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26 साल की कानूनी जंग का अंत! शौर्य चक्र विजेता की विधवा के हक में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, केंद्र को देने होंगे ₹10 लाख

देश के लिए जान कुर्बान करने वाले शौर्य चक्र विजेता GREF अधिकारी मोहन सिंह की विधवा को 26 साल बाद सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। ड्यूटी के दौरान दूसरों की जान बचाते हुए मोहन सिंह की मौत हुई थी, लेकिन उनकी पत्नी को Extraordinary Pension के लिए वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। अब 5 अगस्त 2026 को जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ला की पीठ ने 13 जुलाई 2000 से 12 जुलाई 2015 की अवधि के लिए ₹10 लाख की consolidated राशि देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने यह राहत संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मामले की असाधारण परिस्थितियों को देखते हुए दी।

Sonali11 अग. 2026, 01:44 PM IST
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26 साल की कानूनी जंग का अंत! शौर्य चक्र विजेता की विधवा के हक में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, केंद्र को देने होंगे ₹10 लाख

नई दिल्ली: 

देश की सेवा में अपनी जान गंवाने वाले शौर्य चक्र विजेता GREF अधिकारी मोहन सिंह की विधवा कुलदीप कौर को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी राहत दी है। करीब 26 साल पुराने इस पेंशन विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने 5 अगस्त 2026 को महत्वपूर्ण आदेश सुनाते हुए केंद्र सरकार को 13 जुलाई 2000 से 12 जुलाई 2015 की अवधि के लिए 10 लाख रुपये की consolidated राशि देने का निर्देश दिया। यह राहत संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए दी गई है। कोर्ट ने केंद्र को यह रकम चार सप्ताह के भीतर जारी करने का आदेश दिया है। इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ला की पीठ ने की। फैसला 5 अगस्त 2026 को सुनाया गया। मामला कुलदीप कौर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य का था।

आखिर क्या हुआ था उस दिन?

मोहन सिंह General Reserve Engineering Force यानी GREF में Overseer के पद पर कार्यरत थे। वह वर्ष 1983 में GREF में शामिल हुए थे और बाद में अरुणाचल प्रदेश में रणनीतिक महत्व वाली सड़क निर्माण परियोजना में तैनात थे। 10 जुलाई 2000 को वह Hayliang-Metangliang-Chaglohagom रोड के निर्माण कार्य की निगरानी कर रहे थे। यह करीब 57 किलोमीटर लंबी सड़क भारत-चीन सीमा क्षेत्र में रणनीतिक महत्व रखती थी। काम के दौरान अचानक पहाड़ी से एक बड़ा पत्थर और भारी मलबा नीचे की ओर आने लगा। मोहन सिंह ने खतरा देखते ही डोजर और कंप्रेसर ऑपरेटरों को सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए चेतावनी दी। इसके बाद वह खुद भी मशीनों और वहां काम कर रहे लोगों को हटाने में जुट गए। दूसरों को बचाने और मशीनरी को सुरक्षित करने की कोशिश के दौरान वह खुद चट्टान की चपेट में आ गए और करीब 70 मीटर गहरी घाटी में जा गिरे। उनकी मौत हो गई। उनके इस असाधारण साहस और बलिदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 19 अक्टूबर 2001 को मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में भी इस बात को विशेष रूप से दर्ज किया कि शौर्य चक्र भारत का तीसरा सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है।

विवाद आखिर किस बात पर था?

मोहन सिंह की मौत के बाद उनकी पत्नी कुलदीप कौर को सामान्य पारिवारिक पेंशन दी गई। उन्हें Workmen's Compensation Act, 1923 के तहत 1,84,170 रुपये का मुआवजा भी मिला था। इसके अलावा 1998 के एक Office Memorandum के तहत 5 लाख रुपये की ex-gratia राशि भी स्वीकृत हुई, लेकिन यह रकम 2000 में पति की मृत्यु के समय नहीं बल्कि 11 दिसंबर 2017 को मिली। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में इस भुगतान का उल्लेख है। कुलदीप कौर का कहना था कि उनके पति ने सामान्य दुर्घटना में जान नहीं गंवाई, बल्कि देश की सेवा और दूसरों की जान बचाने की कोशिश में अपनी जान गंवाई थी। इसलिए परिवार को CCS (Extra Ordinary Pension) Rules, 1939 के तहत Extraordinary Family Pension का लाभ मिलना चाहिए।

2005 में शुरू हुई पेंशन की लड़ाई

कुलदीप कौर ने 20 दिसंबर 2005 को Extraordinary Pension की मांग करते हुए सरकार को representation दिया। इसे 15 जनवरी 2006 को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि उन्हें Workmen's Compensation Act के तहत मुआवजा मिल चुका था। इसके बाद उन्होंने 9 दिसंबर 2010 को Special Family Pension/Liberalized Family Pension के लिए फिर आवेदन किया। यह मांग भी 6 जनवरी 2011 को खारिज कर दी गई। इसके बाद कुलदीप कौर ने 2018 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

13 मार्च 2024: हाईकोर्ट के Single Judge ने दिया पहला बड़ा फैसला

13 मार्च 2024 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन बंसल ने कुलदीप कौर की याचिका स्वीकार की। कोर्ट ने माना कि उनका मामला CCS (Extra Ordinary Pension) Rules, 1939 की Category 'C' के तहत आता है और उन्हें Extraordinary Pension का अधिकार है। कोर्ट ने पेंशन का लाभ writ petition दाखिल करने की तारीख से देने का आदेश दिया था। साथ ही 6 प्रतिशत ब्याज के साथ arrears देने और Workmen's Compensation Act के तहत मिली राशि को ब्याज सहित वापस करने का निर्देश दिया गया था। लेकिन इसी फैसले के बाद मामला और महत्वपूर्ण हो गया, क्योंकि केंद्र सरकार और कुलदीप कौर—दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट की Division Bench में अपील की।

GREF को लेकर भी उठा बड़ा कानूनी सवाल

इस केस में एक अहम कानूनी सवाल यह भी था कि GREF personnel को इस तरह के pensionary benefits के लिए सामान्य “workmen” माना जाए या Armed Forces of the Union का हिस्सा। 2026 के पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई। अदालत ने GREF के रणनीतिक और राष्ट्रीय महत्व वाले कार्यों तथा उसके personnel की परिस्थितियों को देखते हुए मामले को सामान्य workplace accident के रूप में देखने से इनकार किया। Times of India ने भी इस फैसले को “GREF personnel are armed forces, not workmen” वाले महत्वपूर्ण कानूनी पहलू के साथ रिपोर्ट किया। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि 5 अगस्त 2026 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को इस रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश में GREF की संवैधानिक/कानूनी स्थिति पर कोई नया व्यापक declaration दे दिया है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश मुख्य रूप से इस विशेष मामले में pension arrears और Article 142 के तहत राहत से संबंधित है।

27 जनवरी 2026: हाईकोर्ट की Division Bench ने भी Extraordinary Pension बरकरार रखी

27 जनवरी 2026 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की Division Bench ने मामले में फैसला सुनाया। पीठ में जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर शामिल थे। फैसला 27 जनवरी को pronounced हुआ और 29 जनवरी 2026 को अपलोड किया गया। Division Bench ने Category 'C' के तहत Extraordinary Pension का लाभ बरकरार रखा, लेकिन बकाया राशि को writ petition दाखिल करने से पहले तीन साल की अवधि तक सीमित कर दिया। हाईकोर्ट ने यह भी माना कि pension claims continuing wrong की प्रकृति के हो सकते हैं और देरी की स्थिति में सामान्यतः arrears को तीन साल की अवधि तक सीमित किया जा सकता है। इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से पहले तीन साल तक arrears सीमित करने की बात भी रखी गई थी। यहीं से मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

24 जुलाई 2026: सुप्रीम कोर्ट ने उठाया सबसे अहम सवाल

जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो 24 जुलाई 2026 के आदेश में कोर्ट ने खास तौर पर यह सवाल उठाया कि क्या हाईकोर्ट ने arrears को याचिका दाखिल करने से पहले केवल तीन साल तक सीमित करके सही किया।सुप्रीम कोर्ट ने उस समय प्रथम दृष्टया कहा कि मोहन सिंह ने देश की सेवा में सर्वोच्च बलिदान दिया था और उन्हें शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में परिवार या विधवा को अपने अधिकार के लिए अदालत जाने की स्थिति में नहीं होना चाहिए और केवल यह तथ्य कि परिवार ने लंबे समय बाद अदालत का दरवाजा खटखटाया, न्याय देने में बाधा नहीं बनना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस सीमित मुद्दे पर केंद्र को नोटिस जारी किया और 5 अगस्त 2026 को सुनवाई रखी।

5 अगस्त 2026: सुप्रीम कोर्ट ने बदला हाईकोर्ट का आदेश

5 अगस्त 2026 को जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ला की पीठ ने मामले की अंतिम सुनवाई की। Attorney General आर. वेंकटरमणी ने कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट के आदेश के आधार पर विभाग ने 14,28,200 रुपये की राशि पहले ही जारी कर दी है। इसके अलावा Extraordinary Pension के arrears के रूप में 4,12,064 रुपये भी विधवा को जारी किए जा चुके हैं। सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि 12 जुलाई 2000 से 12 जुलाई 2015 तक की अवधि की पेंशन की गणना 6,62,268 रुपये हुई और 6 प्रतिशत ब्याज जोड़ने पर यह लगभग 8,32,000 रुपये बनती है।

फिर SC ने ₹10 लाख क्यों तय किए?

सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि कुलदीप कौर को पूरे मामले में सिर्फ 10 लाख रुपये ही मिलेंगे। कोर्ट ने पहले से जारी पेंशन और बकाया राशि का भी रिकॉर्ड लिया।

13 जुलाई 2000 से 12 जुलाई 2015 की अवधि के लिए अलग-अलग गणनाओं, पहले मिले Workmen's Compensation और उससे जुड़े ब्याज सहित पूरे मामले की परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने Article 142 के तहत 10 लाख रुपये की consolidated राशि तय की। कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह 10 लाख रुपये चार सप्ताह के भीतर जारी करने का निर्देश दिया।

SC ने Article 142 का इस्तेमाल क्यों किया?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने विशेष संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए कहा कि इस मामले के तथ्य और परिस्थितियां असाधारण हैं।

कोर्ट ने इस बात को महत्व दिया कि मोहन सिंह ने ड्यूटी के दौरान दूसरों की जान बचाने की कोशिश करते हुए अपनी जान गंवाई और बाद में सरकार ने उन्हें शौर्य चक्र से सम्मानित किया। इसी असाधारण परिस्थिति को देखते हुए कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा लागू की गई तीन साल की सीमा से आगे जाकर मृत्यु की तारीख से राहत देने का रास्ता अपनाया।

₹1.84 लाख compensation का क्या हुआ?

यह भी इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू है।

कुलदीप कौर को पहले Workmen's Compensation Act के तहत 1,84,170 रुपये मिले थे। केंद्र की ओर से सुप्रीम कोर्ट में बताया गया कि ब्याज सहित यह रकम 2,78,092 रुपये बैठती है। सरकार के अनुसार, नियमों के तहत कुलदीप कौर को 4,62,262 रुपये वापस करने पड़ सकते थे। उनके वकील ने हालांकि बताया कि मूल 1,84,170 रुपये की राशि वह पहले ही वापस कर चुकी हैं। इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग गणनाओं में उलझने के बजाय 13 जुलाई 2000 से 12 जुलाई 2015 के लिए 10 लाख रुपये की consolidated राशि तय की।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा केवल 10 लाख रुपये की राहत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने 24 जुलाई के आदेश में ही यह संकेत दे दिया था कि किसी ऐसे परिवार को, जिसने देश की सेवा में अपना सदस्य खोया हो, अपने अधिकार के लिए दशकों बाद अदालतों के चक्कर लगाने की स्थिति में नहीं होना चाहिए। 5 अगस्त के अंतिम आदेश में कोर्ट ने इसी मानवीय पहलू को ध्यान में रखते हुए Article 142 का इस्तेमाल किया और तीन साल की सीमा के बजाय विशेष परिस्थितियों में मृत्यु के बाद की पूरी संबंधित अवधि के लिए consolidated relief प्रदान की।

इस फैसले का व्यापक महत्व

यह फैसला केवल पेंशन विवाद नहीं है। यह उन सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों के अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण उदाहरण है जो कठिन, सीमावर्ती और रणनीतिक क्षेत्रों में राष्ट्र की सेवा करते हुए असाधारण परिस्थितियों में अपनी जान गंवाते हैं। मामले में एक तरफ सरकारी नियमों और Workmen's Compensation का सवाल था, तो दूसरी तरफ Extraordinary Pension Rules के तहत परिवार के अधिकार का मुद्दा था। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मामले के तथ्यों, मोहन सिंह के बलिदान और उन्हें मिले शौर्य चक्र को विशेष महत्व दिया। हालांकि, यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट का 5 अगस्त 2026 का ₹10 लाख वाला आदेश इस मामले के विशेष तथ्यों और Article 142 पर आधारित है। इसे हर GREF कर्मचारी या हर शहीद के परिवार के लिए स्वतः समान ₹10 लाख की कानूनी entitlement के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता।

करीब 26 साल से चले आ रहे इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शौर्य चक्र विजेता GREF अधिकारी मोहन सिंह की विधवा कुलदीप कौर को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने केवल तकनीकी समय-सीमा को आधार नहीं बनाया, बल्कि ड्यूटी के दौरान किए गए बलिदान, शौर्य चक्र से सम्मान और मामले की असाधारण परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए Article 142 के तहत 10 लाख रुपये की अतिरिक्त consolidated राहत दी। 

सबसे अहम बात यह है कि यह फैसला उस परिवार की लंबी कानूनी लड़ाई का अंत है, जिसने 2005 में पहली बार Extraordinary Pension के लिए सरकार से गुहार लगाई थी और आखिरकार 5 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट से राहत हासिल की।