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कल्याण कोर्ट का बड़ा आदेश: वकील की फीस दबाना पड़ा भारी! 35 हजार रुपये पर 6% ब्याज, एक महीने में भुगतान का निर्देश
कल्याण कोर्ट से वकील की फीस को लेकर आया यह फैसला सीधे तौर पर मुवक्किलों के लिए भी बड़ा संदेश देता है। 50 हजार रुपये की तय फीस में से सिर्फ 15 हजार रुपये देने और बाकी 35 हजार रुपये का भुगतान नहीं करने का विवाद आखिरकार अदालत पहुंचा। मुवक्किल के सुनवाई में पेश नहीं होने के बाद मामला एकतरफा चला और अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर बकाया फीस चुकाने का आदेश दिया। अब सिर्फ 35 हजार रुपये ही नहीं, बल्कि उस पर 6 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा। अदालत ने पूरी रकम एक महीने के भीतर चुकाने का निर्देश दिया है।

कल्याण में वकील की बकाया फीस को लेकर सामने आए एक मामले में अदालत ने मुवक्किल को राहत देने के बजाय अधिवक्ता के पक्ष में फैसला सुनाया है। मामले में तय 50 हजार रुपये की पेशेवर फीस में से केवल 15 हजार रुपये का भुगतान किया गया था। बाकी 35 हजार रुपये की रकम को लेकर विवाद अदालत तक पहुंचा। सुनवाई के दौरान प्रतिवादी के अदालत में उपस्थित नहीं होने के बाद मामला एकतरफा चला और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने बकाया रकम 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ चुकाने का आदेश दिया। उपलब्ध रिपोर्टों और न्यायिक रिकॉर्ड से जुड़े स्रोतों की जांच में मामले के कई महत्वपूर्ण विवरण सामने आए हैं। हालांकि, इस विशेष आदेश की प्रमाणित प्रति और आदेश की सटीक तारीख सार्वजनिक रूप से स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हो सकी है, इसलिए आदेश की तारीख को लेकर कोई अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।
क्या है पूरा मामला?
मामला अधिवक्ता हरीश हरिदास नायर और उमेश रमेश भोईर के बीच पेशेवर फीस के विवाद से जुड़ा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, नायर ने भोईर की ओर से एक वैवाहिक मामले में पैरवी की थी। इस मामले से संबंधित मूल कार्यवाही Marriage Petition No. 678/2022 बताई गई है। वकील और मुवक्किल के बीच पेशेवर फीस 50 हजार रुपये तय हुई थी। लेकिन मुवक्किल की ओर से पूरी फीस का भुगतान नहीं किया गया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 50 हजार रुपये में से केवल 15 हजार रुपये दिए गए और 35 हजार रुपये बकाया रह गए।
बार-बार मांग के बाद भी नहीं मिली फीस
बकाया 35 हजार रुपये के भुगतान के लिए अधिवक्ता की ओर से मुवक्किल से रकम मांगी गई। लेकिन भुगतान नहीं होने के बाद फीस की वसूली के लिए सिविल मुकदमा दायर किया गया। इस मामले की पहचान Regular Civil Suit No. 122/2024 के रूप में सामने आती है। यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उपलब्ध रिपोर्ट में मूल वैवाहिक कार्यवाही का वर्ष 2022 और फीस वसूली के मुकदमे का केस नंबर 122/2024 दिया गया है। इसलिए दोनों को एक ही वर्ष का मुकदमा मानना सही नहीं होगा।
समन के बावजूद कोर्ट नहीं पहुंचा मुवक्किल
मामले की सुनवाई के दौरान प्रतिवादी उमेश रमेश भोईर को समन जारी किया गया था। लेकिन उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार वह अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं हुए। इसके बाद कार्यवाही ex parte यानी एकतरफा आगे बढ़ी। अधिवक्ता हरीश नायर ने अपने दावे के समर्थन में मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य पेश किए। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद बकाया पेशेवर फीस के दावे को स्वीकार किया।
18% ब्याज मांगा गया था, कोर्ट ने 6% मंजूर किया
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू ब्याज से जुड़ा है। अधिवक्ता की ओर से बकाया 35 हजार रुपये पर 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की मांग की गई थी। हालांकि, अदालत ने पूरी मांग स्वीकार नहीं की और 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया। यानी मुवक्किल को 35 हजार रुपये की मूल बकाया फीस के साथ अदालत द्वारा निर्धारित 6 प्रतिशत ब्याज भी देना होगा। यह ब्याज मुकदमा दायर किए जाने की तारीख से वास्तविक भुगतान होने तक लागू रहने का निर्देश बताया गया है।
एक महीने में रकम चुकाने का आदेश
अदालत ने बकाया 35 हजार रुपये और उस पर लागू ब्याज की रकम का भुगतान एक महीने के भीतर करने का निर्देश दिया है।
इस तरह मामला सिर्फ 35 हजार रुपये की फीस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भुगतान में देरी के कारण ब्याज की देनदारी भी जुड़ गई।
आदेश किस कोर्ट ने दिया?
मामला कल्याण की सिविल अदालत से संबंधित है और उपलब्ध विवरण में अदालत को Civil Judge, Junior Division, Kalyan के रूप में बताया गया है। मामले में न्यायाधीश के रूप में संतोष आग्रे का नाम सामने आता है। स्वतंत्र न्यायिक डेटाबेस में भी अधिवक्ता हरीश हरिदास नायर का कल्याण क्षेत्र की अदालतों में मामलों से जुड़ा रिकॉर्ड मिलता है। वहीं बॉम्बे हाईकोर्ट की उपलब्ध अधिवक्ता सूची में भी हरीश हरिदास नायर का नाम दर्ज है।
क्या वकील अपनी फीस की वसूली के लिए अदालत जा सकता है?
वकील और मुवक्किल के बीच फीस का विवाद होने पर मामला सिविल दावे के रूप में अदालत के सामने आ सकता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर फीस विवाद में वकील का दावा स्वतः स्वीकार हो जाएगा। अदालत को यह देखना होता है कि फीस कितनी तय हुई थी, भुगतान कितना किया गया, कितनी रकम बकाया है और दावे के समर्थन में कौन से दस्तावेज और साक्ष्य उपलब्ध हैं।
इस मामले में उपलब्ध जानकारी के अनुसार अदालत ने वकील के दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्यों के आधार पर बकाया फीस का दावा स्वीकार किया।
इस मामले की सबसे अहम बातें
• तय पेशेवर फीस 50 हजार रुपये थी।
• मुवक्किल ने 15 हजार रुपये का भुगतान किया।
• 35 हजार रुपये बकाया रह गए।
• मूल मामला Marriage Petition No. 678/2022 से संबंधित था।
• फीस की वसूली के लिए Regular Civil Suit No. 122/2024 सामने आता है।
• प्रतिवादी अदालत में उपस्थित नहीं हुआ और कार्यवाही ex parte आगे बढ़ी।
• वकील ने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य पेश किए।
• 18 प्रतिशत ब्याज की मांग की गई थी।
• अदालत ने 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज मंजूर किया।
• ब्याज मुकदमा दायर करने की तारीख से वास्तविक भुगतान तक बताया गया है।
• भुगतान के लिए एक महीने की समयसीमा दी गई।
