law-order

पत्नी की खुदकुशी पर पति को मिली बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने पलटी 7 साल की सजा; 5 महीने से नहीं था कोई संपर्क

पत्नी की खुदकुशी के मामले में सात साल की सजा झेल रहे पति को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ी राहत दी है। लखनऊ पीठ ने ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि को रद्द करते हुए अंकुर टंडन को बरी कर दिया। अदालत के सामने सिर्फ पति-पत्नी के बीच लंबे समय से बातचीत बंद होने का तथ्य ही नहीं, बल्कि कथित 6 लाख रुपये के दहेज भुगतान, गवाहों के विरोधाभासी बयानों, सुसाइड नोट और आत्महत्या से पहले पति की ओर से किसी कथित उकसावे के ठोस सबूत का सवाल भी था। कोर्ट ने साफ किया कि किसी वैवाहिक रिश्ते का टूटना या आपसी विवाद अपने आप आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध साबित नहीं करता।

Sonali08 अग. 2026, 04:56 PM IST
खबर शेयर करें:
पत्नी की खुदकुशी पर पति को मिली बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने पलटी 7 साल की सजा; 5 महीने से नहीं था कोई संपर्क

लखनऊ: पत्नी की आत्महत्या के मामले में दोषी ठहराए गए पति अंकुर टंडन को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने बड़ी राहत दी है। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने 31 जुलाई 2026 को Criminal Appeal No. 3471 of 2024 में ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष पति के खिलाफ क्रूरता, आत्महत्या के लिए उकसाने और दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत अपराधों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। 

फैसले की खास बात यह रही कि ट्रायल कोर्ट ने खुद माना था कि 20 अप्रैल 2010 की FIR के बाद पति-पत्नी के बीच संपर्क नहीं था और 2 अक्टूबर 2010 को महिला ने आत्महत्या की। यानी आत्महत्या से पहले 5 महीने 12 दिन तक दोनों के बीच कोई संपर्क या संवाद नहीं हुआ। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में, जब इस अवधि में आरोपी की ओर से कोई उकसाने वाला कृत्य साबित नहीं हुआ, उसे आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। 

क्या था पूरा मामला?

न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार अंकुर टंडन और मोनिका की शादी 14 दिसंबर 2004 को हुई थी। अभियोजन का आरोप था कि शादी के बाद पति और उसके परिवार के सदस्य फ्लैट खरीदने के लिए 10 लाख रुपये दहेज की मांग कर रहे थे। आरोप था कि महिला के पिता ने जमीन बेचकर 6 लाख रुपये नकद दिए, लेकिन बाकी 4 लाख रुपये की मांग जारी रही। महिला को कथित तौर पर प्रताड़ित किया गया और बाद में उसने 2 अक्टूबर 2010 को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। 

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण फांसी से हुई एंटेमॉर्टम हैंगिंग के कारण दम घुटना बताया गया था। मामले में पहले पति के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई और बाद में परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की गई। 

ट्रायल कोर्ट ने पति को सुनाई थी सजा

ट्रायल कोर्ट ने 21 सितंबर 2024 को अंकुर टंडन को IPC की धारा 498-A और 306 तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत दोषी ठहराया था। उसे धारा 498-A के तहत दो साल की कठोर कैद और 10 हजार रुपये जुर्माना, धारा 306 के तहत सात साल की कठोर कैद और 50 हजार रुपये जुर्माना तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत पांच साल की कठोर कैद और 15 हजार रुपये जुर्माने की सजा दी गई थी। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने उसे IPC की धारा 304-B यानी दहेज मृत्यु के आरोप से बरी कर दिया था। 

20 अप्रैल 2010 की FIR बनी मामले की अहम कड़ी

हाईकोर्ट के फैसले में सामने आया कि महिला ने 20 अप्रैल 2010 को लखनऊ के महिला थाने में अपने पति, सास, देवर और देवरानी के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। इसमें IPC की धाराओं 498-A, 323, 406, 504 और 506 तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत आरोप लगाए गए थे। हाईकोर्ट ने विशेष रूप से ध्यान दिया कि लिखित रूप में दहेज की मांग का आरोप पहली बार इसी FIR में सामने आया था। अदालत ने इससे पहले के वैवाहिक विवाद और दोनों पक्षों की ओर से दर्ज कराई गई शिकायतों को भी रिकॉर्ड का हिस्सा माना।

पति ने 2007 में पत्नी के खिलाफ भी दर्ज कराई थी शिकायत

फैसले में सामने आया कि पति ने वर्ष 2007 में अपनी पत्नी और उसके मायके के कुछ सदस्यों के खिलाफ CJM (Custom), लखनऊ की अदालत में शिकायत दर्ज कराई थी।

पति का आरोप था कि पत्नी उस पर अपनी मां और भाई से अलग रहने का दबाव डालती थी और कथित तौर पर आत्महत्या की धमकी देकर उसे तथा उसके परिवार को दहेज मृत्यु के मामले में फंसाने की बात कहती थी। इस शिकायत पर 6 अप्रैल 2010 को मजिस्ट्रेट ने पत्नी के खिलाफ IPC की धाराओं 504 और 506 के तहत समन जारी किया था। 

रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि दोनों के बीच लंबे समय से वैवाहिक विवाद चल रहा था। पति ने बाद में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक का मुकदमा भी दायर किया था। 

पति-पत्नी अगस्त 2007 से अलग-अलग शहरों में रहने का दावा

पति ने अपने बचाव में कहा था कि वह और उसकी पत्नी अगस्त 2007 से अलग-अलग शहरों में काम और रह रहे थे। उसने यह भी कहा कि पत्नी ने उसका घर छोड़ने के बाद वापस साथ रहना बंद कर दिया था। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने बचाव के कुछ दस्तावेजों को सीमित महत्व दिया था। हाईकोर्ट ने अपील में उपलब्ध पूरे रिकॉर्ड और दोनों पक्षों के साक्ष्यों की दोबारा समीक्षा की। 

6 लाख रुपये के दहेज भुगतान का दावा भी संदेह से परे साबित नहीं हुआ

हाईकोर्ट के फैसले में दहेज के कथित 6 लाख रुपये के भुगतान को लेकर कई महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आए। अभियोजन पक्ष का कहना था कि महिला के पिता ने जमीन बेचकर 6 लाख रुपये नकद पति को दिए थे। लेकिन अदालत ने पाया कि अभियोजन ने उस जमीन की बिक्री की तारीख, बिक्री विलेख का विवरण और जमीन कितने रुपये में बेची गई, यह स्पष्ट रूप से साबित नहीं किया।इसके अलावा, कथित 6 लाख रुपये पति को किस तारीख को दिए गए, इसका भी स्पष्ट प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं था।  एक गवाह ने शादी के बाद छोटी रकम और एयर कंडीशनर की मांग तथा करीब 1.5 लाख रुपये दिए जाने की बात कही, लेकिन मृतका के पिता ने अपने बयान में इस 1.5 लाख रुपये वाले दावे की पुष्टि नहीं की। हाईकोर्ट ने इस तरह के विरोधाभासों को अभियोजन के मामले के लिए महत्वपूर्ण माना। 

FIR और गवाहों के बयानों में भी मिली असंगतियां

हाईकोर्ट ने कहा कि 20 अप्रैल 2010 की FIR में लगाए गए आरोपों और बाद में अभियोजन के गवाहों द्वारा दिए गए बयानों में महत्वपूर्ण अंतर था। फैसले के अनुसार, FIR में महिला ने यह भी आरोप लगाया था कि उसकी मां से 2 लाख रुपये की मांग की गई थी और उसके पिता ने रकम उधार लेकर यह मांग पूरी की थी, लेकिन महिला के पिता ने अदालत में अपने बयान के दौरान इस कथित भुगतान की पुष्टि नहीं की। इसी तरह FIR में महिला ने अपने पिता से लगातार रकम लिए जाने और उसे पति तथा उसकी मां के बैंक खातों में जमा किए जाने की बात कही थी, लेकिन उसके पिता के बयान में इसकी पुष्टि नहीं हुई।

सुसाइड नोट में दहेज की मांग का उल्लेख नहीं

महिला ने दो सुसाइड नोट छोड़े थे। एक उसकी मां को संबोधित था और दूसरा पति को। इनमें उसने पति के कथित दुर्व्यवहार, वैवाहिक विवाद और मानसिक पीड़ा का जिक्र किया था। सुसाइड नोट में पति और उसके परिवार को अपनी मौत के लिए जिम्मेदार ठहराने की बातें थीं, लेकिन अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि दोनों सुसाइड नोट में दहेज की मांग का उल्लेख नहीं था।  यह तथ्य दहेज उत्पीड़न के आरोप की जांच करते समय हाईकोर्ट के लिए महत्वपूर्ण परिस्थितियों में से एक रहा।

FIR के बाद दोबारा साथ रहने का कोई प्रमाण नहीं

हाईकोर्ट ने फैसले में विशेष रूप से कहा कि 20 अप्रैल 2010 को FIR दर्ज होने के बाद ऐसा कोई ठोस material रिकॉर्ड पर नहीं आया जिससे यह साबित हो कि महिला फिर से पति के साथ पत्नी के रूप में रहने लगी थी। अदालत ने इस तथ्य को भी धारा 306 IPC के आरोप की जांच में महत्वपूर्ण माना। 

5 महीने 12 दिन तक कोई संपर्क नहीं, आत्महत्या के लिए उकसावे पर कोर्ट का सवाल

ट्रायल कोर्ट ने धारा 304-B IPC के तहत पति को इसलिए बरी किया था क्योंकि 20 अप्रैल 2010 की FIR के बाद पति-पत्नी के बीच संपर्क नहीं था और इसलिए महिला की मृत्यु से ठीक पहले दहेज के लिए उत्पीड़न का सवाल कमजोर पड़ता था। लेकिन उसी रिकॉर्ड के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने धारा 306 IPC के तहत पति को दोषी ठहराया था।

हाईकोर्ट ने इस विरोधाभास पर विशेष ध्यान दिया। अदालत ने कहा कि जब ट्रायल कोर्ट खुद यह मान चुका था कि आत्महत्या से पहले 5 महीने 12 दिन तक पति का महिला से कोई संपर्क नहीं था, तो इस अवधि में पति की ओर से आत्महत्या के लिए उकसाने वाला कौन-सा कृत्य हुआ, यह साबित होना जरूरी था। 

केवल बिगड़े वैवाहिक रिश्ते से धारा 306 का अपराध साबित नहीं

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच संबंध खराब होना या दोनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप होना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध साबित नहीं करता।

धारा 306 IPC के लिए अभियोजन को आरोपी की ओर से instigation, incitement या intentional aid यानी उकसावे, प्रेरणा या जानबूझकर सहायता जैसे तत्व साबित करने होते हैं। साथ ही कथित कृत्य और आत्महत्या के बीच पर्याप्त निकट संबंध भी होना चाहिए।  अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि आत्महत्या के लिए उकसावे के आरोप में आरोपी की ओर से सकारात्मक कृत्य और आवश्यक मानसिक तत्व यानी mens rea का प्रमाण होना जरूरी है। केवल सामान्य उत्पीड़न के आरोप, बिना आत्महत्या के समय के आसपास किसी सकारात्मक कृत्य के, धारा 306 की दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

Evidence Act की धारा 113-A पर भी हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

फैसले का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 113-A से जुड़ा है। यह प्रावधान विवाहित महिला की आत्महत्या के मामले में कुछ परिस्थितियों में पति या उसके रिश्तेदार द्वारा आत्महत्या के लिए उकसाने की presumption की अनुमति देता है। लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि इस presumption को सीधे लागू नहीं किया जा सकता। पहले धारा 498-A IPC के तहत cruelty या harassment का cogent यानी ठोस साक्ष्य होना जरूरी है।  अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Ram Pyarey v. State of U.P. और अन्य फैसलों के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब क्रूरता, उत्पीड़न या आत्महत्या के लिए उकसावे का ठोस प्रमाण नहीं हो, तब केवल धारा 113-A की presumption के आधार पर धारा 306 IPC की दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।

दहेज देना भी अपराध, लेकिन 6 लाख का दावा ही साबित नहीं हुआ

फैसले में दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की गई।

अदालत ने कहा कि कानून के तहत केवल दहेज लेना ही नहीं, बल्कि दहेज देना या दहेज देने-लेने में सहायता करना भी दंडनीय है। हालांकि इस मामले में अभियोजन यह साबित ही नहीं कर सका कि मृतका के पिता ने 6 लाख रुपये दहेज के रूप में पति को दिए थे। इसलिए अदालत ने दहेज लेने का अपराध भी स्थापित नहीं माना। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हाईकोर्ट ने मृतका के पिता को दहेज देने का दोषी घोषित नहीं किया था। अदालत ने केवल धारा 3 की कानूनी स्थिति स्पष्ट की और फिर कहा कि इस मामले में कथित 6 लाख रुपये का भुगतान ही संदेह से परे साबित नहीं हुआ। 

अभियोजन पर सबूत का बोझ, आरोपी को सिर्फ उचित संदेह पैदा करना पर्याप्त

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Anand Ramachandra Chougule और Vaibhav v. State of Maharashtra जैसे फैसलों का हवाला देते हुए आपराधिक मामलों में evidence की कसौटी भी समझाई। अदालत ने कहा कि अभियोजन को आरोपों को संदेह से परे साबित करना होता है, जबकि आरोपी से अपने बचाव को उसी स्तर पर साबित करने की अपेक्षा नहीं की जाती। यदि अभियोजन के मामले में उचित संदेह पैदा होता है और आरोपी का बचाव संभावित दिखाई देता है, तो संदेह का लाभ आरोपी को मिल सकता है। 

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में क्या कमी पाई?

हाईकोर्ट के अनुसार ट्रायल कोर्ट ने धारा 306 IPC के तहत दोषसिद्धि करते समय इस बात को पर्याप्त महत्व नहीं दिया कि पति-पत्नी पांच महीने से अधिक समय से संपर्क में नहीं थे। हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने मुख्य रूप से इस तथ्य को देखा कि दोनों के रिश्ते खराब थे, दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ आरोप लगाए थे और महिला ने आत्महत्या से पहले पति तथा उसके परिवार पर दुर्व्यवहार के आरोप लगाए थे। लेकिन अदालत के अनुसार, आत्महत्या के लिए उकसावे का अपराध साबित करने के लिए यह भी दिखाना जरूरी था कि आरोपी ने आत्महत्या से पहले ऐसा कोई सकारात्मक कृत्य किया था, जो महिला को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने वाला हो। रिकॉर्ड में ऐसा पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिला। 

हाईकोर्ट ने क्या अंतिम आदेश दिया?

न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने 31 जुलाई 2026 को अंकुर टंडन की अपील स्वीकार करते हुए 21 सितंबर 2024 के ट्रायल कोर्ट के फैसले और सजा को रद्द कर दिया।

अदालत ने अंकुर टंडन को सभी आरोपों से बरी कर दिया। उसे इस मामले में हिरासत से रिहा करने का निर्देश दिया गया, बशर्ते वह CrPC की धारा 437-A के तहत व्यक्तिगत बॉन्ड और दो जमानतदार प्रस्तुत करे। अदालत ने जमा किया गया जुर्माना भी वापस करने का निर्देश दिया। 


 क्या सिर्फ 5 महीने बात न होने से पति बरी हुआ?

नहीं।  यह कहना अधूरा होगा कि “सिर्फ पांच महीने तक पति-पत्नी की बात नहीं हुई, इसलिए पति बरी हो गया।”

हाईकोर्ट ने कई तथ्यों को एक साथ देखा:

  • 20 अप्रैल 2010 की FIR के बाद पति-पत्नी के बीच संपर्क नहीं था।

  • आत्महत्या 2 अक्टूबर 2010 को हुई, यानी 5 महीने 12 दिन बाद।

  • FIR के बाद दोनों के दोबारा साथ रहने का कोई प्रमाण नहीं मिला।

  • कथित 6 लाख रुपये के दहेज भुगतान को संदेह से परे साबित नहीं किया गया।

  • जमीन की बिक्री और 6 लाख रुपये के कथित भुगतान की तारीख और विवरण स्पष्ट नहीं थे।

  • गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास थे।

  • FIR और बाद की मौखिक गवाही में भी असंगतियां थीं।

  • दोनों सुसाइड नोट में दहेज मांग का उल्लेख नहीं था।

  • धारा 498-A के तहत क्रूरता का पर्याप्त ठोस साक्ष्य नहीं मिला।

  • आत्महत्या से पहले आरोपी की ओर से कोई ऐसा निकटवर्ती सकारात्मक कृत्य साबित नहीं हुआ, जिसे धारा 306 के तहत उकसावा माना जा सके। 

इसलिए हाईकोर्ट का फैसला केवल “पांच महीने तक संपर्क नहीं था” पर आधारित नहीं था, बल्कि अभियोजन के पूरे मामले और साक्ष्यों के समग्र मूल्यांकन पर आधारित था।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि पत्नी की आत्महत्या और वैवाहिक विवाद अपने आप में पति को IPC की धारा 306 के तहत दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अभियोजन को आत्महत्या के लिए उकसावे, प्रेरणा या जानबूझकर सहायता का ठोस साक्ष्य देना होता है और कथित कृत्य का आत्महत्या से पर्याप्त निकट संबंध भी दिखाना होता है। इस मामले में अदालत ने पांच महीने 12 दिन तक पति-पत्नी के बीच संपर्क नहीं होने के साथ-साथ कथित दहेज भुगतान, गवाहों के विरोधाभासी बयान, FIR और मौखिक साक्ष्य में अंतर, सुसाइड नोट तथा धारा 498-A के तहत क्रूरता के आरोपों की भी समीक्षा की। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि को रद्द कर पति को बरी कर दिया।