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नारायण साई को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, उम्रकैद पर रोक से इनकार; हाईकोर्ट को 3 महीने में फैसला करने का आदेश

2013 के चर्चित दुष्कर्म मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे नारायण साई को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने 7 अगस्त 2026 को उनकी सजा पर रोक लगाने से इनकार करते हुए गुजरात हाईकोर्ट के आदेश में दखल नहीं दिया। हालांकि, शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट को नारायण साई की दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ लंबित अपील पर तीन महीने के भीतर फैसला करने का निर्देश दिया है।

Sonali08 अग. 2026, 04:03 PM IST
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नारायण साई को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, उम्रकैद पर रोक से इनकार; हाईकोर्ट को 3 महीने में फैसला करने का आदेश

नई दिल्ली: 2013 के दुष्कर्म मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे आसाराम के बेटे नारायण साई को सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें नारायण साई की उम्रकैद की सजा निलंबित करने और अपील लंबित रहने तक रिहाई की मांग ठुकरा दी गई थी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट को नारायण साई की दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ लंबित आपराधिक अपील पर तीन महीने के भीतर फैसला करने का निर्देश दिया है।

7 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया आदेश

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने 7 अगस्त 2026 को इस मामले में आदेश पारित किया। नारायण साई की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन पेश हुए। शीर्ष अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट के 4 मई 2026 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट ने नारायण साई की उम्रकैद की सजा को निलंबित करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि यह सुनिश्चित करने के लिए समयसीमा तय की कि उनकी मुख्य आपराधिक अपील अनिश्चितकाल तक लंबित न रहे। कोर्ट ने हाईकोर्ट से कहा कि दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ लंबित अपील पर तीन महीने के भीतर फैसला किया जाए।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला वर्ष 2013 में सामने आया था। सूरत की दो बहनों ने पुलिस से संपर्क कर आसाराम और उनके बेटे नारायण साई पर दुष्कर्म समेत गंभीर आरोप लगाए थे।

नारायण साई के खिलाफ दर्ज मामले की सुनवाई के बाद सूरत की सेशंस कोर्ट ने वर्ष 2019 में उन्हें दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई। अदालत ने पीड़िता को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया था। मामले में नारायण साई के कुछ सहयोगियों को भी अलग-अलग अपराधों में दोषी ठहराया गया था। इनमें दो महिला सहयोगी भी शामिल थीं, जिन्हें 10-10 साल की जेल की सजा सुनाई गई। वहीं, उनके ड्राइवर राजकुमार उर्फ रमेश मल्होत्रा को छह महीने की सजा दी गई थी।

गुजरात हाईकोर्ट ने 4 मई 2026 को क्या कहा था?

नारायण साई ने उम्रकैद की सजा को निलंबित करने और अपनी आपराधिक अपील लंबित रहने के दौरान जमानत पर रिहा करने की मांग की थी।

गुजरात हाईकोर्ट ने 4 मई 2026 को उनकी याचिका खारिज कर दी। नारायण साई की ओर से दलील दी गई थी कि वह करीब 11 वर्षों से जेल में हैं और उनकी आपराधिक अपील पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। हाईकोर्ट ने हालांकि कहा कि अपील की अंतिम सुनवाई में हुई देरी के लिए नारायण साई के आचरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि 2019 से दोषी की ओर से अपील की अंतिम सुनवाई में अपेक्षित सहयोग नहीं किया गया। अदालत के मुताबिक, इस दौरान अलग-अलग याचिकाओं के जरिए अस्थायी या स्थायी राहत हासिल करने की कोशिश की गई।

'देरी के लिए खुद जिम्मेदार'

हाईकोर्ट ने कहा था कि नारायण साई ने अपील की अंतिम सुनवाई को आगे बढ़ाने में सहयोग नहीं किया और इस वजह से अब वह लंबी हिरासत और अपील में देरी को सजा निलंबित कराने का आधार नहीं बना सकते। सजा निलंबन की याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष से पूछा था कि क्या वह मुख्य आपराधिक अपील पर रोजाना सुनवाई के लिए तैयार है। इसके जवाब में वकील ने कहा था कि उन्हें फिलहाल केवल सजा निलंबन की याचिका पर बहस करने के निर्देश मिले हैं और उसके निपटारे के बाद मुख्य अपील पर बहस के लिए तैयारी की जाएगी। हाईकोर्ट ने इसी परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए माना कि लंबी हिरासत की स्थिति के लिए नारायण साई स्वयं भी जिम्मेदार हैं।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

गुजरात हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए नारायण साई सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। उनकी याचिका में मुख्य रूप से उम्रकैद की सजा को निलंबित करने और अपील लंबित रहने तक रिहाई की मांग की गई थी। 7 अगस्त 2026 को जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसका सीधा मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने नारायण साई की उम्रकैद की सजा पर रोक नहीं लगाई है और उन्हें इस याचिका के आधार पर रिहाई नहीं मिली। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को उनकी मुख्य आपराधिक अपील पर तीन महीने के भीतर फैसला करने का निर्देश दिया है।

अब आगे क्या होगा?

अब इस मामले में गुजरात हाईकोर्ट में लंबित मुख्य आपराधिक अपील महत्वपूर्ण होगी। नारायण साई अपनी दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को चुनौती दे रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने सजा को निलंबित नहीं किया है, इसलिए फिलहाल 2019 में सुनाई गई उम्रकैद की सजा प्रभावी है। हाईकोर्ट को अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित तीन महीने की समयसीमा के भीतर अपील पर निर्णय करना होगा।

आसाराम के मामले से भी जुड़ा है घटनाक्रम

नारायण साई के पिता आसाराम भी अलग दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद जेल में सजा काट रहे हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने आसाराम की स्वास्थ्य संबंधी याचिका पर AIIMS की रिपोर्ट पर विचार किया था। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की अनुमति नहीं दी थी, लेकिन जेल में उनकी देखभाल के लिए उनकी पसंद का प्रशिक्षित केयरगिवर रखने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि स्वास्थ्य की स्थिति बिगड़ने पर उचित राहत के लिए दोबारा अदालत का रुख किया जा सकता है।

नारायण साई और आसाराम के मामले अलग-अलग हैं और दोनों में अलग-अलग अदालतों द्वारा दोषसिद्धि एवं सजा सुनाई गई है।

केस डिटेल

केस: NARAYAN @ NARAYAN SAI @ MOTA BHAGWAN Versus STATE OF GUJARAT AND ANR.

डायरी नंबर: 29992-2026

सुप्रीम कोर्ट आदेश की तारीख: 7 अगस्त 2026

सुप्रीम कोर्ट पीठ: जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले

नारायण साई की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन

गुजरात हाईकोर्ट का संबंधित आदेश: 4 मई 2026

मुख्य मुद्दा: उम्रकैद की सजा के निलंबन और अपील लंबित रहने के दौरान रिहाई की मांग

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: गुजरात हाईकोर्ट को लंबित आपराधिक अपील पर तीन महीने में फैसला करने का निर्देश