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गुमशुदगी की शिकायत पर अब नहीं चलेगी पुलिस की देरी! सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, हर उम्र के ‘Person’ पर तुरंत FIR, लापरवाही पर अफसरों को Contempt

अब किसी के लापता होने पर पुलिस की ‘पहले जांच करेंगे, फिर FIR होगी’ वाली कहानी नहीं चलेगी! सुप्रीम कोर्ट ने गुमशुदगी के मामलों पर बड़ा और सख्त आदेश देते हुए साफ कर दिया है कि ‘Person’ का मतलब सिर्फ बच्चा नहीं, बल्कि हर उम्र और हर लिंग का गुमशुदा व्यक्ति है। 5 अगस्त 2026 को जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को आदेश का सख्ती से पालन करने की चेतावनी दी है। लापरवाही हुई तो Chief Secretary और DGP तक को Contempt का सामना करना पड़ सकता है।

Sonali11 अग. 2026, 01:45 PM IST
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गुमशुदगी की शिकायत पर अब नहीं चलेगी पुलिस की देरी! सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, हर उम्र के ‘Person’ पर तुरंत FIR, लापरवाही पर अफसरों को Contempt


नई दिल्ली:

 अगर कोई व्यक्ति अचानक लापता हो जाए तो अब पुलिस यह कहकर इंतजार नहीं कर सकती कि पहले परिवार खुद तलाश करे या प्रारंभिक जांच पूरी होने दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गुमशुदा व्यक्ति की सूचना मिलते ही FIR दर्ज करने का उसका निर्देश हर व्यक्ति पर लागू होता है—चाहे वह बच्चा हो या वयस्क और चाहे उसका लिंग कुछ भी हो। 5 अगस्त 2026 को जस्टिस Ahsanuddin Amanullah और जस्टिस R. Mahadevan की पीठ ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अपने पहले के आदेश का सख्ती से पालन करने को कहा और गैर-अनुपालन की स्थिति में संबंधित Chief Secretary और DGP के खिलाफ Contempt कार्रवाई की चेतावनी दी।

यह आदेश G. Ganesh बनाम State of Tamil Nadu & Ors. मामले में आया है। मामला मूल रूप से एक लापता बच्ची से जुड़ा था, लेकिन सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इसे देशभर में गुमशुदा बच्चों, महिलाओं और अन्य व्यक्तियों की तलाश तथा मानव तस्करी से निपटने की व्यापक व्यवस्था से जोड़ दिया। 22 मई 2026 के आदेश में कोर्ट ने देशभर के पुलिस थानों को गुमशुदगी की सूचना मिलते ही FIR दर्ज करने, मानव तस्करी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पुलिस ग्रिड बनाने और Anti-Human Trafficking Units को प्रभावी बनाने सहित कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे।

5 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

5 अगस्त को कोर्ट के सामने यह बात रखी गई कि 22 मई 2026 के आदेश के बाद सभी राज्यों को किसी भी गुमशुदा व्यक्ति की सूचना मिलने पर FIR दर्ज करनी थी।

लेकिन कोर्ट को बताया गया कि कुछ राज्य “person” शब्द को केवल बच्चों तक सीमित समझ रहे हैं।  सुप्रीम कोर्ट ने इस व्याख्या को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि उसके आदेश की भाषा स्पष्ट और बिना किसी अस्पष्टता के है। “Person” का अर्थ हर व्यक्ति है—उसकी उम्र या लिंग चाहे कुछ भी हो। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश ने आदेश का सही अर्थ और भावना में पालन नहीं किया है तो संबंधित Chief Secretary और Director General of Police के खिलाफ Contempt Notice जारी किया जाएगा। उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत के सामने उपस्थित होकर जवाब देना पड़ सकता है।

मामला शुरू कैसे हुआ?

यह मामला G. Ganesh की उस याचिका से जुड़ा है, जिसकी बेटी वर्ष 2011 में चेन्नई से लापता हुई थी। मामले में FIR दर्ज हुई और विभिन्न एजेंसियों ने जांच की, लेकिन बच्ची का पता नहीं चल सका। बाद में पुलिस ने मामले को “undetectable” मानते हुए closure report दाखिल कर दी। मद्रास हाईकोर्ट द्वारा closure report में हस्तक्षेप नहीं किए जाने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुनवाई के दौरान अदालत को लगा कि यह सिर्फ एक परिवार की समस्या नहीं बल्कि देशभर में missing children और human trafficking से जुड़ी बड़ी systemic समस्या है। इसी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कार्यवाही का दायरा व्यापक किया। 

22 मई 2026 का आदेश क्यों था इतना महत्वपूर्ण?

22 मई को सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में गुमशुदगी और मानव तस्करी के मामलों की जांच व्यवस्था को लेकर कई बड़े निर्देश जारी किए थे। सबसे अहम निर्देश था कि किसी व्यक्ति के लापता होने की सूचना मिलते ही पुलिस तुरंत FIR दर्ज करे। परिवार या guardians को पहले खुद तलाश करने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता और FIR से पहले preliminary inquiry के नाम पर समय नहीं गंवाया जा सकता।  कोर्ट ने कहा कि गुमशुदगी के बाद शुरुआती कुछ घंटे “golden hours” होते हैं, जब व्यक्ति को सुरक्षित तलाशने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। इसलिए पुलिस को शुरुआत से ही सक्रिय होना चाहिए, न कि 24 घंटे पूरे होने का इंतजार करना चाहिए। 

24 घंटे में व्यक्ति मिल जाए तो क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक व्यवस्था भी दी है। अगर गुमशुदा व्यक्ति 24 घंटे के भीतर अपने परिवार के पास सुरक्षित वापस मिल जाता है, तो संबंधित पुलिस बल का प्रमुख FIR की कॉपी jurisdictional court को भेजने से रोक सकता है और मामला उस स्तर पर बंद किया जा सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पुलिस 24 घंटे तक इंतजार करेगी। इसके उलट, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस machinery को तुरंत सक्रिय किया जाना चाहिए, क्योंकि शुरुआती कुछ घंटे ही सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। 

FIR में BNS की धाराएं भी होंगी

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि दर्ज की जाने वाली FIR में Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 की उन प्रासंगिक धाराओं को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए जो kidnapping, abduction या trafficking से संबंधित हों। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गुमशुदगी की जांच को शुरू से ही गंभीर आपराधिक कोण से देखा जाए और प्रक्रिया में देरी न हो। 

मानव तस्करी का संदेह हो तो जांच विशेष यूनिट को

अगर पुलिस या investigating agency को पर्याप्त कारण दिखाई देता है कि मामला human trafficking से जुड़ा है, तो चार महीने की अवधि पूरी होने का इंतजार किए बिना केस को संबंधित specialised unit को transfer किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह निर्देश ऐसे समय दिया जब उसके सामने यह जानकारी आई कि कई राज्यों में Anti-Human Trafficking Units यानी AHTUs कागजों पर तो मौजूद हैं, लेकिन जमीन पर वे पर्याप्त manpower, powers या resources के अभाव में प्रभावी तरीके से काम नहीं कर रही हैं।

AHTU को चार हफ्ते में पूरी तरह सक्रिय करने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि Anti-Human Trafficking Units को चार सप्ताह के भीतर पूरी तरह functional और operational बनाया जाए। यह जिम्मेदारी संबंधित Home Secretaries और DGPs को दी गई।   रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने यह निर्देश देशभर में missing children को trace करने और child trafficking के खिलाफ व्यवस्था मजबूत करने के उद्देश्य से दिए थे।

देशभर में बनेगा पुलिस का एकीकृत नेटवर्क

सुप्रीम कोर्ट ने Ministry of Home Affairs को देश के प्रत्येक पुलिस स्टेशन को एक common platform से जोड़ने के लिए All-India Grid तैयार करने का निर्देश दिया।

इसमें human trafficking, missing children और women के लिए dedicated portal रखने की बात कही गई। कोर्ट ने Mission Vatsalya और Crime and Criminal Tracking Network System यानी CCTNS को भी इस व्यवस्था से integrate करने के सुझाव को उपयोगी माना था।  इसका उद्देश्य अलग-अलग राज्यों और एजेंसियों के बीच real-time information sharing को बेहतर बनाना है।

बच्चा या व्यक्ति मिलने के बाद भी देरी नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कोई गुमशुदा व्यक्ति या बच्चा मिल जाए तो उचित verification के बाद उसे बिना अनावश्यक देरी के उसके परिवार को वापस किया जाए।

सिर्फ procedural formalities के नाम पर restoration में लंबी देरी नहीं की जा सकती। हालांकि, यदि जांच में यह सामने आता है कि परिवार या guardian खुद trafficking या exploitation में शामिल है, तो ऐसे व्यक्ति को उसी परिवार को वापस नहीं किया जाएगा। ऐसी स्थिति में State authorities और Child Welfare Committees उसकी care और protection की जिम्मेदारी संभालेंगी। 

Aadhaar verification को भी जोड़ा गया

कोर्ट ने recovered या rescued व्यक्ति के Aadhaar verification या Aadhaar जारी करने की प्रक्रिया को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत का उद्देश्य यह था कि biometric information के जरिए पहचान को मजबूत किया जा सके और किसी व्यक्ति की दोहरी या गलत पहचान की स्थिति सामने आने पर उसे उसके परिवार तक पहुंचाने में मदद मिले। 

राज्यों के Nodal Officers पर भी सुप्रीम कोर्ट सख्त

5 अगस्त के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ FIR और missing person directions तक बात सीमित नहीं रखी। कोर्ट ने पाया कि कई राज्यों में नियुक्त Nodal Officers बैठकों में शामिल नहीं होते, जवाब नहीं देते या अपनी जगह junior officers को भेज देते हैं। कुछ मामलों में Nodal Officers को बहुत कम समय में बदल दिया जाता है, जिससे coordination प्रभावित होता है। इसके बाद कोर्ट ने सभी Home Secretaries और DGPs को निर्देश दिया कि Committee के लिए proven integrity और competence वाले Nodal Officers नियुक्त किए जाएं, जिन्हें इस तरह के मामलों का अनुभव हो। कोर्ट ने साफ कहा कि Nodal Officer अपनी जिम्मेदारी किसी junior या दूसरे अधिकारी को delegate नहीं करेगा।

लद्दाख और अन्य राज्यों को लेकर भी सख्ती

5 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि Union Territory of Ladakh ने अपनी response दाखिल नहीं की थी। इसलिए Chief Secretary और DGP को personally affirmed affidavit दाखिल करके जवाब देने का निर्देश दिया गया। जिन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने कोर्ट के पुराने निर्देशों के बावजूद affidavits दाखिल नहीं किए थे, उन्हें भी prima facie contempt की स्थिति में माना गया।

47 हजार से ज्यादा बच्चे अभी भी untraced

22 मई की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया था कि देश में करीब 47,000 बच्चे untraced हैं। इसी व्यापक समस्या ने अदालत को missing children और trafficking की व्यवस्था पर nationwide intervention करने के लिए प्रेरित किया।

 

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती का असली संदेश

इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यही है कि किसी व्यक्ति के लापता होने के शुरुआती घंटों को सामान्य पुलिस प्रक्रिया की धीमी गति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। अदालत ने missing person को सिर्फ “गुमशुदगी” के रूप में दर्ज कर कार्रवाई टालने के बजाय तत्काल FIR, सक्रिय पुलिस जांच, trafficking angle की जांच और जरूरत पड़ने पर specialised unit को transfer करने की व्यवस्था पर जोर दिया है। 5 अगस्त का आदेश खास तौर पर महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि उसका “person” वाला निर्देश केवल बच्चों तक सीमित नहीं है। यह उम्र और लिंग से परे सभी missing persons पर लागू है।

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश देशभर में missing persons की पुलिस जांच की व्यवस्था पर सीधा असर डालने वाला है। अब किसी व्यक्ति के लापता होने पर “पहले परिवार तलाश करे”, “24 घंटे इंतजार करें” या “पहले preliminary inquiry हो” जैसी देरी अदालत के निर्देशों के अनुरूप नहीं होगी।