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झारखंड में छात्रों की आवाज,छात्रों को लेकर कंगना के दो अलग चेहरे?

झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस लाठीचार्ज के बाद बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने छात्रों के समर्थन में आवाज उठाई है। हालांकि, जुलाई में दिल्ली के CJP छात्र आंदोलन के दौरान कंगना ने प्रदर्शनकारियों का समर्थन करने के बजाय दिल्ली पुलिस की कार्रवाई का बचाव किया था। दोनों मामलों की परिस्थितियां अलग होने के बावजूद कंगना के अलग-अलग रुख ने राजनीतिक बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहा है कि छात्रों और पुलिस कार्रवाई को लेकर उनका नजरिया मुद्दे के आधार पर बदलता है या आंदोलन के राजनीतिक संदर्भ के आधार पर।

Neha Sharma11 अग. 2026, 05:48 PM IST
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झारखंड में छात्रों की आवाज,छात्रों को लेकर कंगना के दो अलग चेहरे?

नई दिल्ली/रांची: झारखंड में JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर आंदोलन कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। 10 अगस्त को रांची में विधानसभा घेराव के लिए निकले छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया, पानी की बौछारें छोड़ीं और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। इस कार्रवाई के बाद छात्रों के समर्थन में आवाजें उठने लगी हैं। बीजेपी सांसद कंगना रनौत भी झारखंड के छात्रों के मुद्दे को लेकर मुखर हुई हैं।


लेकिन कंगना के इस रुख के साथ ही जुलाई में दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद के आसपास हुए CJP यानी Cockroach Janta Party के छात्र आंदोलन की तस्वीर भी सामने आ रही है। दिल्ली में जब प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने कार्रवाई की थी, तब कंगना ने छात्रों के पक्ष में खड़े होने के बजाय दिल्ली पुलिस की तारीफ की थी। उन्होंने यहां तक कहा था कि संसद के अंदर मौजूद सांसदों को डर था कि प्रदर्शनकारी उन पर हमला कर सकते हैं और दिल्ली पुलिस ने “शील्ड” की तरह काम किया। यहीं से सवाल उठ रहा है—झारखंड में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के खिलाफ आवाज और दिल्ली में पुलिस कार्रवाई का समर्थन, आखिर दोनों मामलों में कंगना का रुख अलग क्यों रहा?


झारखंड में छात्रों पर क्यों हुआ लाठीचार्ज?

झारखंड में JPSC और JSSC की भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर छात्र लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं और मामले की स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं। आंदोलन के दौरान छात्रों ने विधानसभा का घेराव करने का ऐलान किया था। 10 अगस्त को बड़ी संख्या में छात्र रांची में विधानसभा की ओर बढ़े। पुलिस ने रास्ते में बैरिकेडिंग कर रखी थी। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव बढ़ने के बाद पुलिस ने पानी की बौछारों और आंसू गैस का इस्तेमाल किया तथा लाठीचार्ज किया। रिपोर्टों के अनुसार प्रदर्शनकारियों में कुछ लोग घायल हुए, जबकि अधिकारियों ने पुलिसकर्मियों के भी घायल होने की जानकारी दी। छात्रों का आरोप है कि पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल किया। दूसरी ओर प्रशासन का पक्ष है कि प्रदर्शनकारी बैरिकेड पार कर विधानसभा की ओर बढ़ रहे थे और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी। इसलिए पूरे घटनाक्रम में दोनों पक्षों के दावों को अलग-अलग देखना जरूरी है।


कंगना ने झारखंड के छात्रों का समर्थन कैसे किया?

झारखंड के छात्र आंदोलन को लेकर कंगना ने पुलिस कार्रवाई के बाद ही पहली बार बात नहीं की थी। वह इससे पहले भी इस आंदोलन को लेकर बयान दे चुकी थीं। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर सवाल उठाते हुए कहा था कि झारखंड में छात्र गंभीर परिस्थितियों से गुजर रहे हैं, लेकिन विपक्ष की ओर से उस तरह की सक्रियता दिखाई नहीं दे रही जैसी दिल्ली के आंदोलनों के दौरान दिखाई देती है। 10 अगस्त की पुलिस कार्रवाई के बाद झारखंड का छात्र आंदोलन और बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया। बीजेपी ने भी छात्रों के समर्थन में राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया और कथित परीक्षा अनियमितताओं की CBI जांच की मांग को आगे बढ़ाया। यानी कंगना का झारखंड के छात्रों के प्रति समर्थन केवल लाठीचार्ज के बाद अचानक सामने आया रुख नहीं था। वह पहले से ही इस मुद्दे को विपक्ष, खासकर राहुल गांधी और कांग्रेस पर हमला करने के लिए इस्तेमाल कर रही थीं।


अब दिल्ली के CJP आंदोलन पर नजर डालिए

जुलाई 2026 में दिल्ली में CJP के नेतृत्व में छात्र और युवा बड़ी संख्या में जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च करने निकले थे। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग शामिल थी। 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ। पुलिस ने भीड़ को रोकने के लिए बल प्रयोग किया और प्रदर्शनकारियों को संसद की ओर बढ़ने से रोका। इसी कार्रवाई के बाद कंगना रनौत ने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में आवाज उठाने के बजाय दिल्ली पुलिस का बचाव किया। 21 जुलाई को कंगना ने कहा कि संसद में मौजूद सांसदों को डर था कि भीड़ उन पर हमला कर सकती है। उन्होंने दिल्ली पुलिस की तारीफ करते हुए कहा कि पुलिस ने लोगों को बचाने के लिए “शील्ड” की तरह काम किया। यानी दिल्ली में उनका संदेश साफ था—पुलिस की कार्रवाई को गलत ठहराने के बजाय उन्होंने उसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी बताया।


कंगना यहीं नहीं रुकीं

दिल्ली के CJP आंदोलन को लेकर कंगना की प्रतिक्रिया सिर्फ पुलिस के समर्थन तक सीमित नहीं रही। बाद में उन्होंने प्रदर्शनकारियों की भाषा और सोशल मीडिया पोस्ट पर भी तीखी टिप्पणी की। 28 जुलाई को उनके “Generation Gutter” वाले बयान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हुआ। उन्होंने प्रदर्शनकारियों के कुछ पोस्ट और भाषा की कड़ी आलोचना की। एक अन्य बयान में भी कंगना ने छात्रों और प्रदर्शनकारियों की ओर से इस्तेमाल की गई भाषा को लेकर सवाल उठाए और आंदोलन के तरीके पर निशाना साधा। इसलिए यह कहना कि कंगना दिल्ली के छात्र आंदोलन पर “चुप” थीं, सही नहीं है। वास्तविकता इसके उलट है—वह दिल्ली के आंदोलन पर काफी मुखर थीं, लेकिन छात्रों के समर्थन में नहीं बल्कि प्रदर्शनकारियों की आलोचना और दिल्ली पुलिस के समर्थन में।


यहीं से उठ रहा है ‘दोहरा रवैया’ का सवाल

कंगना के आलोचक अब दोनों घटनाओं की तुलना कर रहे हैं। उनका सवाल है कि अगर छात्रों पर पुलिस का बल प्रयोग गलत है तो यह सिद्धांत झारखंड और दिल्ली दोनों जगह लागू क्यों नहीं होना चाहिए? दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई के बाद कंगना ने पुलिस की प्रशंसा की और प्रदर्शनकारियों के व्यवहार को लेकर सवाल उठाए। वहीं झारखंड में छात्रों के आंदोलन को उन्होंने राजनीतिक समर्थन दिया और पुलिस कार्रवाई को लेकर आवाज उठाई। हालांकि दोनों घटनाओं को पूरी तरह समान बताना भी सही नहीं होगा। दिल्ली में प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़ रहे थे और पुलिस के साथ टकराव की स्थिति बनी थी। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर पथराव और कानून-व्यवस्था बिगाड़ने जैसे आरोप लगाए थे। कंगना ने इसी संदर्भ में पुलिस का बचाव किया था। झारखंड में भी प्रदर्शनकारी विधानसभा की ओर बढ़े और बैरिकेड पार करने की कोशिश हुई। वहां भी पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ तथा बल प्रयोग किया गया।


फिर अंतर कहां है?

सबसे बड़ा अंतर दोनों आंदोलनों के राजनीतिक संदर्भ में दिखाई देता है। झारखंड का आंदोलन राज्य में भर्ती परीक्षाओं और कथित अनियमितताओं को लेकर है। वहां सत्ता में JMM के नेतृत्व वाली सरकार है और कांग्रेस भी गठबंधन का हिस्सा है। इसलिए बीजेपी के लिए यह आंदोलन राज्य सरकार को घेरने का राजनीतिक अवसर भी है। दूसरी ओर दिल्ली का CJP आंदोलन केंद्र सरकार और केंद्रीय शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों को लेकर था। इसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी सामने आई थी। ऐसे में आंदोलन का सीधा राजनीतिक दबाव केंद्र की BJP सरकार पर था। यही वजह है कि आलोचक कंगना के दोनों बयानों को राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं। उनका आरोप है कि जब आंदोलन विपक्षी सरकार के खिलाफ हो तो उसे छात्रों की आवाज बताया जाता है, लेकिन जब वही आंदोलन केंद्र सरकार के खिलाफ हो तो प्रदर्शनकारियों के व्यवहार और कानून-व्यवस्था का मुद्दा सामने लाया जाता है। हालांकि यह कहना कि कंगना ने केवल राजनीतिक कारणों से अपना रुख बदला, एक आरोप या राजनीतिक व्याख्या होगी, जिसे तथ्य के रूप में पेश नहीं किया जा सकता।


एक और दिलचस्प पहलू: CJP खुद झारखंड में छात्रों के साथ

इस पूरे विवाद में एक और घटनाक्रम सामने आया है। CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने झारखंड के छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो को समर्थन दिया है। यानी जिस छात्र आंदोलन से जुड़े दिल्ली प्रदर्शन को लेकर कंगना ने पहले आलोचनात्मक रुख अपनाया था, उसी CJP से जुड़े लोग अब झारखंड के छात्र आंदोलन के समर्थन में दिखाई दे रहे हैं। CJP की ओर से यह भी कहा गया है कि उसके सदस्य झारखंड के छात्रों के साथ शुरुआत से मौजूद रहे हैं। इससे मामला और दिलचस्प हो जाता है। एक तरफ कंगना झारखंड के छात्रों की आवाज उठा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के आंदोलन से जुड़े संगठन के लोग भी झारखंड के छात्रों के समर्थन में हैं। लेकिन दिल्ली में इन्हीं प्रदर्शनकारियों को लेकर कंगना का रुख बेहद आलोचनात्मक था।


क्या कंगना का रुख सच में बदला है?

तथ्यों को देखें तो “कंगना चुप थीं” वाला सवाल सही नहीं है। वह दिल्ली आंदोलन पर चुप नहीं थीं। बल्कि उन्होंने वहां प्रदर्शनकारियों के खिलाफ काफी कड़ा रुख अपनाया था। असली सवाल यह है कि दोनों आंदोलनों के प्रति उनकी प्रतिक्रिया इतनी अलग क्यों रही? एक संभावित जवाब यह है कि कंगना दोनों आंदोलनों को अलग परिस्थितियों के रूप में देखती हैं। दिल्ली में उन्होंने संसद की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता दी, जबकि झारखंड में उनका जोर छात्रों की भर्ती परीक्षाओं से जुड़ी शिकायतों और राज्य सरकार की जवाबदेही पर है। लेकिन राजनीतिक आलोचकों के लिए यह अंतर ही सबसे बड़ा सवाल है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रों के प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई का मूल्यांकन सरकार के राजनीतिक रंग के आधार पर नहीं, बल्कि एक समान मानदंड पर होना चाहिए।


असल मुद्दा छात्रों का भविष्य

राजनीतिक बयानबाजी के बीच सबसे बड़ा सवाल उन छात्रों का है जो वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितता, पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने या परिणामों में देरी का सीधा असर लाखों युवाओं के भविष्य पर पड़ता है। झारखंड में JPSC-JSSC परीक्षाओं को लेकर छात्रों की मांग इसी भरोसे से जुड़ी है कि सरकारी भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष हो। दिल्ली में CJP आंदोलन भी परीक्षा व्यवस्था और छात्रों के भविष्य से जुड़े सवालों को लेकर शुरू हुआ था। इसलिए झारखंड और दिल्ली दोनों घटनाओं के बीच सबसे बड़ा साझा मुद्दा छात्रों का भरोसा है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि प्रदर्शन किस पार्टी या किस सरकार के खिलाफ है। सवाल यह होना चाहिए कि क्या छात्रों की शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो रही है? क्या पुलिस बल का इस्तेमाल अंतिम विकल्प के रूप में किया गया? क्या सरकार प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर रही है? और क्या परीक्षा व्यवस्था में युवाओं का भरोसा कायम है?


कंगना रनौत के दोनों मामलों में अलग-अलग रुख ने इसी बहस को और तेज कर दिया है। झारखंड में छात्रों के समर्थन में उनकी आवाज को जहां बीजेपी राज्य सरकार के खिलाफ मुद्दा बना रही है, वहीं दिल्ली में उनके पुराने बयान अब उनके सामने ही सवाल बनकर खड़े किए जा रहे हैं।

इसलिए खबर का सबसे सटीक निष्कर्ष यही है—कंगना दिल्ली के प्रदर्शन पर चुप नहीं थीं, बल्कि उन्होंने वहां प्रदर्शनकारियों की आलोचना और दिल्ली पुलिस का समर्थन किया था। झारखंड में उनका रुख इसके उलट छात्रों के समर्थन वाला दिखाई दे रहा है। दोनों आंदोलनों की परिस्थितियां अलग होने के बावजूद यह अंतर राजनीतिक बहस को जन्म दे रहा है कि छात्र आंदोलनों के प्रति किसी जनप्रतिनिधि का रुख परिस्थितियों के आधार पर बदलना चाहिए या फिर पुलिस कार्रवाई और छात्रों के अधिकारों पर एक समान सिद्धांत लागू होना चाहिए।