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12वीं सदी के कोपेश्वर मंदिर पर हाईकोर्ट की बड़ी नजर, ₹101 करोड़ के संरक्षण फंड से ₹22 करोड़ के खर्च तक उठे सवाल; 5 वकीलों की समिति करेगी जांच

सदियों पुरानी विरासत को बचाने के लिए अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने खुद निगरानी तेज कर दी है। कोल्हापुर के खिद्रापुर स्थित 12वीं सदी के कोपेश्वर मंदिर की दरारों, पानी के रिसाव, बाढ़ से हुए नुकसान और संरक्षण कार्यों के बीच करोड़ों रुपये के खर्च पर उठे सवालों ने मामले को गंभीर बना दिया है। हाईकोर्ट ने अब पांच अधिवक्ताओं की स्वतंत्र समिति बनाकर मंदिर का मौके पर निरीक्षण कराने का फैसला किया है। समिति की रिपोर्ट बताएगी कि मंदिर की जमीनी हालत क्या है, संरक्षण कार्य कितने प्रभावी हैं और करोड़ों रुपये की योजनाओं में प्राथमिकता वास्तव में ऐतिहासिक मंदिर को मिल रही है या नहीं।

Sonali11 अग. 2026, 03:46 PM IST
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12वीं सदी के कोपेश्वर मंदिर पर हाईकोर्ट की बड़ी नजर, ₹101 करोड़ के संरक्षण फंड से ₹22 करोड़ के खर्च तक उठे सवाल; 5 वकीलों की समिति करेगी जांच

मुंबई/कोल्हापुर:

 महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के खिद्रापुर स्थित 12वीं सदी के ऐतिहासिक कोपेश्वर मंदिर के संरक्षण को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। मंदिर की मौजूदा स्थिति, संरक्षण कार्यों की वास्तविक प्रगति और सरकारी धन के इस्तेमाल की स्वतंत्र पड़ताल के लिए अदालत ने पांच अधिवक्ताओं की समिति गठित की है। समिति मौके पर जाकर मंदिर और उसके आसपास के infrastructure का निरीक्षण करेगी और चार सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट अदालत के सामने रखेगी।

मामले की सुनवाई जस्टिस मिलिंद जाधव और जस्टिस नंदेश देशपांडे की खंडपीठ कर रही है। अदालत ने मंदिर के संरक्षण के नाम पर स्वीकृत धन के इस्तेमाल और मंदिर से जुड़े कुछ ऐसे विकास कार्यों पर सवाल उठाए हैं, जिनका ऐतिहासिक संरचना के संरक्षण से सीधा संबंध स्पष्ट नहीं है।

₹101 करोड़ की राशि, लेकिन प्राथमिकता किसे?

मामले में अदालत के सामने बताया गया कि कोपेश्वर मंदिर के संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए करीब ₹101 करोड़ की राशि स्वीकृत की गई है। इनमें लगभग ₹44 करोड़ संरक्षण और पुनरुद्धार से जुड़े कार्यों के लिए बताए गए हैं। हालांकि, अदालत के सामने वास्तविक utilisation और अलग-अलग परियोजनाओं पर प्रस्तावित खर्च को लेकर सवाल उठे हैं। इसलिए ₹101 करोड़ को “खर्च हो चुकी राशि” के तौर पर देखना सही नहीं होगा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार राशि की स्वीकृति/आवंटन और उसका वास्तविक उपयोग अलग-अलग मुद्दे हैं और PIL में इसी utilisation की जानकारी भी मांगी गई है।

₹10 करोड़ से अधिक की compound wall पर हाईकोर्ट की आपत्ति

हाईकोर्ट ने मंदिर परिसर की compound wall पर प्रस्तावित ₹10 करोड़ से अधिक के खर्च को लेकर सवाल किया। अदालत ने संकेत दिया कि जब ऐतिहासिक मंदिर की मूल संरचना संरक्षण की मांग कर रही है, तब इतनी बड़ी राशि बाहरी या ancillary infrastructure पर खर्च करने की प्राथमिकता स्पष्ट होनी चाहिए। कोर्ट का रुख यह रहा कि सबसे पहले monument की सुरक्षा और preservation सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

मंदिर से करीब 200 मीटर दूर घाट के लिए ₹12.84 करोड़ पर भी सवाल

सुनवाई के दौरान मंदिर से लगभग 200 मीटर दूर नदी घाट के विकास के लिए प्रस्तावित ₹12.84 करोड़ के खर्च का मुद्दा भी उठा। अदालत ने इस बात पर सवाल किया कि मंदिर के संरक्षण के लिए निर्धारित धन का इस्तेमाल ऐसे कार्य में क्यों किया जाए जिसका मंदिर की मूल ऐतिहासिक संरचना से सीधा संबंध स्पष्ट नहीं है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हाईकोर्ट ने इन खर्चों को अंतिम रूप से अवैध घोषित नहीं किया है। अदालत ने इनके औचित्य, प्राथमिकता और मंदिर संरक्षण से संबंध पर सवाल उठाए हैं।

मंदिर की छत में दरारें, पानी का रिसाव और संरचनात्मक चिंता

अदालत के सामने मंदिर की मौजूदा स्थिति की जो तस्वीर सामने आई, वह भी चिंता बढ़ाने वाली है। रिपोर्ट के मुताबिक मंदिर की छत में दो बड़ी दरारें देखी गई हैं—एक गर्भगृह के भीतर और दूसरी प्रवेश द्वार के पास। गर्भगृह के बाहर दक्षिणी हिस्से की दीवार पर पानी के रिसाव की समस्या भी सामने आई। बारिश, मौसम और विशेष रूप से बाढ़ के कारण मंदिर की संरचना पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए अदालत ने तत्काल संरक्षण उपायों की जरूरत पर जोर दिया है।

2019 की बाढ़ में करीब 12 फीट तक पानी में डूबा था परिसर

कोपेश्वर मंदिर कृष्णा नदी के किनारे स्थित है और बाढ़ की संवेदनशीलता इस पूरे मामले का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अदालत के रिकॉर्ड में यह बात सामने आई कि 2019 की बाढ़ के दौरान विरासत परिसर की पांचों संरचनाएं करीब 12 फीट तक पानी में डूब गई थीं। ऐसे में मंदिर के संरक्षण के लिए केवल पत्थरों और दीवारों की मरम्मत पर्याप्त नहीं है। जल निकासी, flood protection, structural stability और भविष्य में बाढ़ से होने वाले नुकसान को रोकने की वैज्ञानिक योजना भी जरूरी है।


मामला सिर्फ मंदिर की मरम्मत तक सीमित नहीं, 71 कथित अतिक्रमण भी जांच के घेरे में

कोपेश्वर मंदिर PIL में आसपास के क्षेत्र में कथित अतिक्रमण भी बड़ा मुद्दा है। मई 2026 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कोल्हापुर जिला कलेक्टर से मंदिर के आसपास चिन्हित 71 कथित अतिक्रमणों के खिलाफ कार्रवाई की विस्तृत timeline मांगी थी। अदालत की निगरानी केवल मंदिर की इमारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि monument के आसपास के protected/prohibited area की स्थिति भी जांच के दायरे में आई।

ASI के वरिष्ठ अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में बुलाया गया

मामले में ASI की भूमिका को लेकर भी हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। मई 2026 में अदालत ने Archaeological Survey of India के Superintending Archaeologist, Mumbai Circle को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया था। अदालत मंदिर संरक्षण से जुड़े सवालों और ASI की ओर से अपेक्षित जानकारी पर जवाब चाहती थी। यह घटनाक्रम दिखाता है कि हाईकोर्ट इस मामले में केवल सरकारी affidavit पर निर्भर रहने के बजाय संरक्षण कार्य की वास्तविक प्रगति और अधिकारियों की जवाबदेही को भी गंभीरता से देख रहा है।

ASI ने मंदिर की छत के लिए ₹38.61 लाख का conservation tender भी निकाला

इस मामले में एक महत्वपूर्ण और कम चर्चित तथ्य यह भी है कि ASI ने 29 मई 2026 को कोपेश्वर मंदिर की छत से damaged और decayed lime/cement concrete हटाने के लिए tender जारी किया था। इस काम का उद्देश्य छत पर मौजूद भारी dead load को कम करना था। सरकारी e-procurement रिकॉर्ड के अनुसार इसकी अनुमानित कीमत ₹38.61 लाख थी और tender reference West/Mumb/Kolh/Panh/23077438 था। इससे यह स्पष्ट होता है कि मंदिर के structural conservation के कुछ ठोस कार्यों की प्रक्रिया चल रही थी। लेकिन हाईकोर्ट अब स्वतंत्र रूप से यह भी देखना चाहता है कि मौके पर वास्तविक स्थिति क्या है और conservation work जरूरत के मुताबिक हो रहा है या नहीं।

मई में ASI को conservation plan पर फैसला लेने का निर्देश

हाईकोर्ट ने मई 2026 में ASI को कोपेश्वर मंदिर के Annual Conservation Programme पर तेजी से निर्णय लेने का निर्देश दिया था। अदालत की चिंता का एक बड़ा कारण यह था कि ऐतिहासिक मंदिर की स्थिति लगातार खराब हो रही है और मानसून से पहले जरूरी संरक्षण उपायों पर स्पष्टता होनी चाहिए। इससे साफ है कि अगस्त में गठित पांच सदस्यीय समिति अचानक लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि पिछले कई महीनों से चल रही न्यायिक निगरानी की अगली महत्वपूर्ण कड़ी है।

स्थानीय ग्रामीण भी ASI की पाबंदियों से नाराज

कोपेश्वर मंदिर विवाद का एक दूसरा पहलू स्थानीय ग्रामीणों और ASI के बीच पैदा हुआ तनाव भी है। जून 2026 में खिद्रापुर के ग्रामीणों ने ASI की पाबंदियों के विरोध में बंद का आह्वान किया था। ग्रामीणों का आरोप था कि उनके लंबे समय से मौजूद घरों और निर्माणों को अतिक्रमण के रूप में चिह्नित किया जा रहा है। विरोध के दौरान मंदिर को पर्यटकों के लिए बंद करने और गांव में पर्यटक वाहनों के प्रवेश को रोकने की स्थिति बनी। रिपोर्ट के मुताबिक करीब 1,200 पर्यटक मंदिर के दर्शन किए बिना लौट गए। ग्रामीण 100 मीटर prohibited zone और 300 मीटर regulated area के नियमों में स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए राहत की मांग कर रहे थे। दूसरी ओर, हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत संरक्षण और क्षेत्र की कानूनी सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है।

पंचायत को नए निर्माण की अनुमति देने से भी रोका गया

इस विवाद के बीच हाईकोर्ट ने खिद्रापुर ग्राम पंचायत को संबंधित क्षेत्र में नए निर्माण की अनुमति नहीं देने का निर्देश दिया था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब तक monument के आसपास की स्थिति और कथित अतिक्रमणों का मुद्दा स्पष्ट नहीं हो जाता, तब तक नए निर्माण से स्थिति और जटिल न हो।

पांच सदस्यीय समिति करेगी स्वतंत्र fact-finding

हाईकोर्ट ने अब पांच अधिवक्ताओं की समिति गठित की है। समिति में रितेश थोबाडे, रुग्वेद किंकर, उत्कर्षा देसाई, सिद्धार्थ शितोले और भार्गवी पाटिल शामिल हैं। समिति का काम मंदिर परिसर का दौरा करना, infrastructure की वर्तमान स्थिति देखना और स्वतंत्र fact-finding के बाद रिपोर्ट अदालत को देना है। इस कदम से अदालत को सरकारी विभागों की रिपोर्ट के अलावा जमीन पर मौजूद वास्तविक स्थिति का एक स्वतंत्र assessment मिलने की उम्मीद है।

12वीं सदी की स्थापत्य विरासत है कोपेश्वर मंदिर

कोपेश्वर मंदिर महाराष्ट्र की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासत में शामिल है। यह कृष्णा नदी के किनारे खिद्रापुर में स्थित है और अपनी पत्थर की नक्काशी, स्तंभों और विशिष्ट स्थापत्य संरचना के लिए जाना जाता है। मंदिर का स्वर्ग मंडप इसकी सबसे खास स्थापत्य विशेषताओं में गिना जाता है। इसलिए मंदिर का संरक्षण केवल एक धार्मिक स्थल के रखरखाव का मामला नहीं है, बल्कि भारत की प्राचीन स्थापत्य विरासत को सुरक्षित रखने से भी जुड़ा हुआ है।


आगे क्या होगा?

अब पांच सदस्यीय समिति मंदिर परिसर का निरीक्षण करेगी और अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट को देगी। रिपोर्ट में मंदिर की वास्तविक structural condition, infrastructure, conservation की जरूरत और मौके पर चल रहे कार्यों की स्थिति सामने आने की उम्मीद है। इसके बाद अदालत यह तय कर सकती है कि ASI, राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन को संरक्षण कार्यों, funding और आसपास के क्षेत्र के management को लेकर कौन-कौन से अतिरिक्त निर्देश दिए जाने चाहिए। मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त 2026 को निर्धारित है।

यह मामला अब सिर्फ मंदिर की मरम्मत का नहीं रह गया है। इसमें heritage conservation, सरकारी धन के utilisation, कथित अतिक्रमण, ASI की जवाबदेही, बाढ़ से सुरक्षा और स्थानीय लोगों के अधिकार—सभी पहलू अदालत की निगरानी में आ गए हैं।