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चीन के पास ऐसा क्या है जिसके बिना भारत की EV और Defence Industry पर पड़ सकता है असर? शुरू हो रही है ‘Rare Earth’ की बड़ी जंग
दुनिया में अगली बड़ी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा सिर्फ तेल, गैस या सेमीकंडक्टर तक सीमित नहीं रहने वाली। Rare Earth Elements यानी दुर्लभ पृथ्वी तत्व अब इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टर्बाइनों, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरणों और आधुनिक तकनीक के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो चुके हैं। इस पूरी supply chain में चीन का दबदबा बहुत मजबूत है। भारत के पास दुनिया के बड़े rare-earth resources में से एक है, लेकिन खनिजों को high-performance permanent magnets में बदलने की industrial क्षमता अभी सीमित है। यही वजह है कि भारत अब घरेलू उत्पादन, अमेरिका और रूस जैसे देशों के साथ सहयोग तथा नई supply chains के जरिए चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है।
Kalpana Gautam09 अग. 2026, 09:33 PM IST

Rare Earth बन गया अगली वैश्विक रणनीतिक जंग का नया मैदान
दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच अब एक ऐसी प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है, जिसका सीधा संबंध आने वाले वर्षों की EV, Defence, Renewable Energy, Electronics और High-Tech Industry से है।
इस प्रतिस्पर्धा के केंद्र में हैं Rare Earth Elements यानी दुर्लभ पृथ्वी तत्व।
नाम भले ही “Rare Earth” हो, लेकिन इन तत्वों की अहमियत बिल्कुल दुर्लभ नहीं है। इनके बिना आधुनिक तकनीक के कई महत्वपूर्ण उत्पादों का निर्माण मुश्किल और महंगा हो सकता है। खास तौर पर Neodymium, Praseodymium, Dysprosium और Terbium जैसे rare earth elements से बनाए जाने वाले permanent magnets इलेक्ट्रिक वाहन, wind turbines, industrial motors, electronics, aerospace और defence applications में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। IEA के अनुसार rare-earth supply chain में mining से लेकर refining और magnet manufacturing तक चीन का प्रभुत्व असाधारण रूप से मजबूत है।
चीन की असली ताकत खदानों में नहीं, पूरी Supply Chain में है
Rare Earth की कहानी सिर्फ यह नहीं है कि किस देश के पास कितनी जमीन के नीचे खनिज है। पूरी प्रक्रिया कई चरणों में होती है: Mining → Processing → Separation → Oxide Refining → Metal → Alloy → Permanent Magnet
यही वह जगह है जहां चीन की सबसे बड़ी बढ़त दिखाई देती है। IEA के मुताबिक 2024 में चीन के पास magnet rare earths की वैश्विक mining का करीब 60 प्रतिशत, refining का लगभग 91 प्रतिशत और sintered permanent magnets के उत्पादन का करीब 94 प्रतिशत हिस्सा था। यानी अगर किसी देश के पास rare-earth ore मौजूद भी है, तब भी वह अपने दम पर चीन से पूरी तरह स्वतंत्र तभी हो सकता है जब उसके पास ore को अलग करने, refine करने, metal और alloy बनाने तथा अंततः high-performance magnets तैयार करने की क्षमता हो। यही भारत की सबसे बड़ी चुनौती है।
भारत के पास Rare Earth का बड़ा भंडार, फिर समस्या क्या है?
भारत के बारे में अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि देश के पास rare-earth resources नहीं हैं और वह पूरी तरह चीन पर निर्भर है। यह तस्वीर पूरी तरह सही नहीं है। भारत सरकार के अनुसार देश में लगभग 7.23 million tonnes Total Rare Earth Oxide Equivalent (TREO), 13.15 million tonnes monazite resources में मौजूद है। इसके अलावा गुजरात और राजस्थान के hard-rock क्षेत्रों में लगभग 1.29 million tonnes in-situ REE resource दर्ज किया गया है। भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि भारत अपने rare-earth minerals के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं है। लेकिन समस्या आगे की processing chain में है। सरकार के अनुसार भारतीय संसाधनों में rare-earth concentration अपेक्षाकृत कम है और monazite में radioactivity से जुड़ी जटिलताएं extraction को लंबा, कठिन और महंगा बनाती हैं।
असली कमजोरी: Rare Earth Magnet Manufacturing
भारत की सबसे महत्वपूर्ण vulnerability Rare Earth Permanent Magnets में है। 21 जुलाई 2026 को सरकार द्वारा लोकसभा में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, भारत फिलहाल अपनी sintered NdFeB rare-earth permanent magnet की पूरी downstream आवश्यकता के लिए आयात पर निर्भर है। यानी भारत के पास upstream स्तर पर mining, separation और oxide refining की क्षमता है, लेकिन oxide से metal, metal से alloy और alloy से high-performance magnet बनाने की industrial-scale midstream capacity में बड़ा gap है। यही अंतर भारत को चीन जैसी supply-chain power के सामने vulnerable बनाता है।
अगर चीन ने Supply रोक दी तो क्या होगा?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2025 में चीन द्वारा rare-earth export controls लगाने के बाद वैश्विक उद्योगों को supply-chain disruption का सामना करना पड़ा था। IEA के मुताबिक 2025 में चीन के export controls के बाद rare-earth elements और permanent magnets के export volumes में तेज गिरावट आई थी। अमेरिका, यूरोप और अन्य जगहों के कुछ automobile manufacturers को magnets की supply हासिल करने में मुश्किल हुई और कुछ कंपनियों को production कम करने या अस्थायी रूप से रोकने तक की स्थिति का सामना करना पड़ा। यानी rare-earth supply अब सिर्फ व्यापार का विषय नहीं रह गया है। यह Economic Security और National Security का मुद्दा बन चुका है।
भारत की EV Industry के लिए क्यों बड़ा खतरा?
Electric vehicles में powerful permanent magnets का इस्तेमाल electric motors में होता है। भारत में EV market तेजी से बढ़ रहा है और इसी के साथ rare-earth permanent magnets की मांग भी बढ़ने की संभावना है। सरकार के जुलाई 2026 के आकलन के अनुसार, भारत में 2030 तक REPM की कुल मांग करीब 8,220 metric tonnes per annum तक पहुंच सकती है।
इसमें अनुमानित मांग इस प्रकार है:
- Electric Vehicles: 3,250 MTPA
- Wind Turbines: 1,800 MTPA
- BLDC Fans: 980 MTPA
- Smartphones और Computers: 600 MTPA
- Industrial Motors: 500 MTPA
- Solar-powered Pumps: 170 MTPA
- Elevators और Escalators: 100 MTPA
- अन्य Consumer Electronics: 820 MTPA
कुल अनुमानित मांग: 8,220 MTPA।
इसका मतलब साफ है—rare-earth magnet की supply में बड़ा disruption हुआ तो इसका असर सिर्फ एक उद्योग पर नहीं बल्कि EV से लेकर electronics और renewable energy तक कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
भारत ने शुरू कर दी है चीन पर निर्भरता कम करने की तैयारी
भारत सरकार ने नवंबर 2025 में ₹7,280 करोड़ की Rare Earth Permanent Magnet Manufacturing Scheme को मंजूरी दी थी। इस योजना का लक्ष्य भारत में 6,000 MTPA की integrated rare-earth permanent magnet manufacturing capacity तैयार करना है। इस योजना में sales-linked incentives और capital subsidy भी शामिल हैं। इसका उद्देश्य EV, renewable energy, electronics, aerospace और defence जैसे क्षेत्रों के लिए घरेलू supply chain मजबूत करना है। जून 2026 में इस योजना के तहत manufacturers के चयन के लिए global tender की bid submission timeline भी बढ़ाई गई थी। भारत ने Hyderabad के ARCI में Nd-Fe-B यानी Neodymium-Iron-Boron permanent magnets के निर्माण के लिए pilot plant भी स्थापित किया है।
भारत की रणनीति सिर्फ घरेलू खनन तक सीमित नहीं
भारत समझ चुका है कि rare-earth security के लिए सिर्फ देश में मौजूद खनिज पर्याप्त नहीं होंगे। इसीलिए भारत alternative international supply chains पर भी काम कर रहा है।
अमेरिका के साथ साझेदारी
26 मई 2026 को भारत और अमेरिका ने Critical Minerals और Rare Earths की mining और processing supply chains सुरक्षित करने के लिए framework पर हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य critical minerals की supply को मजबूत करना और processing तथा downstream value chains में सहयोग बढ़ाना है।
रूस के साथ संभावित सहयोग
जून 2026 में Reuters ने रिपोर्ट किया कि भारत की सरकारी कंपनी IREL, रूस की Rosneft के साथ Siberia स्थित Tomtor rare-earth deposit से samples हासिल करने को लेकर बातचीत कर रही थी। Tomtor को दुनिया के बड़े undeveloped rare-earth deposits में गिना जाता है। भारत इस deposit के mineral composition का अध्ययन करना चाहता है ताकि आगे संभावित सहयोग का आकलन किया जा सके। इससे संकेत मिलता है कि भारत अपनी rare-earth strategy को domestic resources + overseas assets + strategic partnerships के मॉडल पर आगे बढ़ाना चाहता है।
यह सिर्फ भारत-चीन की लड़ाई नहीं है
“Rare Earth War” को केवल भारत बनाम चीन के रूप में देखना भी सही नहीं होगा। असल में अमेरिका, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कई अन्य देश भी चीन की अत्यधिक supply-chain dominance को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। IEA का कहना है कि rare-earth supply chain दुनिया की सबसे concentrated critical-mineral supply chains में से एक है। China की refining और magnet manufacturing में हिस्सेदारी इतनी बड़ी है कि supply disruption का असर automotive, electronics, defence, energy और data-centre जैसे क्षेत्रों पर पड़ सकता है। अमेरिका भी घरेलू critical-mineral production और processing में अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है। अगस्त 2026 में अमेरिकी प्रशासन ने critical minerals और battery projects के लिए करीब $3 billion के निवेश की घोषणा की, जिसका एक उद्देश्य Chinese supply chains पर निर्भरता कम करना है। इसलिए आने वाले वर्षों में competition सिर्फ किसके पास खदान है पर नहीं होगी।
प्रतिस्पर्धा इस बात पर होगी कि:
किसके पास खनन है?
किसके पास processing technology है?
किसके पास refining क्षमता है?
किसके पास magnets बनाने की technology है?
और कौन पूरी supply chain को नियंत्रित करता है?
क्या भारत चीन पर निर्भरता खत्म कर सकता है?
यह संभव है, लेकिन आसान नहीं। भारत के पास resources हैं और सरकार ने domestic manufacturing capacity बनाने के लिए बड़ा financial push भी दिया है। लेकिन mining से लेकर commercial-scale magnet production तक एक पूरी industrial ecosystem तैयार करने में समय लगेगा। भारत की 2030 तक की projected REPM demand 8,220 tonnes प्रति वर्ष है, जबकि सरकार की मौजूदा scheme के तहत प्रस्तावित integrated manufacturing capacity 6,000 tonnes प्रति वर्ष है। इसलिए केवल capacity निर्माण ही पर्याप्त नहीं होगा; भारत को mining, separation, refining, alloy production, magnet manufacturing, recycling और technology development—पूरी value chain को मजबूत करना होगा।
निष्कर्ष: अगली बड़ी जंग तेल की नहीं, Technology की हो सकती है
दुनिया में अगर 20वीं सदी की रणनीतिक ताकत को तेल ने परिभाषित किया था, तो 21वीं सदी में critical minerals और advanced manufacturing भी उतने ही महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। Rare Earth Elements इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। भारत के पास जमीन के नीचे rare-earth resources हैं, लेकिन असली चुनौती उन संसाधनों को high-value products और powerful permanent magnets में बदलने की है। चीन ने इस पूरी value chain में वर्षों तक निवेश करके मजबूत स्थिति बनाई है। अब भारत, अमेरिका, यूरोप और दूसरे देश alternative supply chains बनाने की कोशिश कर रहे हैं। भारत के लिए यह सिर्फ चीन से आयात कम करने का मामला नहीं है। यह EV manufacturing, renewable energy, electronics, aerospace, defence और भविष्य की high-tech economy की strategic security का सवाल है। इसलिए “Rare Earth War” को किसी सैन्य युद्ध के रूप में नहीं, बल्कि खनिज, technology, manufacturing और global supply-chain control की बढ़ती geopolitical competition के रूप में समझना ज्यादा सही होगा। और आने वाले वर्षों में यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण होगा—
“भारत के पास Rare Earth का खजाना है… लेकिन क्या भारत उसके दम पर दुनिया की अगली technology race में आत्मनिर्भर बन पाएगा?”
