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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 20 लोगों की उम्रकैद पर नहीं लगी मुहर, बॉम्बे HC का बरी करने वाला फैसला बरकरार

एक हत्या, 23 आरोपी, 20 को उम्रकैद और फिर हाईकोर्ट से सभी बरी… अब सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसा फैसला सुनाया है जिसने पूरे मामले की दिशा ही बदल दी। 2014 के महाराष्ट्र के वाशिम हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने 20 आरोपियों की उम्रकैद बहाल करने की मांग ठुकराते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के बरी करने के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया। गवाहों के बयानों में असाधारण समानता से लेकर मेडिकल सबूतों से टकराव, स्वतंत्र गवाहों की गैर-मौजूदगी और जांच की खामियों तक—ऐसे कई सवाल सामने आए, जिनके चलते अभियोजन की कहानी पर ही संदेह गहराता गया। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि हत्या कैसे हुई, बल्कि यह है कि क्या अभियोजन हर आरोपी की भूमिका को अदालत के सामने संदेह से परे साबित कर पाया था?

Sonali10 अग. 2026, 05:37 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 20 लोगों की उम्रकैद पर नहीं लगी मुहर, बॉम्बे HC का बरी करने वाला फैसला बरकरार

नई दिल्ली।

 सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के वाशिम जिले में 2014 के एक हत्या और मारपीट के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें 20 आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित की मां और महाराष्ट्र सरकार की ओर से दाखिल अपीलों को खारिज करते हुए कहा कि हाईकोर्ट का फैसला ऐसा नहीं है जिसे अनुच्छेद 136 के तहत हस्तक्षेप करके पलटा जाए। यह फैसला 3 अगस्त 2026 को जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सुनाया।


मामला क्या था?

यह मामला महाराष्ट्र के वाशिम जिले के मनोरा थाना क्षेत्र के नाइक नगर का है। अभियोजन के मुताबिक 18 मार्च 2014 को होली के दिन दोपहर करीब 1 बजे अविनाश नाम का युवक सोमनाथ नगर में अपनी दादी से मिलने गया था। वहां डीजे बजाने को लेकर उसका कुछ लोगों से विवाद हुआ। इसके बाद शाम करीब 4 बजे अविनाश अपने पिता, भाई और एक रिश्तेदार के साथ कार से नाइक नगर स्थित अपने घर लौटा। आरोप था कि वहां कई लोगों ने उन्हें घेर लिया और घर से करीब 150 फीट दूर ले जाकर लोहे की पाइप, लोहे की रॉड और लकड़ी के डंडों से हमला किया। इस हमले में अविनाश की मौके पर मौत हो गई, जबकि तीन अन्य लोग घायल हुए।


FIR में 21 लोगों के नाम

अविनाश की मां निर्मला बाई की मौखिक शिकायत पर उसी दिन शाम 5:15 बजे FIR दर्ज की गई। इसमें IPC की धारा 302, 307, 147, 148 और 149 के साथ बॉम्बे पुलिस एक्ट की धारा 135 के तहत मामला दर्ज हुआ। शिकायत में 21 लोगों के नाम लिए गए थे और कथित तौर पर प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका, हथियार और किस व्यक्ति को पकड़ा गया था, उसका विवरण दिया गया था। 


ट्रायल कोर्ट ने 20 आरोपियों को सुनाई थी उम्रकैद

जांच के बाद 23 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। ट्रायल के दौरान अभियोजन ने 29 गवाह पेश किए, जिनमें तीन घायल गवाह और तीन प्रत्यक्षदर्शी शामिल थे। एक आरोपी की ट्रायल के दौरान मौत हो गई। 10 अगस्त 2018 को ट्रायल कोर्ट ने 20 आरोपियों को IPC की धारा 302 सहपठित धारा 149 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके अलावा धारा 307/149 के तहत तीन मामलों में सात-सात साल की कठोर कैद और धारा 147 व 148 के तहत भी सजा दी गई। सभी सजाएं साथ-साथ चलनी थीं।


फिर हाईकोर्ट ने पलट दिया फैसला

दोषी ठहराए गए आरोपियों ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच का रुख किया। हाईकोर्ट ने पूरे साक्ष्य की दोबारा समीक्षा करते हुए 2 फरवरी 2022 को सभी छह अपीलों को मंजूर कर लिया और आरोपियों को बरी कर दिया। हाईकोर्ट के अनुसार अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा।


सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचा मामला?

हाईकोर्ट के बरी करने के फैसले के खिलाफ मृतक की मां और महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या हाईकोर्ट का बरी करने का निष्कर्ष ऐसा था जिसमें शीर्ष अदालत को अनुच्छेद 136 के तहत हस्तक्षेप करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड और निचली अदालतों के फैसलों की समीक्षा की।


गवाहों के बयान में 23 आरोपियों की भूमिका तक एक जैसी

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक गवाहों की गवाही थी। छह गवाहों ने घटना का वर्णन किया, जिनमें तीन घायल गवाह भी थे। अदालत ने पाया कि गवाहों के बयानों में 23 आरोपियों के नाम, उनके हथियार, किस व्यक्ति को किसने पकड़ा और शरीर के किस हिस्से पर वार किया गया—इन सभी विवरणों में असाधारण समानता थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामान्य तौर पर एक ही घटना को अलग-अलग स्थानों से देखने वाले लोगों के बयानों में व्यक्तिगत अनुभव के कारण कुछ अंतर होना स्वाभाविक है। लेकिन इस मामले में 23 लोगों की भूमिकाओं तक का अत्यधिक समान और लगभग एक जैसा विवरण अदालत के लिए गंभीर संदेह का कारण बना। कोर्ट ने कहा कि ऐसा stereotyped या identical version tutoring की आशंका पैदा कर सकता है।


घायल गवाह होना हर बात की गारंटी नहीं

अदालत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर स्पष्ट किया। घायल गवाह की घटना में मौजूदगी और उस पर हुए हमले की गवाही को महत्व मिल सकता है, लेकिन केवल घायल होने के कारण वह 23 अलग-अलग आरोपियों की सटीक भूमिका बताने वाला स्वतः विश्वसनीय गवाह नहीं बन जाता। कोर्ट ने कहा कि किसी गवाह का घायल होना उसकी मौजूदगी को मजबूत कर सकता है, लेकिन इससे उसके द्वारा हर आरोपी की भूमिका का बारीकी से दिया गया विवरण स्वतः विश्वसनीय नहीं हो जाता।


मेडिकल रिपोर्ट ने अभियोजन की कहानी से पैदा किया बड़ा विरोधाभास

सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल और प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य के बीच कथित टकराव को बेहद महत्वपूर्ण माना। गवाहों के अनुसार चार आरोपियों ने अविनाश के सिर पर लोहे की पाइप से लगातार वार किए थे। लेकिन पोस्टमार्टम में सिर पर केवल 2x4 सेंटीमीटर की एक लaceration और उसके नीचे frontal bone fracture दर्ज था। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने जिरह में कहा था कि चार लोग यदि 2-3 मिनट तक अलग-अलग पाइप से लगातार सिर पर वार करें तो कई चोटें हो सकती हैं; हालांकि सभी वार एक ही जगह पड़ें तो एक चोट भी संभव है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने इस मेडिकल साक्ष्य से निकले विरोधाभास को प्रासंगिक रूप से देखा था।


आंख बाहर निकलने और दांत टूटने के दावे पर भी सवाल

मामले में एक घायल गवाह के संबंध में अन्य गवाहों ने दावा किया था कि उसकी आंख की पुतली बाहर निकल गई थी और उसके दांत टूट गए थे। लेकिन मेडिकल रिकॉर्ड में आंख की movement सामान्य दर्ज थी और घटनास्थल के पंचनामा में टूटे हुए दांत नहीं मिले। पोस्टमार्टम डॉक्टर ने भी ऐसी चोटों से संबंधित आवश्यक घाव दर्ज नहीं किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने इसे भी महत्वपूर्ण विरोधाभास माना।


23 आरोपियों को एक साथ जोड़ने पर भी अदालत ने जताई सावधानी

अदालत ने यह भी नोट किया कि शुरुआती विवाद डीजे बजाने को लेकर दो लोगों के बीच हुआ था और घटना करीब 2.5 किलोमीटर दूर हुई। इसके बावजूद अभियोजन ने 23 लोगों को आरोपी बनाया और कई लोगों को विशिष्ट भूमिकाएं सौंपीं। 20 दोषी ठहराए गए आरोपियों में से नौ के बारे में किसी हथियार का आरोप नहीं था; उनके खिलाफ मुख्य आरोप किसी पीड़ित को पकड़ने या कथित तौर पर उकसाने तक सीमित था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुटबाजी और स्थानीय प्रतिद्वंद्विता वाले मामलों में निर्दोष लोगों को भी फंसाए जाने की संभावना से अदालतों को सावधान रहना चाहिए।


स्वतंत्र गवाहों की गैर-मौजूदगी भी बनी अहम वजह

अदालत ने रिकॉर्ड किया कि घटना रिहायशी इलाके में हुई थी और एक गवाह के अनुसार मौके पर 40-50 लोग जमा हुए थे। आसपास कई मकान भी थे। इसके बावजूद अभियोजन ने किसी स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी को पेश नहीं किया। यहां तक कि पंच गवाह भी रिश्तेदार थे। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अन्य परिस्थितियों के साथ यह तथ्य भी अभियोजन के मामले में पैदा हुए संदेह को बढ़ाता है।


गवाहों के बयान दर्ज करने में भी देरी

दो प्रत्यक्षदर्शियों के बयान घटना के दो दिन बाद दर्ज हुए, जबकि पुलिस मौके पर पहुंच चुकी थी। जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि उनके बयान बिना देरी के दर्ज किए जा सकते थे। घायल गवाहों के बयान भी अलग-अलग तारीखों पर दर्ज किए गए। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि प्रत्यक्षदर्शियों के बयान में देरी का पर्याप्त स्पष्टीकरण रिकॉर्ड पर नहीं था।


FIR और केस प्रॉपर्टी की जांच में भी खामियां

सुप्रीम कोर्ट ने FIR की मूल प्रति और मजिस्ट्रेट को भेजी गई कार्बन कॉपी में अंतर का उल्लेख किया। जांच अधिकारी इस अंतर का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके।

इसके अलावा केस प्रॉपर्टी को केमिकल एनालाइजर ने इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि सील टूटी हुई थी। बाद में उसे दोबारा सील किया गया, लेकिन इस प्रक्रिया का कोई रिकॉर्ड नहीं बनाया गया। दोनों निचली अदालतों ने केमिकल एनालाइजर की रिपोर्ट को इस कारण स्वीकार नहीं किया था।


आरोपियों को लगी चोटें भी बनीं महत्वपूर्ण कड़ी

रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि चार आरोपियों ने घटना के बाद अपनी चोटों के लिए इलाज कराया था। उनके मेडिकल लीगल रिकॉर्ड जांच के दौरान चार्जशीट का हिस्सा नहीं बनाए गए। हाईकोर्ट ने आरोपियों की चोटों के स्पष्टीकरण के अभाव को भी अभियोजन की कहानी पर संदेह पैदा करने वाला पहलू माना।


सुप्रीम कोर्ट ने कहा—बरी होने के बाद हस्तक्षेप की सीमा बहुत ऊंची

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि जब हाईकोर्ट किसी आरोपी को बरी कर देता है तो अपीलीय अदालत द्वारा उस फैसले में हस्तक्षेप करने की सीमा सामान्य अपील की तुलना में अधिक कठोर होती है। हस्तक्षेप तभी उचित है जब बरी करने का फैसला स्पष्ट रूप से perverse, manifestly illegal हो, महत्वपूर्ण साक्ष्य की अनदेखी पर आधारित हो या रिकॉर्ड पर मौजूद परिस्थितियों में दोष के अलावा कोई उचित दृष्टिकोण संभव ही न हो।


सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की अनदेखी करके नहीं दिया गया था। मेडिकल साक्ष्य और प्रत्यक्षदर्शी गवाही के बीच विरोधाभास तथा बड़ी संख्या में आरोपियों की पहचान से जुड़ी असुरक्षा को देखते हुए हाईकोर्ट का निष्कर्ष एक "reasonable and possible view" था। इसलिए अनुच्छेद 136 के तहत उसमें हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता।

नतीजा: 20 आरोपियों की सजा वापस नहीं होगी

सुप्रीम कोर्ट ने मृतक की मां और महाराष्ट्र सरकार की उस मांग को खारिज कर दिया जिसमें हाईकोर्ट के बरी करने के फैसले को पलटकर ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि और सजा बहाल करने की मांग की गई थी। दोनों संबंधित आपराधिक अपीलें खारिज कर दी गईं। फैसला 3 अगस्त 2026 को सुनाया गया।


कानूनी महत्व

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने केवल इस आधार पर अभियोजन की कहानी स्वीकार नहीं की कि घटना में वास्तव में हमला और मौत हुई थी। अदालत ने यह अलग-अलग देखा कि हमला हुआ था या नहीं और क्या अभियोजन प्रत्येक आरोपी की बताई गई विशिष्ट भूमिका को संदेह से परे साबित कर पाया। मेडिकल साक्ष्य, प्रत्यक्षदर्शी गवाही, स्वतंत्र corroboration और जांच की कमियों को एक साथ देखने के बाद अदालत ने माना कि हाईकोर्ट का acquittal एक संभावित और तर्कसंगत निष्कर्ष था। आपराधिक मुकदमे में केवल घटना का होना पर्याप्त नहीं है; प्रत्येक आरोपी के खिलाफ अभियोजन को विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य के आधार पर आरोप संदेह से परे साबित करना होता है।