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TV Today को सुप्रीम कोर्ट का झटका: ‘Public Function नहीं करते’ वाली दलील खारिज, नाबालिग की निजता भंग पर ₹5 लाख मुआवजा बरकरार
‘हम Public Function नहीं करते’—TV Today की यह दलील सुप्रीम कोर्ट में नहीं चली। नाबालिग यौन अपराध पीड़िता की पहचान उजागर होने के मामले में ₹5 लाख मुआवजे के खिलाफ TV Today Network की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने मीडिया की संवैधानिक भूमिका पर ऐसी टिप्पणियां कीं, जो आने वाले समय में निजी मीडिया संस्थानों के खिलाफ Article 226 की कार्यवाही को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा सकती हैं। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने Public Function और Sovereign Function के बीच अंतर समझाया, जबकि CJI सूर्यकांत ने कहा कि मीडिया को सार्वजनिक महत्व की अपनी भूमिका स्वीकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए।

नई दिल्ली, 10 अगस्त 2026:
सुप्रीम कोर्ट ने TV Today Network Limited की उस चुनौती को खारिज कर दिया है, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत नाबालिग यौन अपराध पीड़िता की निजता और गोपनीयता के अधिकार के उल्लंघन के मामले में ₹5 लाख का मुआवजा बरकरार रखा गया था। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने TV Today की दलील को स्वीकार नहीं किया कि एक निजी मीडिया संस्था को Article 226 के तहत रिट jurisdiction के दायरे में नहीं लाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष को बरकरार रखा कि समाचार और सूचनाओं का प्रसार करना मीडिया का सार्वजनिक महत्व वाला कार्य है और इस कार्य के निर्वहन के दौरान मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर संवैधानिक न्यायिक उपाय उपलब्ध हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई 10 अगस्त 2026 को TV TODAY NETWORK LIMITED v. ABC AND ORS., SLP(C) No. 27299/2026 में हुई।
सुप्रीम कोर्ट में TV Today ने क्या कहा?
TV Today की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने मुख्य रूप से maintainability का सवाल उठाया। उनका तर्क था कि दिल्ली हाईकोर्ट ने यह मानने में गलती की कि मीडिया ‘public function’ करता है और इस आधार पर निजी ब्रॉडकास्टर को Article 226 के तहत रिट jurisdiction में लाया जा सकता है। बचाव पक्ष ने यह आशंका भी जताई कि यदि निजी मीडिया संस्थानों को Article 226 के दायरे में माना गया तो भविष्य में मीडिया संगठनों के खिलाफ बड़ी संख्या में writ petitions दाखिल हो सकती हैं और इससे ‘floodgates’ खुल जाएंगे।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस तर्क से सहमत नहीं हुआ। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि जब प्रेस Article 19(1)(a) में निहित freedom of speech and expression के संवैधानिक ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा है, तो अपने कार्य को public function मानने में मीडिया को आपत्ति क्यों होनी चाहिए। उन्होंने public function और sovereign function के बीच अंतर भी रेखांकित किया। CJI सूर्यकांत ने भी कहा कि मीडिया को सार्वजनिक महत्व का अपना कार्य स्वीकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए। अदालत ने यह संकेत दिया कि public function को केवल मुकदमे से बचने के लिए नकारना उचित नहीं है।
‘Floodgates खुलेंगे’... सुप्रीम कोर्ट ने दिया दो टूक जवाब
TV Today की ओर से बार-बार यह दलील दी गई कि इस फैसले के बाद ऐसे मामलों में रिट याचिकाओं की बाढ़ आ सकती है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दिए गए जवाब को सही माना। सुनवाई के दौरान जब इस आशंका को दोहराया गया कि फैसला कई समान याचिकाओं का रास्ता खोल सकता है, तो पीठ ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की- “We encourage it.” अर्थात यदि किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का मामला है और कानून Article 226 के तहत remedy उपलब्ध कराता है, तो केवल इस आशंका के कारण अदालत दरवाजा बंद नहीं करेगी।
लेकिन असली मामला सिर्फ ‘मीडिया की जवाबदेही’ नहीं है
इस पूरे विवाद की जड़ 2005 की एक घटना में है। 2 अगस्त 2005 को एक नाबालिग लड़की की ओर से उसके पिता के खिलाफ FIR दर्ज कराई गई थी। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार आरोप IPC की धारा 354 और 506 के तहत दर्ज किए गए थे। इसके बाद मामला मीडिया में आया। Aaj Tak की टीम 7 अगस्त 2005 को पीड़िता के घर पहुंची और इंटरव्यू लेने का प्रयास किया। पीड़िता की मां ने चैनल से बातचीत करने और कार्यक्रम में सहयोग करने से इनकार कर दिया। इसके बावजूद चैनल ने ऐसा प्रसारण किया जिसमें कई ऐसे विवरण शामिल थे जिनको जोड़कर बच्ची की पहचान की जा सकती थी। इनमें कथित तौर पर पिता का नाम, उनका आधिकारिक पद, नौकरी से संबंधित विवरण, परिवार के रहने वाले इलाके से जुड़ी जानकारी, घर के दृश्य और मां की आवाज जैसे विवरण शामिल थे। यहीं से शुरू हुआ Privacy बनाम Media Freedom का संवैधानिक विवाद
मामला केवल इस सवाल तक सीमित नहीं रहा कि चैनल ने गलत रिपोर्टिंग की या नहीं। बड़ा सवाल यह बना कि क्या एक निजी मीडिया कंपनी के खिलाफ Article 226 के तहत High Court में writ petition दाखिल की जा सकती है?
TV Today का कहना था कि वह निजी कंपनी है और Article 226 के तहत रिट jurisdiction उसके खिलाफ लागू नहीं होनी चाहिए। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। 1 जुलाई 2026 को Justice C. Hari Shankar और Justice Om Prakash Shukla की Division Bench ने LPA 264/2013 में TV Today की appeal खारिज कर दी। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- संस्था नहीं, ‘Function’ देखिए हाईकोर्ट के फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात ‘function test’ है।
अदालत ने कहा कि Article 226 की maintainability का सवाल केवल इस आधार पर तय नहीं किया जा सकता कि सामने वाला व्यक्ति या संस्था सरकारी है या निजी।
मुख्य सवाल यह है कि संबंधित संस्था कौन-सा function कर रही है और जिस कार्य को चुनौती दी गई है, क्या वह public function या public duty के दायरे में आता है।
यानी किसी निजी संस्था को सिर्फ इसलिए Article 226 से बाहर नहीं किया जा सकता कि वह private entity है। हाईकोर्ट ने अपने 76-पेज के फैसले में इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का विस्तृत विश्लेषण किया।
Andi Mukta से Zee Telefilms तक... Supreme Court के पुराने फैसलों का सहारा
दिल्ली हाईकोर्ट ने Article 226 और private bodies की writ liability के सवाल पर कई महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का सहारा लिया।
इनमें प्रमुख हैं:
Andi Mukta Sadguru v. V.R. Rudani
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि Article 226 के तहत private authority के खिलाफ भी writ जारी हो सकती है, यदि वह public function या public duty का निर्वहन कर रही हो।
Zee Telefilms v. Union of India
हाईकोर्ट ने इस Constitutional Bench के फैसले को भी महत्वपूर्ण माना। BCCI को Article 12 के तहत ‘State’ न मानने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि public duties से जुड़े मामलों में Article 226 का रास्ता उपलब्ध हो सकता है।
Ramesh Ahluwalia v. State of Punjab
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘function test’ पर जोर दिया था। यानी संस्था public है या private, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह कौन-सा function कर रही है।
Ramakrishna Mission v. Kago Kunya
इस फैसले में public function और purely private function के बीच अंतर को समझाया गया।
S. Shobha v. Muthoot Finance
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस हालिया सुप्रीम कोर्ट फैसले को भी ध्यान में रखा और कहा कि Article 226 की maintainability body की प्रकृति से नहीं बल्कि उसके function और उस function में मौजूद public law element से तय होती है। हाईकोर्ट ने इन सभी precedents को मिलाकर कहा कि इस मामले में TV Today द्वारा news dissemination किया जाना public function के रूप में देखा जा सकता है।
हाईकोर्ट का अहम निष्कर्ष- News disseminate करना भी Public Function
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि यदि मीडिया समाचार प्रसारित करने के अपने public function को इस तरह करता है कि संबंधित व्यक्ति के fundamental rights प्रभावित होते हैं, तो अदालत यह जांच सकती है कि public function constitutional तरीके से निभाया गया या नहीं। अदालत के अनुसार TV Today का कार्य केवल एक निजी commercial activity के रूप में नहीं देखा जा सकता था, क्योंकि विवाद उस तरीके से जुड़ा था जिस तरीके से उसने जनता तक समाचार पहुंचाने के अपने कार्य का निर्वहन किया। यानी Article 226 का इस्तेमाल यहां किसी सामान्य private dispute को सुलझाने के लिए नहीं, बल्कि alleged fundamental-right violation और public function के proper discharge से जुड़ा था।
‘No means no’- मां के इनकार को हाईकोर्ट ने माना बेहद महत्वपूर्ण
फैसले का एक बेहद अहम पहलू मां द्वारा मीडिया से बातचीत से साफ इनकार करना था।
हाईकोर्ट ने माना कि परिवार ने जब मीडिया से सहयोग नहीं करने का स्पष्ट निर्णय लिया था, तब चैनल को उस इच्छा का सम्मान करना चाहिए था।
अदालत ने इसी संदर्भ में कहा- “No means no.” इसका अर्थ यह था कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति को अपनी निजी जानकारी या अपने परिवार की संवेदनशील जानकारी मीडिया के सामने देने के लिए मजबूर करने का अधिकार नहीं देती। TRP के लिए Privacy से समझौता? हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रसारण के तरीके को लेकर TV Today पर कड़ी टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा कि यह मामला ऐसा प्रतीत होता है जिसमें अधिक TRP हासिल करने की कोशिश में बच्चे के अधिकारों की अनदेखी हुई। हाईकोर्ट ने broadcaster के व्यवहार को बेहद गंभीर बताते हुए fundamental rights के प्रति “woeful lack of understanding” जैसी कड़ी टिप्पणी की।
यह टिप्पणी इस बात को रेखांकित करती है कि अदालत की नजर में मीडिया की जिम्मेदारी केवल तथ्य जुटाकर प्रसारित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि sensitive cases में रिपोर्टिंग के संवैधानिक प्रभावों को भी देखना होगा।
Press Council के Journalistic Norms भी बने अहम आधार
दिल्ली हाईकोर्ट ने Press Council of India की Norms of Journalistic Conduct को भी अपने विश्लेषण में महत्व दिया। इन norms के अनुसार किसी व्यक्ति की privacy में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि उसके पीछे genuine overriding public interest न हो। विशेष रूप से sexual assault से जुड़े बच्चों के मामलों में ऐसी जानकारी प्रकाशित या प्रसारित नहीं की जानी चाहिए जिससे पीड़ित की पहचान उजागर हो सकती हो। हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में ऐसे कई विवरण एक साथ प्रसारित किए गए जिनसे बच्ची की पहचान का पता लगाया जा सकता था और overriding public interest का कोई पर्याप्त आधार सामने नहीं आया।
एक महत्वपूर्ण कानूनी पेच: घटना 2005 की थी, POCSO 2012 में आया
इस मामले में एक दिलचस्प कानूनी पहलू यह भी था कि घटना वर्ष 2005 की थी, जबकि Protection of Children from Sexual Offences यानी POCSO Act वर्ष 2012 में लागू हुआ। इसलिए हाईकोर्ट ने इस मामले को POCSO की मौजूदा statutory framework के आधार पर सीधे तय नहीं किया। अदालत ने Article 21 के तहत privacy और dignity के संवैधानिक अधिकार को स्वतंत्र आधार के रूप में देखा। हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि इस मामले में IPC की धारा 228A को लेकर जो मुद्दा उठाया गया था, उसे पीड़िता की ओर से अंततः press नहीं किया गया। इसलिए फैसले का मुख्य संवैधानिक आधार Article 19 और Article 21 तथा public-law principles रहे।
Privacy केवल कानून की किताब का अधिकार नहीं
हाईकोर्ट ने privacy को Article 21 के तहत fundamental right के रूप में देखा और Supreme Court के privacy jurisprudence का सहारा लिया।
फैसले में यह महत्वपूर्ण बात सामने आई कि privacy केवल State के खिलाफ सुरक्षा नहीं है। कुछ परिस्थितियों में private actors द्वारा fundamental rights के उल्लंघन के खिलाफ भी judicial remedies उपलब्ध हो सकती हैं। हाईकोर्ट ने Kaushal Kishor और अन्य सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का संदर्भ लेते हुए fundamental rights के horizontal application की अवधारणा पर चर्चा की। इसी वजह से इस फैसले को केवल ‘media law’ का फैसला नहीं बल्कि constitutional law में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या Article 226 का मतलब है कि हर निजी कंपनी पर writ चलेगी?
नहीं।
यही इस पूरे मामले को समझने का सबसे जरूरी हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट की jurisprudence के अनुसार केवल private company होना Article 226 से immunity नहीं देता, लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि हर private dispute को writ petition में बदल दिया जाएगा।
अदालत को मुख्य रूप से देखना होगा:
• क्या संबंधित संस्था public function या public duty कर रही है?
• क्या challenged action उसी public function से जुड़ा है?
• क्या मामले में public law element मौजूद है?
• क्या किसी fundamental right या statutory/public obligation का उल्लंघन हुआ है?
• क्या मांगी गई relief public function के proper discharge से जुड़ी है?
दिल्ली हाईकोर्ट ने खास तौर पर कहा कि केवल यह तथ्य पर्याप्त नहीं है कि संस्था public function करती है। जिस action को चुनौती दी जा रही है और मांगी गई relief का उस public function से संबंध भी होना चाहिए।
₹5 लाख compensation क्यों?
यह रकम किसी सामान्य defamation damages के रूप में नहीं बल्कि constitutional/public-law compensation के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट ने माना कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में constitutional courts उचित परिस्थितियों में monetary compensation दे सकती हैं। TV Today को ₹5 लाख compensation देने का Single Judge का आदेश Division Bench ने बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि केवल इस आधार पर writ remedy को रोका नहीं जा सकता कि पीड़िता के पास civil suit जैसे अन्य remedies उपलब्ध थे। Article 226 की remedy, appropriate public-law case में, ordinary civil remedies के अतिरिक्त उपलब्ध हो सकती है।
Disputed facts की दलील भी खारिज
TV Today की ओर से यह भी तर्क दिया गया था कि मामले में disputed questions of fact हैं और ऐसे विवाद का निपटारा writ jurisdiction में नहीं होना चाहिए।
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि इस मामले में उपलब्ध सामग्री के आधार पर constitutional issue को तय किया जा सकता था और केवल disputed facts का दावा Article 226 की jurisdiction को स्वतः समाप्त नहीं करता। Indian Express ने बताया- यह फैसला Media Litigation का landscape बदल सकता है Indian Express की legal analysis ने इस फैसले को press freedom, right to privacy और media के खिलाफ litigation के रास्तों के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया। विश्लेषण में यह भी रेखांकित किया गया कि यह फैसला fundamental rights के ‘horizontal application’ की बहस को आगे बढ़ाता है।
यानी मौलिक अधिकारों का संरक्षण केवल State action तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि कुछ परिस्थितियों में private entities के actions तक भी संवैधानिक scrutiny पहुंच सकती है।
क्यों महत्वपूर्ण है सुप्रीम कोर्ट का 10 अगस्त का आदेश?
दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला पहले ही मीडिया की public function वाली स्थिति को स्पष्ट कर चुका था। अब सुप्रीम कोर्ट ने TV Today की challenge खारिज कर उस स्थिति में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। इसका व्यावहारिक संदेश यह है कि निजी मीडिया संस्था यह कहकर Article 226 की scrutiny से पूरी तरह बच नहीं सकती कि वह सरकारी संस्था नहीं है। लेकिन यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट की 10 अगस्त की कार्यवाही में मुख्य मुद्दा TV Today की challenge को खारिज करना था। इसलिए इसे इस तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट ने हर निजी मीडिया विवाद में Article 226 को स्वतः लागू करने का कोई blanket rule बना दिया है।
असल कसौटी अभी भी वही है- public function, public duty, public law element और challenged action का उस function से सीधा संबंध।
मीडिया के लिए बड़ा संदेश: Freedom के साथ Constitutional Responsibility भी
यह फैसला भारतीय मीडिया के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है। लेकिन इसी स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी आती है।
खासकर sexual assault, child abuse और अन्य sensitive मामलों में किसी पीड़ित या survivor की पहचान अप्रत्यक्ष रूप से भी उजागर न हो, यह पत्रकारिता की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। नाम छिपा देने भर से जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। यदि नाम, पता, परिवार, नौकरी, locality, visuals, आवाज या अन्य विवरणों को जोड़कर पीड़ित की पहचान आसानी से की जा सकती है, तो ऐसी रिपोर्टिंग भी privacy और dignity के सवाल खड़े कर सकती है। यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा takeaway है।
