवस्थाओं को आपस में जोड़कर गांव स्तर पर बुजुर्गों के लिए एक मजबूत सेवा व्यवस्था तैयार की जा सकती है। बुजुर्गों को नियमित स्वास्थ्य जांच, दवाइयां, घरेलू सहायता और लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों के लिए जरूरी सेवाएं स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध कराना भविष्य में बेहद महत्वपूर्ण होगा।
बीमारियों का स्वरूप भी बदल रहा है
भारत में मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर जैसी गैर-संचारी बीमारियों का बोझ बढ़ रहा है। ऐसे में सिर्फ अस्पतालों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। बुजुर्गों के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच, लगातार इलाज, दवाइयों और दीर्घकालिक देखभाल की व्यवस्था स्थानीय स्तर पर मजबूत करनी होगी।
भारत में मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर जैसी गैर-संचारी बीमारियों का बोझ बढ़ रहा है। ऐसे में सिर्फ अस्पतालों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। बुजुर्गों के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच, लगातार इलाज, दवाइयों और दीर्घकालिक देखभाल की व्यवस्था स्थानीय स्तर पर मजबूत करनी होगी।
बुजुर्गों की बढ़ती संख्या से रोजगार के अवसर
बुजुर्गों की बढ़ती संख्या सिर्फ सामाजिक चुनौती नहीं है, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर सकती है। बुजुर्गों की देखभाल, स्वास्थ्य सेवाओं, घरेलू सहायता और अन्य सहयोगी सेवाओं के लिए आने वाले समय में प्रशिक्षित कर्मचारियों की बड़ी जरूरत हो सकती है। अध्ययन के अनुसार, सेवा अर्थव्यवस्था में GDP के 2 प्रतिशत निवेश से करीब 1.1 करोड़ रोजगार पैदा किए जा सकते हैं। खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के लिए इस क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर बनने की संभावना है।
देखभाल का सबसे बड़ा बोझ महिलाओं पर
घर में बच्चों, बीमार लोगों और बुजुर्गों की देखभाल की जिम्मेदारी आज भी मुख्य रूप से महिलाओं पर है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, महिलाएं रोजाना औसतन 305 मिनट बिना वेतन के देखभाल से जुड़े काम करती हैं, जबकि पुरुष करीब 56 मिनट इस तरह के कामों में देते हैं। ऐसे में बुजुर्गों की देखभाल के लिए पेशेवर और गांव स्तर की सेवाएं उपलब्ध होने से महिलाओं पर बिना वेतन वाली देखभाल का बोझ कम हो सकता है। साथ ही उन्हें रोजगार के अधिक अवसर भी मिल सकते हैं।
भारत के सामने होगा बड़ा सवाल
कुल मिलाकर, भारत के सामने चुनौती सिर्फ बुजुर्गों की बढ़ती संख्या की नहीं है। आर्थिक रूप से मजबूत होते भारत को बढ़ती बुजुर्ग आबादी के लिए स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा, देखभाल व्यवस्था और आर्थिक सहायता का मजबूत ढांचा भी तैयार करना होगा। अगर 2050 के भारत के लिए अभी से तैयारी नहीं की गई, तो कम होते कामकाजी लोगों पर बढ़ती बुजुर्ग आबादी का आर्थिक और सामाजिक बोझ काफी बढ़ सकता है। इसलिए बुजुर्ग होती आबादी को केवल चुनौती के रूप में देखने के बजाय स्वास्थ्य सेवा, देखभाल और सेवा क्षेत्र में रोजगार सृजन के अवसर के तौर पर भी देखने की जरूरत होगी।
