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भूजल का 87 प्रतिशत सिंचाई में खर्च, 9 राज्यों में राष्ट्रीय औसत से ज्यादा दोहन

भारत में भूजल पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2025 में देश से 247.22 अरब घन मीटर भूजल निकाला गया, जिसमें करीब 87 प्रतिशत हिस्सा सिंचाई में इस्तेमाल हुआ। राष्ट्रीय स्तर पर भूजल दोहन की अवस्था 60.63 प्रतिशत रही, लेकिन पंजाब, राजस्थान, हरियाणा समेत 9 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में यह राष्ट्रीय औसत से अधिक रही। देश के 281 जिलों में भी भूजल दोहन औसत से ज्यादा दर्ज किया गया। भूजल की मात्रा के साथ उसकी गुणवत्ता भी चिंता का विषय है। सरकार जलभृत मानचित्रण, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, अमृत सरोवर, जल जीवन मिशन और सूक्ष्म सिंचाई जैसी पहलों के जरिए जल सुरक्षा मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

Anshuman Mishra11 अग. 2026, 01:41 PM IST
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भूजल का 87 प्रतिशत सिंचाई में खर्च, 9 राज्यों में राष्ट्रीय औसत से ज्यादा दोहन


नई दिल्ली: भारत में जल संकट की चुनौती केवल बारिश, नदियों और बांधों तक सीमित नहीं है। देश की खेती, घरेलू जरूरतों और उद्योगों का बड़ा हिस्सा जमीन के नीचे मौजूद पानी यानी भूजल पर निर्भर है। ऐसे में भूजल का लगातार बढ़ता दोहन आने वाले वर्षों में जल सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के वर्ष 2025 के गतिशील भूजल संसाधन आकलन के अनुसार देश में हर वर्ष लगभग 448.52 अरब घन मीटर भूजल का पुनर्भरण होता है। इसमें से 407.75 अरब घन मीटर पानी को निकालने योग्य माना गया है। इसके मुकाबले वर्ष 2025 में देश में कुल 247.22 अरब घन मीटर भूजल निकाला गया। राष्ट्रीय स्तर पर भूजल दोहन की अवस्था 60.63 प्रतिशत रही। हालांकि यह आंकड़ा पूरे देश की एक समान स्थिति को नहीं दर्शाता। कई राज्य और जिले ऐसे हैं जहां भूजल दोहन राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है और कुछ क्षेत्रों में स्थिति गंभीर स्तर तक पहुंच चुकी है।


सिंचाई में इस्तेमाल हुआ भूजल का 87 प्रतिशत हिस्सा

भारत में भूजल की सबसे बड़ी खपत खेती के लिए होती है। वर्ष 2025 में निकाले गए कुल भूजल में लगभग 215 अरब घन मीटर पानी सिंचाई के लिए इस्तेमाल हुआ। यह कुल भूजल दोहन का करीब 87 प्रतिशत है। घरेलू जरूरतों, जिसमें पेयजल भी शामिल है, के लिए लगभग 28 अरब घन मीटर यानी करीब 11 प्रतिशत भूजल का उपयोग हुआ। वहीं औद्योगिक क्षेत्र में लगभग 4 अरब घन मीटर यानी करीब 2 प्रतिशत भूजल निकाला गया। ये आंकड़े बताते हैं कि भूजल संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौती कृषि क्षेत्र में पानी के इस्तेमाल को अधिक प्रभावी और टिकाऊ बनाना है।


9 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में राष्ट्रीय औसत से अधिक दोहन

राष्ट्रीय स्तर पर भूजल दोहन की अवस्था 60.63 प्रतिशत होने के बावजूद कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में स्थिति इससे काफी अधिक गंभीर है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के आकलन के अनुसार पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, पुडुचेरी, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, चंडीगढ़ और कर्नाटक में भूजल दोहन राष्ट्रीय औसत से अधिक दर्ज किया गया है।


देश के 281 जिलों में भी भूजल दोहन की अवस्था राष्ट्रीय औसत से अधिक पाई गई है।

पंजाब में भूजल दोहन की अवस्था 156 प्रतिशत से भी अधिक दर्ज की गई है। इसका अर्थ है कि वहां सालाना निकाला जा रहा भूजल उस क्षेत्र में उपलब्ध वार्षिक निकासी योग्य भूजल संसाधन से भी अधिक है। राजस्थान और हरियाणा में भी भूजल पर भारी दबाव बना हुआ है। यही क्षेत्रीय असमानता भारत के भूजल संकट को और गंभीर बनाती है। राष्ट्रीय औसत अपेक्षाकृत संतुलित दिखाई दे सकता है, लेकिन कुछ राज्यों और जिलों में भूजल का स्तर तेजी से दबाव में आ रहा है।


भूजल क्यों है भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण

भूजल वह पानी है जो जमीन की सतह के नीचे मिट्टी, रेत और चट्टानों की विभिन्न परतों के बीच मौजूद जलभृतों में जमा रहता है। वर्षा का पानी जमीन में रिसकर इन जलभृतों का पुनर्भरण करता है। भारत में भूजल का इस्तेमाल सिंचाई, पेयजल, घरेलू जरूरतों और उद्योगों के लिए बड़े पैमाने पर होता है। विशेष रूप से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बड़ी आबादी की पानी की जरूरत सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से भूजल पर निर्भर है। इसलिए यदि भूजल का स्तर लगातार नीचे जाता है तो इसका असर केवल किसानों पर नहीं बल्कि ग्रामीण परिवारों, पेयजल व्यवस्था और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।


भूजल संकट केवल पानी की मात्रा का नहीं, गुणवत्ता का भी है

भूजल से जुड़ी चुनौती केवल यह नहीं है कि जमीन के नीचे कितना पानी बचा है। पानी की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की वर्ष 2025 की वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट के अनुसार देश में भूजल सामान्य रूप से पीने योग्य पाया गया है और लगभग 99 प्रतिशत निगरानी केंद्रों पर पानी सिंचाई के लिए उपयुक्त पाया गया। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में प्रदूषक तत्वों की स्थिति अलग है। कई क्षेत्रों में फ्लोराइड, नाइट्रेट, लवणता, आर्सेनिक और अन्य प्रदूषक तत्व भूजल की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि किसी क्षेत्र में भूजल की मात्रा पर्याप्त होने के बावजूद वह पानी पीने योग्य या अन्य उपयोगों के लिए सुरक्षित हो, यह जरूरी नहीं है। इसलिए भूजल संरक्षण के साथ उसकी गुणवत्ता की निगरानी भी जरूरी है।


बिहार में भी भूजल गुणवत्ता पर निगरानी

बिहार में वर्ष 2025 के दौरान 584 भूजल नमूनों का विश्लेषण किया गया। इनमें 5 नमूनों में विद्युत चालकता निर्धारित स्वीकार्य सीमा से अधिक पाई गई। वहीं 39 नमूनों में फ्लोराइड और 78 नमूनों में नाइट्रेट की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक मिली। यह स्थिति बताती है कि भूजल प्रबंधन में केवल पानी की उपलब्धता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच और प्रदूषण प्रभावित क्षेत्रों में उपचारात्मक कदम भी जरूरी हैं।


सरकार की ओर से भूजल प्रबंधन के लिए कई कदम

केंद्र सरकार के अनुसार भूजल का प्रबंधन और संरक्षण मुख्य रूप से राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की जिम्मेदारी है, क्योंकि पानी राज्य का विषय है। हालांकि केंद्र सरकार केंद्रीय भूजल बोर्ड के वैज्ञानिक अध्ययनों, तकनीकी सहायता, नीति समर्थन और विभिन्न योजनाओं के माध्यम से राज्यों की मदद करती है। जलभृतों की पहचान और उनके वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण एवं प्रबंधन कार्यक्रम महत्वपूर्ण पहल है। इसके पहले चरण के तहत देश के चिन्हित मानचित्रण योग्य क्षेत्र में लगभग 25 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की जलभृत मानचित्रण प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है। बिहार में भी लगभग 90,567 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का मानचित्रण किया गया है। अब दूसरे चरण में जल संकट और भूजल गुणवत्ता की समस्या से प्रभावित क्षेत्रों में अधिक विस्तृत अध्ययन और प्रबंधन योजनाओं पर ध्यान दिया जा रहा है। वर्ष 2023-24 से 2025-26 के दौरान 143 अध्ययन क्षेत्रों में लगभग 76,857 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को शामिल किया गया। इसमें बिहार के पांच उच्च-रिजोल्यूशन अध्ययन क्षेत्र भी शामिल हैं।


आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों के लिए विशेष तकनीक

भूजल की गुणवत्ता से जुड़ी सबसे गंभीर समस्याओं में आर्सेनिक प्रदूषण भी शामिल है। आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित भूजल स्रोत उपलब्ध कराने के लिए केंद्रीय भूजल बोर्ड ने गहरे और आर्सेनिक-मुक्त जलभृतों तक पहुंच बनाने के लिए विशेष सीमेंट-सीलिंग तकनीक विकसित की है। सरकार के अनुसार इस तकनीक के माध्यम से 525 आर्सेनिक-मुक्त खोजी कुएं बनाए गए हैं। इनमें 40 कुएं बिहार में हैं। यदि किसी क्षेत्र की ऊपरी जलभृत परत आर्सेनिक से प्रभावित है तो वैज्ञानिक तरीके से गहरे और सुरक्षित जलभृत तक पहुंच बनाना कुछ क्षेत्रों में पेयजल सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।


हर घर तक नल का पानी और जल स्रोतों की स्थिरता

ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल सुरक्षा को मजबूत करने के लिए जल जीवन मिशन के तहत घर-घर नल से पानी पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है। सरकार के अनुसार 10 अगस्त 2026 तक देश के 15.90 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल से जल के कनेक्शन दिए जा चुके हैं। यह ग्रामीण परिवारों का लगभग 82 प्रतिशत है। बिहार में लगभग 1.60 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल से जल के कनेक्शन उपलब्ध कराए गए हैं, जो राज्य के लगभग 95.71 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के बराबर है। इसके साथ ही जल-संकट और पानी की गुणवत्ता से प्रभावित क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन के जरिए पानी के स्रोतों को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने पर जोर दिया जा रहा है।


जल शक्ति अभियान से भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा

भूजल के स्तर को बनाए रखने के लिए वर्षा जल संचयन और कृत्रिम भूजल पुनर्भरण पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जल शक्ति अभियान के तहत विभिन्न योजनाओं के समन्वय से देशभर में 2 करोड़ से अधिक जल संरक्षण और कृत्रिम भूजल पुनर्भरण कार्य किए गए हैं। इनमें बिहार में करीब 5.75 लाख कार्य शामिल हैं। वर्ष 2024 में शुरू की गई जल संचय जनभागीदारी पहल का उद्देश्य वर्षा जल संचयन को जनभागीदारी का व्यापक अभियान बनाना है। इसके तहत देशभर में 1.55 करोड़ से अधिक कृत्रिम भूजल पुनर्भरण और जल भंडारण कार्य किए गए हैं। 1 जून 2026 को जल संचय जनभागीदारी और वर्षा जल संचयन अभियान को भी शुरू किया गया।


अमृत सरोवर से जल भंडारण और पुनर्भरण

मिशन अमृत सरोवर के तहत प्रत्येक जिले में कम से कम 75 जल निकायों को विकसित या पुनर्जीवित करने का लक्ष्य रखा गया था। सरकार के अनुसार देशभर में करीब 69,000 अमृत सरोवर विकसित या पुनर्जीवित किए जा चुके हैं। इनमें बिहार के करीब 2,613 अमृत सरोवर शामिल हैं। इन जल निकायों का उद्देश्य केवल पानी का भंडारण करना नहीं है, बल्कि वर्षा जल को रोकने और जमीन में पानी के पुनर्भरण को बढ़ावा देना भी है।


खेती में पानी बचाना सबसे बड़ी चुनौती

जब देश के कुल भूजल दोहन का लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा सिंचाई में इस्तेमाल होता है, तो साफ है कि भूजल संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौती कृषि क्षेत्र से जुड़ी है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के माध्यम से सिंचाई की पहुंच बढ़ाने, खेत स्तर पर पानी के बेहतर इस्तेमाल और टिकाऊ जल संरक्षण को बढ़ावा दिया जा रहा है। योजना के तहत प्रति बूंद अधिक फसल कार्यक्रम के माध्यम से सूक्ष्म सिंचाई और वैज्ञानिक तरीके से पानी के इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया जाता है। टपक सिंचाई और फव्वारा सिंचाई जैसी तकनीकों के इस्तेमाल से कम पानी में अधिक फसल उत्पादन करने की संभावना बढ़ती है। इससे सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।


भूजल संकट से निपटने के लिए केवल पुनर्भरण पर्याप्त नहीं

भारत में भूजल संकट से निपटने के लिए केवल नए पुनर्भरण ढांचे बनाना पर्याप्त नहीं होगा। जितना महत्वपूर्ण पानी को जमीन के अंदर पहुंचाना है, उतना ही जरूरी अत्यधिक दोहन को नियंत्रित करना भी है। विशेष रूप से उन राज्यों और जिलों में जहां भूजल दोहन वार्षिक निकासी योग्य संसाधन से काफी अधिक है, वहां स्थानीय स्तर पर प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता है। अत्यधिक पानी वाली फसलों की खेती, असक्षम सिंचाई व्यवस्था, लगातार नलकूपों से पानी निकालना और वर्षा के बदलते स्वरूप जैसे कारण कई क्षेत्रों में भूजल पर दबाव बढ़ा सकते हैं।इसलिए फसल विविधीकरण, सूक्ष्म सिंचाई, वर्षा जल संचयन, जलभृत आधारित योजना और स्थानीय स्तर पर भूजल नियमन को एक साथ लागू करना जरूरी होगा।


राष्ट्रीय औसत से पूरी तस्वीर समझना संभव नहीं

भूजल दोहन का 60.63 प्रतिशत राष्ट्रीय औसत अपने आप में पूरी स्थिति नहीं बताता। भारत में भूजल संसाधनों की स्थिति राज्य, जिला और स्थानीय स्तर पर काफी अलग-अलग है।

कुछ क्षेत्र अपेक्षाकृत सुरक्षित हो सकते हैं, जबकि कुछ राज्यों और जिलों में भूजल का दोहन गंभीर स्तर तक पहुंच चुका है। इसलिए भविष्य की भूजल नीति में पूरे देश के लिए एक समान दृष्टिकोण अपनाने के बजाय स्थानीय जलभृत, वर्षा, फसल पैटर्न, पानी की मांग और भूजल गुणवत्ता को ध्यान में रखकर योजनाएं बनानी होंगी।


भारत के सामने क्या है सबसे बड़ी चुनौती

वर्ष 2025 में भारत ने करीब 247.22 अरब घन मीटर भूजल निकाला। इसमें लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा सिंचाई में इस्तेमाल हुआ। राष्ट्रीय स्तर पर भूजल दोहन की अवस्था 60.63 प्रतिशत रही, लेकिन 9 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में यह राष्ट्रीय औसत से अधिक दर्ज की गई। देश के 281 जिलों में भी दोहन की अवस्था राष्ट्रीय औसत से ज्यादा रही।

सरकार की ओर से जलभृत मानचित्रण, भूजल गुणवत्ता की निगरानी, वर्षा जल संचयन, कृत्रिम भूजल पुनर्भरण, जल निकायों के पुनर्जीवन, घर-घर नल से जल पहुंचाने और सूक्ष्म सिंचाई जैसी कई पहलें चलाई जा रही हैं।


लेकिन भारत के लिए असली चुनौती भूजल को केवल निकालकर इस्तेमाल करने वाले संसाधन के रूप में देखने के बजाय इसे सीमित और पुनर्भरण योग्य प्राकृतिक संपदा के रूप में समझने की है। यदि भूजल निकासी और पुनर्भरण के बीच संतुलन बनाया गया, खेती में पानी के इस्तेमाल की दक्षता बढ़ाई गई, जल-बहुल फसलों पर निर्भरता कम की गई और भूजल की गुणवत्ता की नियमित निगरानी मजबूत की गई, तो आने वाले वर्षों में पेयजल, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जल सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है। भारत का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि देश के पास कितना पानी है, बल्कि इस पर भी निर्भर करेगा कि उपलब्ध भूजल को कितनी समझदारी से निकाला, बचाया और दोबारा जमीन के भीतर पहुंचाया जाता है।