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धर्म बदला तो पिता ने बेटियों को घर में किया कैद! इलाहाबाद HC का बड़ा फैसला- ‘बालिग की जिंदगी पर परिवार का अधिकार नहीं’, 25 लाख मुआवजे का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक अहम फैसले ने धर्म, परिवार और व्यक्तिगत आजादी से जुड़े सवालों को फिर सुर्खियों में ला दिया है। दो बालिग महिलाओं ने अदालत के सामने आरोप लगाया कि धर्म परिवर्तन के बाद उनके पिता ने उन्हें उनकी इच्छा के खिलाफ घर में रोककर रखा। मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो अदालत ने दोनों महिलाओं से खुद बातचीत की और उनकी इच्छा को प्राथमिकता देते हुए उन्हें अपनी पसंद से रहने की आजादी दी। कोर्ट ने कथित अवैध हिरासत को गंभीरता से लेते हुए पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह साफ किया कि उसने धर्म परिवर्तन को वैध घोषित नहीं किया है; फैसला मुख्य रूप से बालिग व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कथित अवैध हिरासत के सवाल पर है।

जस्टिस संदीप जैन ने 6 अगस्त 2026 को Kunwar Sultan Ali And 2 Others बनाम State of U.P. And 3 Others मामले में फैसला सुनाते हुए दोनों महिलाओं को अपनी पसंद की जगह और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने की स्वतंत्रता दी। साथ ही पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
30 जुलाई को कोर्ट ने लिया था अहम कदम
यह मामला सीधे 6 अगस्त के अंतिम फैसले तक नहीं पहुंचा था। इससे पहले 30 जुलाई 2026 को हाईकोर्ट ने राज्य को दोनों महिलाओं को अदालत के सामने पेश करने का निर्देश दिया था। आदेश के अनुपालन में पुलिस अधिकारियों ने दोनों महिलाओं को कोर्ट में पेश किया। इसके बाद अदालत ने दोनों से व्यक्तिगत रूप से बातचीत कर उनकी इच्छा और परिस्थितियों को समझा।
30 जुलाई की कार्यवाही के दौरान भी अदालत के सामने यह सवाल प्रमुख था कि दोनों महिलाएं वास्तव में अपनी इच्छा से कहीं रह रही हैं या उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध परिवार के पास रखा गया है। अदालत ने इसी कारण दोनों को स्वयं अपने सामने पेश कराने का रास्ता अपनाया।
कोर्ट में दोनों महिलाओं ने क्या कहा?
करीब 35 वर्षीय अंशु भाटिया उर्फ अमीना अंशु भाटिया ने अदालत को बताया कि उन्होंने वर्ष 2020 में अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया था। उनके अनुसार यह फैसला मानसिक शांति, आध्यात्मिक संतुष्टि और आंतरिक शांति की तलाश में लिया गया था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उनके धर्म परिवर्तन के पीछे किसी तरह का दबाव, लालच, जबरदस्ती, अनुचित प्रभाव या अन्य बाहरी कारण नहीं था।
दूसरी महिला दीया भाटिया उर्फ जोया दीया भाटिया ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2021 में इस्लाम अपनाया। उन्होंने भी अदालत के सामने कहा कि उनका निर्णय व्यक्तिगत आस्था, अंतरात्मा, मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतुष्टि से जुड़ा था तथा किसी व्यक्ति की ओर से बल, धोखा, जबरदस्ती, अनुचित प्रभाव या लालच नहीं था।
पिता पर लगाया गया अवैध हिरासत का आरोप
दोनों महिलाओं ने अदालत के समक्ष आरोप लगाया कि धर्म परिवर्तन के बाद उनके पिता ने उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध पैतृक घर में रोककर रखा।
अंशु भाटिया ने आरोप लगाया कि उन्हें वापस हिंदू धर्म अपनाने के लिए शारीरिक रोक, धमकी और मानसिक उत्पीड़न जैसे दबावों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि उनकी आवाजाही पर रोक लगा दी गई और उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार जीवन जीने की अनुमति नहीं दी गई।
दोनों महिलाओं ने यह भी बताया कि उनके पासपोर्ट, शैक्षणिक प्रमाणपत्र, पहचान संबंधी दस्तावेज, बैंक पासबुक, चेकबुक, धर्म परिवर्तन से जुड़े दस्तावेज और अन्य निजी सामान पिता के पास थे।
मामले में FIR और धर्म परिवर्तन के आरोप क्या थे?
राज्य की ओर से अदालत में इस दावे का विरोध किया गया। रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों महिलाओं के पिता ने वर्ष 2025 में आगरा के सदर बाजार थाने में Case Crime No. 228 of 2025 दर्ज कराया था। शुरुआत में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 87 के तहत मामला दर्ज किया गया था। बाद की जांच में BNS की धारा 61(2), 111(3), 111(4) और 152 तथा उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3/5(1) और 5(2) भी जोड़ी गईं। राज्य की दलील थी कि जांच के दौरान ऐसे तथ्य सामने आए हैं जिनसे कथित धर्म परिवर्तन को केवल व्यक्तिगत आस्था का मामला नहीं माना जा सकता। राज्य ने संगठित गतिविधि, कथित साजिश और बाहरी प्रभाव से जुड़े गंभीर आरोप भी अदालत के सामने रखे।
राज्य ने कहा- जांच प्रभावित हो सकती है
राज्य की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि दोनों महिलाओं को यदि ऐसे लोगों के पास जाने की अनुमति दी जाती है जो आपराधिक मामले से जुड़े हैं, तो जांच प्रभावित हो सकती है। आशंका जताई गई कि गवाहों और साक्ष्यों पर असर पड़ सकता है तथा चल रही आपराधिक जांच को नुकसान हो सकता है।
लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी लंबित आपराधिक जांच को आधार बनाकर किसी बालिग व्यक्ति की स्वतंत्रता को अपने आप अनिश्चितकाल तक सीमित नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब उसके खिलाफ कोई वैध न्यायिक हिरासत आदेश मौजूद न हो।
हाईकोर्ट ने कहा- बालिग व्यक्ति को अपनी जिंदगी का फैसला खुद करने का अधिकार
फैसले में हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वायत्तता को विशेष महत्व दिया। अदालत ने कहा कि दोनों महिलाएं बालिग हैं और अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण फैसले लेने की पूर्ण कानूनी क्षमता रखती हैं। कोर्ट के अनुसार, बालिग व्यक्ति की स्वायत्तता में आस्था, विश्वास, धर्म, रहने की जगह, संबंध और जीवन से जुड़े अन्य व्यक्तिगत फैसले शामिल हैं।
Article 21 और Article 25 का अहम आधार
फैसले में संविधान के Article 21 और Article 25 को महत्वपूर्ण आधार बनाया गया। Article 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जबकि Article 25 अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, अपनाने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता से संबंधित है। हाईकोर्ट ने कहा कि एक सक्षम बालिग व्यक्ति द्वारा अपनी इच्छा से आस्था अपनाना, बदलना या किसी धर्म को छोड़ना उसकी व्यक्तिगत स्वायत्तता, गरिमा और स्वतंत्रता का हिस्सा है।
धर्म परिवर्तन की वैधता और अवैध हिरासत- दोनों अलग सवाल
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यही है कि हाईकोर्ट ने कथित धर्म परिवर्तन को कानूनी रूप से वैध घोषित नहीं किया है।
अदालत ने साफ किया कि उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 के तहत धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं, यह अलग कानूनी प्रश्न है। यदि इस संबंध में कोई विवाद है तो उसका फैसला सक्षम प्राधिकारी या सक्षम अदालत द्वारा कानून के अनुसार किया जा सकता है।
लेकिन कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि धर्म परिवर्तन की वैधता और किसी व्यक्ति की हिरासत की वैधता दो अलग-अलग मुद्दे हैं। भले ही धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को लेकर कोई विवाद हो, यह अपने आप पिता को दो बालिग महिलाओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध घर में बंद रखने का अधिकार नहीं देता।
'सिर्फ आशंका के आधार पर मौलिक अधिकार नहीं छीने जा सकते'
राज्य ने कथित धर्म परिवर्तन को देश की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा से जोड़ते हुए गंभीर आशंकाएं भी जताई थीं। लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि केवल FIR में लगाए गए आरोप और जांच लंबित होने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि दो बालिग महिलाओं की स्वैच्छिक धार्मिक पसंद अपने आप देश की संप्रभुता या सुरक्षा के लिए खतरा है।
कोर्ट ने कहा कि गंभीर आशंकाएं भी मौलिक अधिकारों के मामले में ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य सामग्री का विकल्प नहीं हो सकतीं।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों से भी मिली कानूनी ताकत
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों का सहारा लिया। Soni Gerry v. Gerry Douglas मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बालिग व्यक्ति की अपनी पसंद से जीवन जीने की स्वतंत्रता पर जोर दिया था। हाईकोर्ट ने इसी सिद्धांत को वर्तमान मामले में भी महत्वपूर्ण माना। इसी तरह Shafin Jahan v. Asokan K.M. के फैसले का भी उल्लेख किया गया, जिसमें व्यक्ति की पसंद, व्यक्तिगत स्वायत्तता और संवैधानिक स्वतंत्रता की रक्षा को महत्वपूर्ण माना गया था। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत को बालिग व्यक्ति के मामले में माता-पिता की पसंद को उसकी अपनी इच्छा के ऊपर रखने का अधिकार नहीं है। जब तक व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा पर कोई कानूनी रूप से स्थापित बाधा नहीं है, उसकी स्वायत्तता का सम्मान किया जाना चाहिए।
हिरासत को कोर्ट ने माना पूरी तरह अवैध
दोनों महिलाओं से बातचीत के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि उनके बयान स्वतःस्फूर्त, स्पष्ट और एक-दूसरे के अनुरूप थे। अदालत को बातचीत के दौरान ऐसा कोई तथ्य नहीं मिला जिससे यह संकेत मिले कि वे दबाव, डर, लालच या अनुचित प्रभाव में बयान दे रही थीं। इसके आधार पर अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि दोनों महिलाओं को उनके पैतृक घर में उनकी इच्छा के विरुद्ध रखा गया था और यह उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन था।
पिता और राज्य दोनों को ठहराया जिम्मेदार
हाईकोर्ट ने केवल पिता की भूमिका पर ही सवाल नहीं उठाया, बल्कि राज्य की भूमिका को भी गंभीरता से देखा। अदालत के अनुसार, राज्य की मशीनरी ने दोनों महिलाओं की कथित अवैध हिरासत को समाप्त करने के लिए अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी प्रभावी ढंग से नहीं निभाई। अदालत ने माना कि इस मामले में मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन हुआ और इसलिए सार्वजनिक कानून के तहत मुआवजा देना उचित है।
25 लाख रुपये का मुआवजा क्यों?
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Rudul Sah और Nilabati Behera जैसे फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि मौलिक अधिकारों के गंभीर उल्लंघन के मामलों में संवैधानिक अदालतें सार्वजनिक कानून के तहत आर्थिक मुआवजा दे सकती हैं। अदालत ने माना कि दोनों महिलाओं को लंबे समय तक उनकी इच्छा के विरुद्ध सीमित रखना केवल शारीरिक स्वतंत्रता का मामला नहीं था, बल्कि इससे उनकी गरिमा, मानसिक शांति, व्यक्तिगत स्वायत्तता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता भी प्रभावित हुई। इसी आधार पर पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया गया। मुआवजा दोनों महिलाओं में बराबर बांटा जाएगा और आठ सप्ताह के भीतर भुगतान करना होगा। राज्य सरकार को भुगतान के बाद कानून के अनुसार पिता तथा जिम्मेदार सरकारी अधिकारियों से संबंधित राशि की वसूली करने का अधिकार भी दिया गया है।
पिता अब दोनों की जिंदगी में हस्तक्षेप नहीं कर सकेंगे
कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया कि पिता सीधे या परोक्ष रूप से दोनों महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, आवाजाही, निवास, पेशे या धार्मिक पसंद में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
राज्य अधिकारियों को भी निर्देश दिया गया कि दोनों महिलाओं के शांतिपूर्ण जीवन और स्वतंत्रता में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न हो। जरूरत पड़ने पर उन्हें कानून के अनुसार सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।
सभी निजी दस्तावेज वापस करने का आदेश
हाईकोर्ट ने पिता को दोनों महिलाओं के पासपोर्ट, शैक्षणिक प्रमाणपत्र, पहचान दस्तावेज, बैंक पासबुक, चेकबुक, धर्म परिवर्तन से संबंधित दस्तावेज और अन्य मूल निजी सामान सात दिनों के भीतर वापस करने का निर्देश दिया है। यदि दस्तावेज लौटाने में कोई परेशानी आती है तो संबंधित राज्य अधिकारी आदेश का पालन सुनिश्चित करेंगे।
आपराधिक जांच पर फैसला नहीं
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बेहद महत्वपूर्ण सावधानी बरती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका निर्णय केवल दोनों महिलाओं की कथित अवैध हिरासत और उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुद्दे तक सीमित है। Case Crime No. 228 of 2025 में चल रही आपराधिक जांच के गुण-दोष पर अदालत ने कोई अंतिम राय नहीं दी है। इसी तरह कथित धर्म परिवर्तन कानूनी रूप से वैध था या नहीं, यह भी इस Habeas Corpus याचिका में तय नहीं किया गया है। इन मुद्दों पर सक्षम अदालत या प्राधिकारी कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से फैसला कर सकते हैं।
इस फैसले का बड़ा संदेश क्या है?
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला केवल धर्म परिवर्तन के विवाद तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक संवैधानिक महत्व व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वयस्क व्यक्ति की decisional autonomy से जुड़ा है। फैसले का मूल संदेश यह है कि बालिग होने के बाद व्यक्ति अपने जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले खुद ले सकता है। माता-पिता सलाह दे सकते हैं, असहमति जता सकते हैं और अपने विचार रख सकते हैं, लेकिन केवल पारिवारिक असहमति के आधार पर किसी बालिग व्यक्ति को कैद या उसकी आवाजाही पर रोक नहीं लगाई जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संविधान माता-पिता को यह लाइसेंस नहीं देता कि वे केवल अपने बच्चों की आस्था, विश्वास या निजी पसंद से असहमति के कारण उन्हें कैद कर दें।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धार्मिक आस्था और पारिवारिक अधिकारों के बीच संवैधानिक संतुलन का महत्वपूर्ण उदाहरण है। अदालत ने एक तरफ दोनों महिलाओं की बालिग होने के नाते अपनी जिंदगी के फैसले लेने की स्वतंत्रता को मान्यता दी, वहीं दूसरी तरफ धर्म परिवर्तन से जुड़े आपराधिक आरोपों और कानूनी प्रक्रिया को अलग विषय माना है। इसलिए इस फैसले को 'धर्म परिवर्तन को मंजूरी' के तौर पर नहीं, बल्कि 'बालिग व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध हिरासत में रखने के खिलाफ संवैधानिक संरक्षण' के रूप में देखना अधिक सटीक होगा।
